सोच को सावधान बना लेने में कोई बुराई नही !
● चंद्रशेखर शर्मा
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“जी न्यूज’ पर बहुत बढ़िया बहस देखने को मिली ! विषय था यूपी के सीएम आदित्यनाथ योगी का यह बयान कि ‘सनातन हमारा राष्ट्रीय धर्म है !’
बेशक यह एक उम्दा डिबेट थी। इन दिनों धर्म और हमारे आराध्यों पर ‘बोलवचन’ के जरिये राजनीति में घुस चुके ऐसे धार्मिक मसलों को मुद्दा बनाने की कोशिश नये मोड़ पर पहुंच गई है ! यह चाहे राजनीतिक हरकत हो, लेकिन बेतरह दिलचस्प भी है ! वो डिबेट यदि मिले तो वाकई सुनने काबिल है। सुनियेगा !
बहरहाल घर पर टीवी पर इस डिबेट के पहले अपन भाभीजी विधायक श्रीमती मालिनी लक्ष्मणसिंह गौड़ के निज सहायक, इंजीनियर भाई प्रणय चित्तौड़ा के घर आयोजित सुंदरकांड में थे। वहां एकलव्यसिंह गौड़ और रजत बेड़िया, लोकेश पोरवाल, वीरेंद्र शेंडगे, पार्षद नितिन शानू शर्मा भाई सहित कई और प्रिय भाईयों से भी मुलाकात हुई !
सनातन का तो नहीं पता, लेकिन रामायण के बारे में कहा जाता है कि रामायण कोई सामान्य कथा नहीं है। कहते हैं कि तीन सौ लेकर एक हजार के करीब अलग-अलग रामायण हैं ! कई भाषाओं में यह मिलती है और कई धर्मों में इस कथा का उल्लेख है। फिर सिर्फ भारत नहीं, बल्कि कई देशों में राम कथा मिलती है !
दरअसल रामायण और महाभारत केवल ग्रंथ भर नहीं हैं। असल में उनमें एक सभ्यता के दर्शन मिलते हैं। जाहिर है वो एक व्यवस्था भी है ! साहित्यिक रूप से आप कुछ भी कहो अलबत्ता ये दोनों अद्भुत ग्रंथ एक नीति शास्त्र से भी आपका हैरान कर देने वाला परिचय कराते हैं ! मूल बात यह कि उसमें एक अलग ही आनंद और एक अलग ही रस है ! जी, इसमें पन्नों पर सिर्फ शब्द ही नहीं झरते, बल्कि बहुत लालित्यपूर्ण और बहुत मोहक सुर और ताल भी उस कहन में बहते हैं। सो शायद इसलिए कहते हैं कि रामायण कही नहीं जाती, बल्कि गायी जाती है ! जमा हजारों बरसों से गायी चली जाती आ रही है ! जानने लायक बात यह है कि हमारा भारत बहुत कथाप्रेमी देश रहा है। हमारे मनीषियों ने एक से बढ़कर एक कथाएं-गाथाएं रची हैं। बिलकुल बेजोड़। यदि ऐसा नहीं है तो हजारों बरसों से क्यों वो कथाएं-गाथाएं विशेष उत्सव की तरह अभी तक कही-सुनी जाती चली आ रही हैं ? गोया यह देश कथाओं पर जिंदा रहने वाला अथवा उनको जीने वाला देश रहा है या यह उसके संस्कार हैं या लाइफ स्टाइल का अंग है या प्रिय शगल रहा है। रामकथा की बात करें तो ऐसा क्या है, जो उसमें या उसके मायनों में दर्ज न है ? परिवार, समाज, राजनीति और व्यवस्था में जो-जो होता है, वो-वो सब वहां। वो परिवार, समाज और राष्ट्र के हर मसले पर मुखर है। आप जो चाहे कहो, पर ध्यान रहे कि यह आस्था का मसला भी है। एक वो आस्था है, सर तन से जुदा करने वाली ! फर्क यह है कि एक आस्था अपने आराध्यों या धर्मग्रंथों के अपमान पर भी लगभग अविचलित चित्त का परिचय देती है। सो कहें तो क्या व्यवस्था या संविधान प्रदत्त आजादी के इस दोगलेपन का निदान जरूरी नहीं ?
बहरहाल सुंदर कांड इस रामायण का मात्र एक कांड है अलबत्ता उसकी अपनी कई विशेषताएं हैं ! अपनी अलग महिमा है उसकी। यह भी कहते हैं कि इसके पाठ से इंसान को मानसिक लाभ भी मिलता है और धार्मिक लाभ भी। भाई प्रणय चित्तौड़ा के निवास पर सुनील व्यास जी और उनकी आदरणीय मंडली वहां सुंदरकांड का वैसा ही सुंदर गायन भी कर रही थी। गायक और वादक सब सधे हुए थे। अपन ने अलग-अलग रामायण मंडलियों को सुनकर अनुभव पाया है कि रामायण की चौपाइयों को बेशुमार तरीकों से और वो भी समान आनंद से, गाया जा सकता है व गाया जाता है। इस सुंदरकांड की दूसरी विशेषता है इसे हनुमानजी की विजय या कामयाबी का कांड भी कहा गया है। हनुमान जी कोई मामूली पौराणिक किरदार नहीं हैं। उन जैसा महापराक्रमी, महातेजस्वी, महा विद्वान और परमभक्त किरदार दूजा नहीं मिलता ! प्रसंग है कि जब हनुमानजी लंका से वापस श्रीराम के पास पहुंचे तो उन्होंने हनुमान जी से पूछा कि आपने अशोक वाटिका उजाड़ दी और उससे भी आगे पूरी लंका जला दी और सीताजी का पता भी ला दिया तो यह सब अद्भुत कैसे किया ? तब हनुमानजी ने जो जवाब दिया है वो निजी रूप से मुझे सर्वाधिक पसंद है। वो है-”सो सब तव प्रताप रघुराई !’ अर्थात वो कहते हैं यह सब आपही का प्रताप था प्रभु ! खैर !
भारतीय राजनीति में रामराज्य की धारणा भी है। गोया वो भी एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था थी। खैर। गौरतलब बात यह है कि सुंदरकांड पाठ के आयोजन अब काफी होने लगे हैं। प्रणय तो अकसर सुंदरकांड पाठ का आयोजन करते हैं। थोड़ा अपन भी इस पाठ से लगाव महसूस करते हैं। यह पाठ हनुमानजी की विजय या कामयाबी का एक पूरा पर्व है। हनुमानजी, जो अमर हैं और इतने दीर्घायु और कालजयी हैं कि आज भी जीवित हैं !
कथा कहती है कि हनुमानजी का यह था कि उन्हें उनका बल याद दिलाना पड़ता था ! यों बात किसी धर्म विशेष की नहीं है, लेकिन शहर में एकाएक बिना सूचना के अलग-अलग क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों के अराजक रूप से जमा होने के मामले बढ़ना कानून-व्यवस्था के लिए कतई ठीक बात न है। बड़ी बात तो यह है कि मुख्यमंत्री के सपनों और प्रदेश के नम्बर वन शहर में कुछ बेहद निंदनीय नारे लगे और अन्य घटनाएं हुईं। असल में यह ‘चलन’ कहीं कोई चुनौती तो नहीं ? भले और किसी को इस सवाल से वास्ता न हो लेकिन कानून-व्यवस्था के तमाम बुद्धिवंतों को इस सवाल का मतलब जरूर पता होना चाहिए ! अपन कोई जामवंत जी नहीं हैं। सो जिसे जैसा समझना हो, समझे। अलबत्ता ताजा में एक फ़िल्म को लेकर हुए विभाजन और विवाद के बाद जो हुआ, वो इंदौर जैसे आर्थिक केंद्र में किसी सूरत नहीं जँचता ! इंदौर अब कस्बा नहीं है, बल्कि उल्लेखनीय रूप से एक बड़ा आर्थिक केंद्र हो गया है। बड़े-बड़े राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय आयोजन तो अभी ही यहां सकुशल सम्पन्न हुए हैं। जमा आगे भी जी देशों की बैठक यहां होनी है। सो यहां कमान कस्बाई मानसिकता रखने वाले अधिकारियों के हवाले करने के बजाय बुद्धिमान और ऊर्जावान उन युवाओं को यहां पदस्थ किया जाए, जो ऐसे मामलों से निडरता से निपट सकें ! ये शहर अब अपने बदलाव के एवज में कुछ अलग स्टेटस बिलकुल डिजर्व करता है। ये वो शहर है, जो काम करने और उससे विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब हुए एक हेड कांस्टेबल से लेकर एएसपी और एसपी-कलेक्टर तक को अपने सर-आंखों पर बैठाकर दिखा चुका है ! गोया व्यवस्था की बेहतरी के लिए हनुमान हर सूरत लगेंगे ! सबक तो लिया ही जा सकता है लेकिन सोच को सावधान बना लेने में कोई बुराई न !
● चंद्रशेखर शर्मा

