-सुसंस्कृति परिहार
बहुत दिनों बाद एक अच्छी ख़बर मिलने की 27अक्टूवर को उम्मीद थी लेकिन उसे 31, अक्टूबर तक टाल दिया गया है। सन् 2020 में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में सीएए के खिलाफ़ शुरू हुए प्रदर्शनों का अंत दंगों की शक़्ल में हुआ। 23 फ़रवरी से 26 फ़रवरी 2020 के बीच हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई। 13 जुलाई को हाईकोर्ट में दायर दिल्ली पुलिस के हलफ़नामे के मुताबिक, मारे गए लोगों में से 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे। जबकि 700के लगभग लोग घायल हुए थे।
इसे बड़ी साज़िश माना गया और इसके तहत उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा और मीरन हैदर वा अन्य को दिल्ली पुलिस ने जेल में डाल दिया उन पर दंगा भड़काने का आरोप लगाया था ।वे पांच साल से जेल में हैं। अहम् बात ये है कि दिल्ली पुलिस इतने साल गुजर जाने के बाद भी इनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं जुटा पाई है।

विचित्र बात है कि इस दंगे के दौरान भाजपा के युवा तुर्क केन्द्रीय राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर देश के ग़द्दारों को गोली मारो….को कहते हुए ख़ूब वायरल हुए। लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।उल्टा चुनाव के बाद वे केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री बनाकर उपकृत हुए। जबकि जेएनयू जिसे भाजपा सरकार अपने विरुद्ध प्रशिक्षण विश्वविद्यालय मानती है दिल्ली पुलिस ने वहां के अध्ययनरत छात्रों को दंगे का गुनहगार बना दिया।
गौरतलब है कि 2020 दिल्ली दंगा मामले में अत्यंत विवादास्पद एफआईआर संख्या 59/2020 दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ द्वारा भारतीय दंड संहिता और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत विभिन्न अपराधों के तहत इन सब पर दर्ज़ की गई थी।
विदित हो ,कि खालिद और अन्य ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 2 सितंबर को ज़मानत देने से इनकार करने के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ किया है।दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शैलिंदर कौर की खंडपीठ ने इन चारों और अतहर खान, खालिद सैफ़ी, मोहम्मद सलीम खान, शिफ़ा उर रहमान और शादाब अहमद की सभी अपीलें खारिज कर दी थीं।
अब सुको ने इन ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई 31 अक्तूबर तक के लिए टाल दी है। अदालत ने इन ज़मानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस द्वारा जवाब न देने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए फटकार लगाई है। 27 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सूर्यप्रकाश वी. राजू ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिस पर जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि पुलिस को जवाब देने के लिए पर्याप्त समय मिल चुका है और ज़मानत के मामलों में ऐसी कोई स्थिति नहीं होती जहां जवाबी अपील दायर की जाए।
सोशल मीडिया पर किए एक पोस्ट में कहा गया है कि इस मामले में जस्टिस कुमार ने कहा, ‘पिछली बार, अगर आपको याद हो, तो हमने खुली अदालत में कहा था कि हम 27 अक्टूबर को मामले की सुनवाई करेंगे और इसका निपटारा करेंगे। सच कहूं तो, ज़मानत के मामलों में प्रतिवाद दायर करने का सवाल ही नहीं उठता.’सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि अपीलकर्ताओं को जेल में पांच साल बीत चुके हैं. जस्टिस कुमार ने कहा, ‘आप प्रतिवाद दायर करें. लेकिन हम आपको दो हफ़्ते का समय नहीं देंगे।’
अदालत के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और सीयू सिंह ने उमर खालिद, अभिषेक मनु सिंघवी ने फ़ातिमा और सिद्धार्थ दवे ने इमाम का प्रतिनिधित्व किया। चारों ने जेल में बिताए लंबे समय और ज़मानत के इंतज़ार पर ज़ोर दिया।
अब देखना यह है कि 31 अक्टूबर को इनकी जमानत को लेकर जस्टिस कुमार क्या आदेश सुनाते हैं।और यह इन कथित आरोपियों के जीवन के पांच सालों की भरपाई के बारे में पुलिस पर क्या ऐक्शन लेते हैं और उनकी जमानत होती भी या नहीं। ज्ञातव्य हो,ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्टः अभी तक 17 बार इस केस में जमानत याचिका पर सुनवाई टली है और अगली तारीख मिली है।
जबकि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी उचित कारण या कानूनी प्रक्रिया के जेल में डालने का फैसला कोई भी अदालत नहीं दे सकती है। यह भारत के संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल अधिकार (अनुच्छेद 21) के खिलाफ है। वैसे UAPA के अन्तर्गत जबरन विरोधियों को जेल में डालने की चर्चा सुर्खियों में आ ग ई है। इसलिए लगता है इस बार जमानत के द्वार निश्चित खोलेगा।
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