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इसरो की चौखट पर अन्धविश्वास 

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निर्दोष

बरसात का मौसम है #सनातनी
लेकिन ज्यादा बरसे तो
यह असंसदीय है
क्योंकि इससे #बाढ़ आ जाती है.

उद्घाटन तक

हाई_वे वाली #सड़कें भी

होती हैं परम सनातनी,
लेकिन बाढ़ आते ही
यह भी हो जाती हैं #असंसदीय,
क्योंकि पानी की धारा के साथ
ये बहक कर चल देती हैं उधर
जिधर #भ्रष्टाचार का
डेरा होता है.

और ये भीमकाय पुल
ये तो उद्घाटन के
हवन-पूजन तक
होते ही हैं सनातनी
लेकिन ये भी बरसात के साथ
बन जाते हैं असंसदीय
क्योंकि ये भी नदी या नहर की
निगोड़ी धारा के बहकावे में आकर
बहक कर जमीन पर
कछुए की तरह लेट जाते हैं.

हमारा सनातनी #विकास
यहीं नहीं रूकता

अन्तरिक्ष में जाने वाले

मिशन_चन्द्रयान_2 भी तो

बालाजी_मन्दिर में

श्रद्धा के नारियल फूटने तक
परम सनातनी बना रहा
लेकिन जैसे ही इसरो में
एक साहेब पाल्थी मारकर बैठे
यह नालायक तुक्ष वस्तु
असंसदीय ही नहीं

विद्रोही भी हो गया.

भड़क गया.
यह #ग़द्दार #चन्द्रमा पर
उतरने से पहले
इसलिए विद्रोह कर दिया कि
जिस #अन्धविश्वासी साहेब को

ग्रहउपग्रहक्षुद्र_ग्रह और #तारा

का भेद नहीं मालूम
उसके सामने घुटना टेक कर
इसरो #पृथ्वी और #चन्द्रमा के

आर्बिट के रहस्य को समझा रहा था.

विज्ञान की यह दुर्दशा देखकर

विक्रम व #प्रज्ञान की अन्तरआत्मा

आचानक चीत्कार उठी
उसने विज्ञान को #अंधविश्वास व

रूढ़िवादियों से बचाने के लिए

अपने पहचान का उत्कर्ष कर दिया

दुनियाँ के लम्पट कहते हैं कि

‘विक्रम’ व ‘प्रज्ञान’
अपना मार्ग भटक गए.
लेकिन दुसरे ही दिन

इसरो की चौखट पर पधारे

अन्धविश्वास के कंधों पर
सिर रखकर
इसरो को फफक कर रोते हुए देखकर
यह तय हो गया
‘विक्रम’ व ‘प्रज्ञान’ नहीं
मुल्क का विज्ञान भटक गया है.
बेशक वह अाकालमृत्यु मर गया है.
चन्द्रमा की सतह से
घायल विक्रम कराहते हुए कह रहा है-
“अपना मज़हब, अपना नफरत,
अपना अन्धविश्वास व पाखण्ड,
मनुष्य अपनी #धरती पर ही रख
चन्द्रमा पर इसे ले जाकर क्या करेगा?”

✍🏻©® #अजयकुमारसिंह_निर्दोष
वाराणसी (उ.प्र.)

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