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परा-विज्ञान कथा : रहस्यमयी मूर्ति

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डॉ. विकास मानव
(निदेशक : चेतना विकास मिशन)

    _आप हवा नहीं देखते तो क्या वह नहीं है? स्वास मत लें, आपको आपकी औकात पता चल जाएगी. अगर आप सत्य नहीं देख पाते तो यह आपका अंधापन है. अगर आप अपेक्षित को अर्जित नहीं कर पाते तो यह आपकी काहिलताजनित विकलांगता है._
*मेरा स्पस्ट और चुनौतीपूर्ण उद्घोष है : बिल से बाहर निकलें, समय दें : सब देखें, सब अर्जित करें.*
ऐसे विषय को अविश्वसनीय मान लेने की वजह तंत्र के नाम पर तथाकथित/पथभ्रष्ट तांत्रिकों की लूट और भोगवृत्ति रही है। इन दुष्टों द्वारा अज्ञानी, निर्दोष लोगों को सैकड़ों वर्षों से आज तक छला जाता रहा है। परिणामतः तंत्र विद्या से लोगों का विश्वास समाप्तप्राय हो गया है।
  _*तंत्र ‘सत्कर्म’- ‘योग’ और ‘ध्यान ‘ की ही तरह डायनामिक रिजल्ट देने वाली प्राच्य विद्या है. इस के प्रणेता शिव हैं और प्रथम साधिका उनकी पत्नी शिवा. जो इंसान योग, ध्यान, तंत्र के नाम पऱ किसी से किसी भी रूप में कुछ भी लेता हो : वह अयोग्य और भ्रष्ट है. यही परख की कसौटी है.*_
 _सूक्ष्मलोक, प्रेतलोक, अदृश्य शक्तियां, मायावी शक्तियां आदि सभी होती हैं. प्रेतयोनि और देवयोनि को विज्ञान भी स्वीकार कर चुका है — निगेटिव और पॉजिटिव एनर्ज़ी के रूप में. जिनको साक्ष्य या निःशुल्क समाधान चाहिए वे व्हाट्सप्प 9997741245 पर संपर्क कर सकते हैं._

तंत्र के नियम और सिद्धान्त अपनी जगह अटल, अकाट्य और सत्य हैं। इन पर कोई विश्वास करे, न करे लेकिन इनके यथार्थ पर कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है।

    _उन दिनों मैं रंगून विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म और दर्शन का अतिथि प्रवक्ता था। एक दिन अपरिहार्य वज़हों से मुझे वापस लौटने के लिए बाध्य होना पड़ा। जब मेरा स्टीमर 'इरावदी' नदी के मुहाने के पास पहुंचा तो अचानक उसमें कुछ खराबी आ गयी।_
      स्टीमर के इंजीनियरों के काफी कोशिशों के बावजूद भी वह मशीन ठीक नहीं हुई। अन्त में कलकत्ता से दूसरा स्टीमर भेजे जाने की सूचना दी गई। किन्तु उसे भी आने में दो दिन की देरी थी।
   ख़राब स्टीमर में भेड़-बकरी की तरह भरे यात्री ऊबने लगे। समय काटने के लिए कुछ लोग समुद्र तट पर घूमने-टहलने निकल गए। मैं भी उन्हीं लोगों में से था। इरावदी नदी से मीलों तक फैला हुआ घना जंगल है। घना इतना है कि दोपहर के समय भी सूरज की रौशनी धरती का स्पर्श नहीं कर पाती।
   _सवेरे का समय था। मौसम काफी सुहावना था। आकाश में बादल घिरे हुए थे। समुद्री हवा के स्पर्श से तन-मन पुलकित हो रहा था। मैं विचारों में खोया हुआ नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ रहा था। करीब एक मील चलने के बाद नदी के दोनों ओर जंगल का क्रम शुरू हो गया। मैं वापस लौटने के लिए मुड़ने को सोच ही रहा था कि घनी झाड़ियों के पीछे से अचानक तीस-चालीस जंगली आदमी निकल पड़े और उन्होंने चारों तरफ से मुझे घेर लिया।_
    उनके काले तन पर केवल कमर में काले रंग की खाल लिपटी हुई थी। इसके आलावा बाक़ी सारा शरीर नग्न था। सबके बाल बड़े-बड़े थे और सभी अपने हाथों में भाले पकड़े हुए थे।
 मेरी मुसीबत का अंदाज लगाना कठिन नहीं था। बुरी तरह से घबरा गया मैं। पसीना छूटने लगा। वे सभी वर्मी भाषा बोल रहे थे जिसे थोडा-बहुत ही मैं समझ रहा था।
   _एक जंगली उनका मुखिया लग रहा था, उसे मैंने अपनी स्थिति समझायी और रास्ता छोड़ देने का आग्रह किया। लेकिन वे नहीं माने और मुझे लेजाकर सरदार के सामने खड़ा कर दिया।_
    मैंने सुना था कि उस जंगल में आदमखोर जंगली रहते हैं जो इंसानों को मारकर, नोच-नोच कर उनका कच्चा मांस खाते हैं।
  _मैंने अब अपने जीवन की आस छोड़ दी। जब वे मुझे पकड़कर ले जा रहे थे तो मेरी हालत उस बकरे की तरह थी जिसे काटे जाने के लिए ले जाया जा रहा हो। मैंने तो सोचा था कि उनका सरदार भी खूंखार और जानबर की तरह भयानक होगा तथा मुझे देखते ही नोच-नोच कर खाना शुरू कर देगा लेकिन वह तो फ़रिश्ते जैसा निकला।_
     उसने मुझे सांत्वना दी कि ये लोग हमेशा आदमी नहीं खाते, सिर्फ खास-खास त्योहारों पर अपने देवता के सामने आदमियों की बलि देते हैं और बलि भी उन आदमियों की दी जाती है जो 60 साल से ऊपर के हों या उन औरतों की जो बाँझ हों।

  उस नेक सरदार ने मेरा खूब अच्छी तरह से स्वागत किया और अपनी ही झोपडी में मेरे ठहरने की व्यवस्था कर दी। मैं समझ गया कि अब जल्दी छुटकारा मिलने वाला नहीं है।
  मेरे एक सहयात्री मित्र थे। मेरे सामान को वे कलकत्ता पहुंचा देंगे, इसलिए मुझे उसकी चिन्ता नहीं थी। चिन्ता तो मुझे अपनी थी कि अब मैं कैसे वापस लौटूंगा ?
   मैंने ध्यान दिया कि सरदार मेरी कलाई में बन्धी सुनहरी कीमती घडी बड़ी ललचाई आँखों से देख रहा था। एक-दो बार उसने उसे अपने हाथ में लेकर भी देखा था।
  मैंने जुआ खेल डाला।
  _घडी उतार कर मैंने सरदार को दे दी। उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। बदले में उसने अपनी बस्ती की जवान, सुन्दर और कम उम्र की लड़कियां और कीमती पत्थर देने का वादा किया।_
    किन्तु मेरी नज़र उसके गले में पड़ी हरे मोतियों की कीमती माला पर थी। उस माला में लाकिट की जगह स्फटिक जैसे पत्थर की एक विचित्र मूर्ति  लगी हुई थी जिसमें से रात के समय रुपहली किरणें निकलती थीं।

फिर भी मैंने उस समय अपनी इच्छा जाहिर नहीं की। आखिर जब मैं झोपडी में जाकर चुपचाप लेट गया तो वह अपने आप मेरे पास आया और कहने लगा–मैं तुम्हारे मन की बात जान गया था। तुम मेरे गले में पड़ी हुई यह माला चाहते हो न ?
मैंने सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति प्रकट कर दी। वह बोला–हरे मोतियों से कीमती इसकी मूर्ति है। हीरे-जवाहरातों की कीमत इसके सामने कुछ भी नहीं है। यह मूर्ति तुमको अमीर बना देगी। इतना ही नहीं, यह खास-खास बातों के आलावा किसी घटना के घटित होने के 24 घंटे पहले ही उसके बारे स्वप्न में बता देगी।
यह कहकर उसने अपने गले में से उतार कर वह माला मुझे दे दी। मैंने ध्यान से मूर्ति की ओर देखा–चमकते पत्थर पर एक विचित्र मानवाकृति खुदी हुई थी जिसका सिर राक्षस जैसा था।
सरदार ने बतलाया कि वह चमत्कारी मूर्ति गांव के इष्ट देवता की है जिसे 14 बाँझ औरतों के खून से नहलाया गया है। किन्तु वह मूर्ति अपना काम तभी करेगी जब गले में रहेगी।
उस मूर्ति में दैवीय ताकत थी। सरदार के उस तोहफे का पहला करिश्मा दूसरे ही दिन देखने को मिल गया। उस रोज सरदार ने मेरी दोस्ती की ख़ुशी में पूरी बस्ती को दावत दी थी। गांव के सिरे पर इष्ट देवता का ‘थान’ था। दोपहर से ही लोग वहां जमा होने लगे। मर्दों की तरह जवान, अधेड़, बूढी औरतें भी सिर्फ काले रंग की चमड़े की पट्टी कमर में लपेटे हुए थीं। सबके हाथ में बांस का डंडा था। मैं सरदार के साथ जंगली घास की चटाई पर बैठा हुआ था।
ठीक समय पर ‘थान’ के चबूतरे पर एक सूअर की बलि दी गयी। फिर एक जंगली भैंसा मारकर उसका मांस भूना गया। सभी ने बड़े चाव से वह मांस खाया और जी भरकर शराब पी। मुझे भी मांस और शराब दी गयी मगर मैंने उसे छुआ तक नहीं। मुझे मिचली-सी आ रही थी। न जाने किस चीज़ की बनी थी वह शराब।

   थोड़ी देर बाद मर्द और औरत मिलकर सब नशे में नाचने लगे। सबसे अन्त में एक विचित्र खेल शुरू हुआ। ज़मीन पर शतरंज जैसा नक्शा बना हुआ था। बीच वाले दायरे में सुपाड़ी जैसी कोई दस की संख्या में वस्तुएं रख दी गयीं। सरदार ने मुझे उसका नाम बताया-- "टक्की"।
_फिर खेल के बारे में समझाते हुए  कहा--खिलाड़ी अपनी टक्की से उन टक्कियों पर निशाना लगाता है। जो कम से कम निशाने में दसों टक्कियों को दायरे से बाहर कर देता है, उसी की जीत समझी जाती है।_
   फिर सरदार ने मेरा मुकाबला एक ऐसे खूंखार जंगली से करवा दिया जो हमेशा तीन बार में दसों टक्कियों को दायरे से बाहर निकालने में सफल हो जाता था।
   मैं सकपका गया। लेकिन सरदार ने हौले से मुझे याद दिलाया कि जब चमत्कारी मूर्ति पास है तब फिर किस बात की चिन्ता ?
   सरदार ने मुझे राय दी कि बाज़ी पर मैं अपनी सूती जाकिट रख दूं। वहां के लोग उसे बहुत कीमती समझ रहे थे। मगर जब मेरी सूती जाकिट के बदले मुकाबले में खेलने वाले जंगली ने सोने की एक माला रख दी तो मुझे आश्चर्य हुआ। उस माला का एक एक दाना अंगूर के बराबर था।

   खेल शुरू हुआ। उस खिलाड़ी ने तीन ही निशाने में दसों टक्कियों को दायरे के बाहर निकाल दिया। अब मेरी बारी आई। दंग रह गया मैं। सबको जानकर हैरानी होगी कि मेरी टक्की अपने आप मेरे हाथ से निकलकर तेज गोली की तरह दायरे में पहुंची और चक्कर लगाते हुए उसने सभी टक्कियों को दायरे से बाहर निकाल दिया।
  _मेरे जौहर ने सारी बस्ती में तहलका मचा दिया। अब तक एक ही निशाने में कोई भी दसों टक्कियों को निकालने में कामयाब नहीं हुआ था। मैंने वही करिश्मा कर दिखाया था। सभी प्रशंसाभरी दृष्टि से मुझे देख रहे थे।_
    एक दिन पड़ोस के दूसरे कबीले के सरदार ने मुझे अपनी बस्ती में अपना हुनर दिखाने का न्योता दिया। उस सरदार ने मेरा बड़ा शानदार स्वागत किया। मुझे लेने के लिए कई नावें आयीं थीं। हर नाव पर एक जवान लड़की थी।
   गांव पहुँचने पर सरदार स्वयं मेरी नाव लेकर अगवानी के लिए आया। उसने मेरे स्वागत के लिए इन्तजाम कर रखा था। कई बकरे हलाल किये गए। शराब का दौर चला। दावतें हुईं। काफी रात तक नाच-गाना चला। जब मैं सोने के कमरे में पहुंचा तो वहां मेरे दिल बहलाव के लिए एक युवा लड़की पहले से ही मौजूद थी।_
   सरदार ने मुझे बतलाया कि वह बस्ती की सबसे खूबसूरत लड़कियों में से एक थी। उसका रंग स्याह होने के बजाय हल्का गोरा था। सचमुच कमाल की हसीना थी वह। यौवन बाढ़ पर था। वह रूपसी सारी रात मेरी सेवा करती रही। मैंने महसूस किया कि मेरे साथ रहने में उसे भी ख़ुशी हुई थी।
  _मैं करीब दो हफ्ते वहां रुका रहा। दिनभर मेरे साथ सरदार रहता था और रात को वह खूबसूरत युवती। उसकी देह में कुछ ऐसी मादकता थी कि वह किसी को भी पागल कर सकती थी। उसने मेरी प्यास बढ़ा दी। लगभग यही हालत उस युवती की भी थी।_
   जब मेरे लौटने का समय हुआ तो वह रोने लगी। वह सचमुच मुझसे बे-इन्तहां मोहब्बत करने लगी थी। मेरे साथ रहने के लिए वह अपना सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार थी।
  _मुझ पर भी उसका जाने कौन- सा जादू असर कर गया था कि उसको छोड़कर जाने का मन ही नहीं हो रहा था।_
   इन दो हफ़्तों में मैंने उस चमत्कारी मूर्ति के बल पर कितने ही चमत्कारपूर्ण कारनामे कर दिखाए थे। पूरी बस्ती के लोगों को इस बात का विश्वास हो गया था कि मेरे पास जरूर कोई दैवीय शक्ति है.
  उस लड़की की शादी होने वाली थी। यह बात मुझे मालूम थी। जब उसके मंगेतर को मालूम हुआ कि उसकी महबूबा मेरे साथ जाने वाली है तो वह एकदम बौखला गया। उसने उस युवती का रात में मेरे पास रहना तो किसी तरह बर्दाश्त कर लिया था लेकिन अपनी होने वाली बीबी का हमेशा के लिए मेरे साथ चला जाना नहीं बर्दाश्त कर सका।
    _फलस्वरूप वह हंगामा मचाने लगा। लेकिन सरदार मेरे ऊपर प्रसन्न था। उसे जब यह बात मालूम हुई तो उसने मेरी मदद करने का आश्वासन दिया। आखिर उसी दिन फिर खेल का आयोजन किया गया और सरदार ने उसी लड़की को दांव पर लगवा दिया। मुझे तो जीतना ही था, सो जीत गया।_
       अब उस गांव के कानून के हिसाब से वह हसीना हमेशा-हमेशा के लिए मेरी हो गयी थी। उसको अब कोई भी नहीं छीन सकता था।

   इसके बाद मैं एक दिन भी वहां नहीं रुका। सरदार ने सुरक्षा को ध्यान में रखकर  15-20 आदमियों की एक टुकड़ी  मेरे साथ कर दी। लगभग 15 दिन पैदल चलने के बाद मैं चटगांव की सीमा पर पहुंचा। सीमा से चार-पांच मील पहले ही जंगलों का सिलसिला ख़त्म हो जाता था।
  _सरदार की भेजी हुई टुकड़ी मुझे वहां तक पहुंचा कर वापस लौट गयी। मैंने उस युवती के साथ चटगांव की सीमा में प्रवेश किया। वहां कुछ अच्छी और कीमती साड़ियां ब्लाउज़ आदि खरीदकर उसे दीं एवं पहनने का ढंग भी बताया।_
   जब वह पहली बार सज-धजकर बादामी रंग की साड़ी में लिपटी हुई मेरे सामने आई तो मैं दंग रह गया। उसका रूप और सौंदर्य उस नयी वेश-भूषा में दुगना हो उठा था। वैसे तो उसका नाम 'चांसी' था किन्तु उसी समय मैंने उसका नया नामकरण कर दिया--'चंद्रा'। जब मैंने पहली बार 'चांसी' को 'चंद्रा' कहकर पुकारा तो वह उमग कर मेरे आगोश में समा गयी। 
 चटगांव में हफ्ता भर रहने के बाद हम दोनों कलकत्ता के लिए रवाना हुए। जंगल में रहने वाली चन्द्रा ने जब कलकत्ता शहर देखा तो आश्चर्य और प्रसन्नता से विस्फारित रह गयी।

 अब यहीं से शुरू होती है उस विचित्र मूर्ति की चमत्कारी कहानी। कलकत्ता में उसी चमत्कारी मूर्ति की सहायता से मैंने एक साल के भीतर ही रेस-कोर्स और शेयर मार्केट के जरिये लाखों रूपये कमाए।
  _रात में सपने में मुझे नंबर और भाव अपने आप मालूम हो जाया करते थे। इतना ही नहीं, मैं जो कुछ मन में सोचता, वह सब पूरा हो जाता था। जिसकी चाहता था, उसके मन की बात जान लेता था। इस अलौकिक शक्ति से मुझे अहंकार हो गया।_
    मैं अपने को दैवीय शक्ति संपन्न समझने लगा। बस, यही समझना मेरे लिए घातक हो गया। अहंकार तो बड़ों-बड़ों का भी नहीं रहा। दैवीय शक्तियों का अपने स्वार्थ में प्रयोग करना और फिर उन्हें अपना मानने की भूल करना मेरे ऊपर भारी पड़ा। प्राकृतिक शक्तियों से खिलबाड़ करने और उन्हें अपने मतलब में इस्तेमाल करने का भारी मूल्य तो चुकाना ही था।
  _मेरा सुख, ऐशो-आराम, ऐश्वर्य और मेरी शान्ति सब नष्ट हो गये। मेरे जीवन का सुनहरा पन्ना सहसा जलकर राख हो गया। इतना ही नहीं, चंद्रा भी मुझसे हमेशा-हमेशा के लिए छिन गयी। फलस्वरूप मेरा जीवन उजाड़ मरघट जैसा हो गया।_
   उन दिनों मेरी सारी पूँजी शेयर मार्केट में लगी हुई थी। मैं चमत्कारी मूर्ति के बल पर  जानता था कि एक हफ्ते के भीतर वह पूंजी तिगुनी-चौगुनी हो जायेगी।

  उस रोज सवेरे से ही बारिश हो रही थी। शाम के 7 बजे थे। मैं इत्मीनान से एक दिलचस्प उपन्यास पढ़ रहा था। सहसा मुझे ऐसा लगा कि जैसे रौशनी और किताब के बीच में कोई छाया आ गयी। किताब के पन्ने पर किसी की काली छाया पड़ रही थी।
  _मैंने नज़र उठाई तो जो कुछ देखा तो उसका वर्णन करना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। वह काली छाया जो हवा में प्रकट हो रही थी, धीरे-धीरे उसने विचित्र रूप धारण कर लिया। वह कुछ मनुष्य की शक्ल-सूरत की ही थी पर थी बिलकुल छाया।_
    उसका डील-डॉल दैत्य की तरह था। उसका सिर मानो छत को छू रहा था। मैं ऑंखें फाड़े उसे देख रहा था। मेरा खून पानी होने लगा और मेरी कँपकँपी छूट गयी।
  _ऐसा लगा कि जैसे उस विकराल छाया के सिर से दो भयानक आँखें मुझे घूर रहीं थीं। क्षणभर के लिए उसकी आँखें मुझे स्पष्ट दिखाई पड़ीं, फिर गायब हो गयीं। अब उन आँखों की जगह से नीली-नीली रौशनी की दो तेज किरणें मेरे ऊपर पड़ रहीं थीं।_
 मैंने चिल्लाने की कोशिश की मगर चिल्ला न सका, बोल भी न सका। बिस्तर से उठने का प्रयास किया, पर बेकार। मुझे लगा--कोई अदम्य शक्ति मेरे ऊपर दबाव डाल रही है और कोई अलौकिक शक्ति मेरे संकल्प को बाधित कर रही है। उस शक्ति का विरोध कर पाना मानव सामर्थ्य से बाहर की बात थी।
_अजीब आतंक की भावना ने मुझे दबोच लिया। वह काली छाया अभी भी मेरे सामने खड़ी हुए थी। उसका मुझे स्पष्ट और विकट अनुभव हो रहा था कि मेरा रोम रोम कांप उठा। लगा-- मैं किसी भी पल चेतनाशून्य हो जाऊंगा और अन्त में मैं अचेत हो ही गया।
      _उस समय शायद रात के दस बजे थे। चन्द्रा अपने कमरे में थी। उसको मेरी स्थिति का ज्ञान नहीं था।_
  चेतनाशून्य अवस्था में जैसे मैंने सपना देखा--वह विकराल  काली छाया और कुछ नहीं, उसी चमत्कारी मूर्ति का भयानक दैत्याकार रूप था। उसका चेहरा बड़ा वीभत्स था। सिर पर भैंसे जैसे दो सींग थे, माथा काफी चौड़ा और नीचे का जबड़ा भारी था। मुंह उसका खुला हुआ था जिससे उसके लम्बे नुकीले और पीले दांत दिखाई पड़ रहे थे। उसकी आँखोँ में मेरे प्रति घृणा और उपेक्षा का भाव था।
   _सहसा मुझे सुनाई पड़ा--मेरी शक्ति को तुम अपनी शक्ति समझने लगे थे, इसलिए अब मेरी शक्ति तुम्हारे पास नहीं रहेगी।_
   इसके साथ ही उसका रोंयेदार हाथ मेरी ओर बढ़ने लगा। उसकी उंगलियां काफी मोटी-मोटी और नाख़ून बेहद लम्बे थे।
   _हाथ बढ़ता रहा.. बढ़ता रहा फिर उसने सहसा एक ही झटके में मेरे गले में पड़ी मोतियों की माला और उसमें लटकी हुई मूर्ति नोच ली।_
   मैं एकबारगी चीख पड़ा।
  अपनी चीख के साथ ही मुझे एक आर्तनाद भी सुनाई पड़ा।
   मैं चौंककर उठ बैठा। मेरा रोम-रोम कांप रहा था। सारा शरीर पसीने से तर था। मैंने गले पर हाथ फेरा--मूर्ति सहित वह माला गायब थी। घबराकर मैंने चन्द्रा को पुकारा मगर कोई जवाब नहीं मिला। लपककर उसके कमरे में पहुंचा तो वहां का दृश्य देखकर सहसा भय और आतंक से काँप उठा।
  _खून से लथ-पथ चन्द्रा की लाश फर्श पर पड़ी थी। उसकी छाती के बीचोबीच चौंडे फाल का एक लम्बा-सा छुरा मूठ तक  धंसा हुआ था।_
   छुरे को पहचानने में मुझे देर न हुई। मैंने एक बार उसे चन्द्रा के मंगेतर के हाथ में देखा था। वह उसी का छुरा था। तो क्या उसी ने उस रात चन्द्रा का खून किया था ?
   _जी हाँ, उसी ने चन्द्रा को मारा था। बाद में सब कुछ मालूम हुआ। अपनी होने वाली बीबी का किसी और का हो जाना उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। बदले की भावना से जल रहा था उसका दिल। अपनी प्रेमिका की बेवफाई से वह पागल हो उठा था और उसी पागलपन में उसने चन्द्रा का खून कर दिया।_
  दुर्भाग्य का कौन-सा पल था कि एक ही रात में मुझे बुलंदी पर पहुंचाने वाली  वह चमत्कारी मूर्ति और मुझे अपने प्यार में सराबोर कर नयी जिन्दगी देने वाली चन्द्रा --दोनों मुझसे एक साथ छिन गयीं।

  अभी मैं इस धक्के को बर्दाश्त भी नहीं कर सका था, तभी पता चला कि शेयर मार्केट का भाव लगातार नीचे गिर रहा है। दो दिन के बाद भाव के साथ-साथ मैं भी हमेशा के लिए नीचे गिर गया, बर्बाद हो गया। मेरी सारी पूँजी ख़त्म हो गयी।
   _मेरे जीवन का यही वह क्षण है जब मुझे पहली बार इस बात का अनुभव हुआ कि मानवीय शक्ति के ऊपर भी एक अदम्य शक्ति है। कौन-सी वह शक्ति है ? क्या मनुष्य उसे पा सकता है ? जीवन में उसे कैसे अनुभव किया जा सकता है ?_
  इन जिज्ञासाओं ने मेरे अन्दर जो प्रेरणा जागृत की, सच पूछिये तो उसी के वशीभूत होकर मैंने उसी समय से "परा-विज्ञान" की दो महान् विद्याओं--"योगविद्या और तंत्रविद्या" पर खोज करना शुरू किया।
  _इस विद्या में मैंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया--उन सब का परिणाम है मेरा वर्तमान._
 *(चेतना विकास मिशन)*
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