– तेजपाल सिंह ‘तेज’
6 अक्टूबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायालय कक्ष (Court No. 1) में सुनवाई के दौरान, एक वरिष्ठ वकील राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश B.R. Gavai की बेंच की ओर जूता फेंकने का प्रयास किया। The Economic Times+2Jagran+2 वह “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे” जैसा नारा लगाते हुए कहा गया कि उनके नाराज़गी की वजह CJI की पहले की कुछ टिप्पणी थी, जो उन्होंने धार्मिक विषय (खजुराहो मंदिर / विष्णु प्रतिमा पुनर्स्थापना) से संबंधित एक मामले में कही थी। AajTak+2ABP News+2 लेकिन राकेश किशोर को बुलडोजर शासन की बात पर ज्यादा गुस्सा था। विष्णु मंदिर की बात को उसने एक तरह छुआ ही नहीं। लेकिन मीडिया बार-बार विष्णु मंदिर की बात को ही केंद्र में रखकर टिप्पणी करता है। खैर!…
· संयोगवश, जूता बेंच को नहीं छू पाया; सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल वकील को नियंत्रित कर लिया। The Economic Times+3Jagran+3AajTak+3
· इस घटना के बाद, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने राकेश किशोर का लाइसेंस निलंबित कर दिया और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने उन्हें “गंभीर कदाचार” घोषित किया। The Times of India+3Live Hindustan+3AajTak+3
· CJI Gavai ने इस घटना पर बाद में प्रतिक्रिया दी, कहा कि “सोमवार को जो हुआ उससे मैं और मेरे साथ बैठे न्यायाधीश स्तब्ध रह गए थे, लेकिन अब हमारे लिए यह एक भूला हुआ अध्याय है।” Live Hindustan+3ABP News+3AajTak+3
· जस्टिस उज्जल भुईयां (बेंच में) ने कहा कि यह “संस्थान का अपमान” था और इसे मजाक नहीं माना जाना चाहिए। ABP News+1
· सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे “अक्षम्य अपराध” करार दिया। ABP News+1
किस आधार पर “मनुवाद / दलित–उत्पीड़न” का आरोप?
आपने जिस तरह “मनुवादियों के उड़ जाएंगे होश” जैसे दावे पूछे हैं, वे इस प्रकार की तर्क धाराओं पर आधारित हो सकते हैं:
1. जाति-भूमि पहचान:
· CJI B.R. Gavai अनुसूचित जाति / दलित पृष्ठभूमि से हैं (SC) Indiatimes+3Wikipedia+3The Times of India+3
· इसलिए, यदि उन पर हमला किया जाए, इसे “दलित पर हमला” के रूप में देखा जाना चाहिए
· यदि समाज या मीडिया इसे धार्मिक नाम (सनातन धर्म) के आधार पर चित्रित करें, तो वह “जाति तर्क” को गौण कर दे सकता है।
2. प्रतिक्रिया का विभाजन:
· यदि इस घटना के बाद सरकार / मीडिया / पुलिस की कार्रवाई और जुबानी प्रतिवादी (वकील) के प्रति उदारता यह संकेत देती हो कि आरोपी को संरक्षण मिलता है जब वह उच्च जाति या “धार्मिक भावना” का नाम लेकर काम करे।
· विशेष रूप से यदि आरोपी को तुरन्त गिरफ्तार नहीं किया गया, या जिस तरह की नाराज़गी व्यक्त की गई — “सनातन का अपमान” — वह धार्मिक चेतना को आगे रखती है।
— यदि दलित व्यक्ति पर कुछ ऐसा होता, तो उसकी कार्रवाई पर अधिक कठोर प्रतिक्रिया होती — यह एक तुलनात्मक दलील हो सकती है जो “मनुवाद” (जातिवाद) की धारणा को पुष्ट करना चाहती है।
3. संविधान और न्यायपालिका की गरिमा:
· यदि न्यायपालिका या सरकार ऐसी कार्रवाई को “मनुवादित ढंग” से नियंत्रित नहीं कर पाती, तो उस पर आरोप लगे कि वह दलित न्यायाधीशों की सुरक्षा नहीं कर पा रही।
· यह दावा किया जा सकता है कि “जाति-उत्पीड़न” का स्वरूप बदल गया है — न कि सीधे हिंसा, बल्कि सामाजिक-अनदेखी और संरचनात्मक पक्षपाती रवैये के रूप में।
किन बिंदुओं पर सावधानी होनी चाहिए (तर्क विपक्ष):
Ø प्रमाण की कमी
· अभी ऐसा कोई सार्वजनिक तथ्य नहीं दिखता कि इस घटना में सुरक्षा व्यवस्था, गिरफ्तारी प्रक्रिया, या मीडिया कवरेज में निहित पक्षपात बिल्कुल “जाति” के आधार पर किया गया हो।
· “मीडिया ने हीरो बना दिया” या “पुलिस ने जूते दे दिए” जैसे कथन प्रचार मूलक हैं और सटीक तथ्यपरक नहीं दिखते।
Ø आक्रामक बयान और भाषण
· घटना के बाद जो महिलाओं, वक्ताओं या पत्रकारों से आक्रामक भाषा (सर कलम करने की बातें) कही गई, वे अवैध और उकसावे वाली हो सकती हैं।
· किसी अपराध की सजा या कार्रवाई न्यायालय या अभियोजन विभाग तय करेगा — किसी को भी सार्वजनिक रूप से “सर कलम कर देना चाहिए” कहना कानूनी और नैतिक रूप से ठीक नहीं है।
Ø मुकदमेबाज़ी का सवाल:
· यदि वकील या आरोपी किसी कानून की धारा (अवमानना, हमला, कोर्ट व्यवधान) के अंतर्गत दायित्वों का उल्लंघन किया हो, तो उन्हें उसी अनुपात में न्याय प्रक्रिया से गुजरना चाहिए, न कि संवेदनशीलता के नाम पर अदालती निष्क्रियता हो।
Ø “मनुवाद” से बड़े दलित चिंताएँ:
· यदि इस घटना को सिर्फ “मनुवाद” के दृष्टिकोण से देखा गया, तो खतरा है कि अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न (न्यायपालिका की सुरक्षा, कानून का शासन, अभिव्यक्ति की सीमाएँ) पीछे छूट जाएँ।
· यह कहना कि “मनुस्मृति का शासन आ रहा है” एक चिंताजनक (लेकिन अभी प्रमाणहीन) दावे की ओर जाता है — इसे तथ्य-आधारित परीक्षण की जरूरत है।
क्या वास्तव में “मनुवादियों के होश उड़ जाएंगे”?
यह एक रैलिटोरिक (उत्तेजक) दांव है — यानी कहा गया है कि इस घटना और उसकी प्रतिक्रिया से, समाज में जो लोग जातिवादी विचारधारा रखते हैं, उन्हें झटका लगना चाहिए। लेकिन इस दावे को सत्यापित करने के लिए हमें निम्न बातों को देखना होगा—
· क्या मीडिया में धाराप्रवाह समर्थन या निंदा हुई — यानी आरोपी को ब्रांड किया गया या न्यायपालिका को समर्थन मिला?
· क्या सरकार / पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की, और क्या न्यायपालिका की सुरक्षा में सुधार की दिशा में कदम उठाया गया?
· क्या इस घटना के बाद समूचे समाज में जाति-आधारित विरोधाभास स्पष्ट हुए — जैसे दलितों की सुरक्षा, न्यायालय में प्रतिनिधित्व, संवैधानिक समानता पर बहस?
· क्या आगे की घटनाएं होंगी जो इसी तरह की चुनौतियों को जन्म देंगी?
अगर हाँ — तो इस दांव (कि “मनुवादियों के होश उड़ जाएंगे”) का अस्थायी सच बनने की संभावना है। लेकिन अभी, हमें सावधानी पूर्वक इस दावे को “संभाव्यता” की श्रेणी में रखना चाहिए, न कि निश्चित फ़ैसला।
सुझाव: कैसे इस घटना को समझा जाए और आगे क्या हो सकता है:
1. न्यायालय से स्पष्ट कार्रवाई अपेक्षित है
· इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट या संबंधित न्यायालय को एक निष्पक्ष जाँच आदेश देना चाहिए — सुरक्षा चूक क्यों हुई, आरोपी की मंशा क्या थी, कदाचार की सज़ा क्या हो (निलंबन, अवमानना, वकील पेनल्टी आदि)।
· यदि दोष सिद्ध हो, तो न्यायपालिका को यह संदेश देना चाहिए कि किसी को भी अदालत के सम्मान पर हमला करने का अधिकार नहीं है।
2. मीडिया एवं नागरिक विमर्श की भूमिका
· मीडिया को तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट करना चाहिए — आरोपियों की पृष्ठभूमि, न्यायिक प्रक्रिया, सुरक्षा पर सवाल — न कि भावनात्मक उत्तेजना।
· समाज को यह चर्चा करनी चाहिए कि न्यायपालिका की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की सीमा, धार्मिक भावना और कानून — ये सब कैसे तालमेल में हो सकते हैं।
3. दलित न्यायाधीश एवं असाधारण बायस की सुरक्षा:
· यदि न्यायाधीश जाति या संवेदनशील पृष्ठभूमि से हैं, तो उनकी सुरक्षा और सम्मान पर विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि वे “म्नुवाद-लक्षित” न हों।
· न्यायिक संस्थान को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भ्रामक आचरण न हो — जैसे कि किसी पक्ष को कोटा-अनुपात, मीडिया दबाव, या सामाजिक अपमान से दबाया जाना।
4. कानूनी सुधार और सुरक्षा प्रोटोकॉल
· कोर्ट सुरक्षा, वकील अधिनियम, अवमानना कानून आदि की समीक्षा होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं कम हों।
· वकीलों और न्यायालय के बीच शिष्टाचार, पेशेवर आचार संहिता को पुनर्जीवित करना चाहिए।
आपने जो “मनुवादियों के उड़ जाएंगे होश” जैसा बयान उद्धृत किया है, वह एक भावनात्मक और नाटकीय वक्तव्य है जो यह संकेत देना चाहता है कि इस घटना की प्रतिक्रिया समाज में बहुत गहरी हलचल करेगी — खासकर उन लोगों के लिए जो जातिगत श्रेष्ठता की सोच रखते हैं। यह संभव भी है — यदि न्यायपालिका, सरकार और जनता मिलकर यह संदेश दें कि किसी भी व्यक्ति को (चाहे वह दलित हो या उच्च जाति) न्यायालय की गरिमा पर हमला करने का अधिकार नहीं है। लेकिन अभी, हमारी स्थिति यह है—
· घटना की पुष्टि हो चुकी है, प्रतिक्रियाएँ गंभीर हैं
· न्यायपालिका ने अस्थायी प्रतिक्रिया दी है, लेकिन ठोस कार्रवाई अभी पूरी तरह पारदर्शी और सार्वभौमिक नहीं दिखती
· “मनुवाद” का आरोप एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और समाजशास्त्रीय संभावना है, लेकिन उसे तुरंत सत्य मानना जोखिम भरा होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका, अभिव्यक्ति और कार्रवाइयाँ इस तरह की घटनाओं में कितनी “दायित्व” के अनुरूप हैं — इस विषय पर नीचे कुछ तथ्य, विश्लेषण और निष्कर्ष प्रस्तुत हैं–
तथ्य: PM मोदी ने क्या किया / कहा है
इस घटना (सीजेआई बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश) पर प्रधानमंत्री ने ये कदम उठाए/बयान दिए–
1. कड़ी निंदा:
· पीएम मोदी ने इस घटना को “utterly reprehensible” (पूर्णतः निंदनीय) कहा। (The Indian Express+2Outlook India+2)
· उन्होंने “हर भारतीय गुस्सा है” (“angered every Indian”) जैसी भाषा प्रयोग की।( mint+1)
2. Chief Justice से संवाद:
· उन्होंने मुख्यमंत्री (सीजेआई) गवई से इस घटनाक्रम के बाद बात की, अपनी संवेदना व्यक्त की। The New Indian Express+1
3. न्यायपालिका के शांतिपूर्ण व्यवहार की सराहना
· पीएम ने सीजेआई गवई की शालीनता और धैर्य की प्रशंसा की कि कैसे उन्होंने कोर्ट के अंदर शांत बने रहने का व्यवहार किया। India Today+1
4. संवैधानिक भावना और संस्थागत गरिमा पर ज़ोर
· उन्होंने कहा कि ऐसे कृत्य-सन्निकटन समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। न्यायपालिका की गरिमा और संविधान की भावना की रक्षा जरूरी है। Firstpost+2Outlook India+2
1. दृष्टि-विस्तार की बातें
· पीएम मोदी ने पिछले मौकों पर भी न्याय व्यवस्था सुधार, “justice for all”, “speedy and accessible justice” जैसे वादे और नीतिगत घोषणाएँ की हैं, जैसे “अमृत काल” विषय के अंतर्गत न्यायिक प्रणाली को आम आदमी के लिए और अधिक सुलभ बनाने की बातें। Hindustan Times
जहाँ ये कदम पर्याप्त नज़र आते हैं — लेकिन सीमाएँ भी दिखती हैं:
नीचे कुछ ऐसी चीजें हैं जहाँ पीएम मोदी की कार्रवाइयाँ “दायित्व पूरा करना” मानक से मिलती-जुलती हैं, और कुछ जहाँ अपेक्षाएँ अभी पूरी नहीं हुईं–
1. सकारात्मक पहलू:
1) संविधान और न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा पर जोर — यह संकेत देता है कि संस्थागत सम्मान महत्वपूर्ण है।
2) भविष्य के वादे — न्याय प्रणाली को आम आदमी के लिए अधिक सुलभ एवं तेज बनाने के वादे, न्यायालय भाषा, कानूनी प्रक्रिया आदि सुधारने की बातें।
3) मीडिया एवं सार्वजनिक संवाद — पीएम की प्रतिक्रिया से यह संदेश जाता है कि नेतृत्व स्थिति की गंभीरता को पहचानता है।
4) स्पष्ट निंदा एवं भाषण — ऐसे सार्वजनिक स्तर पर नकारात्मक घटना पर तुरंत प्रतिक्रिया देना यह दिखाता है कि शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह चुप नहीं है।
2. नकारात्मक पहलू:
1) संरचनात्मक सुधार — केवल बयानबाज़ी पर्याप्त नहीं, सुरक्षा उपाय, वकील-आचार संहिता, न्यायालय के भीतर व्यवहार संबंधी मानक आदि पर निरंतर और ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
2) विश्वसनीयता एवं त्वरितता — जनता को यह देखना होगा कि ये वादे कब और कैसे लागू होंगे; अपेक्षा है कि ऐसे मामलों में निष्कर्ष जल्दी निकलें, लेकिन प्रक्रिया अक्सर धीमी होती है।
3) भेदभाव / समानता के संवेदनशील मामले — यदि घटना में “जाति”, “धार्मिक भावनाएँ” या “दलित उत्पीड़न” जैसे तत्व हों, तो अपेक्षा होती है कि केंद्र सरकार उन विशेष कारकों को संबोधित करे। अब तक देखा जाना है कि किस तरह से “मनुवादी मानसिकता” जैसे आरोपों का जवाब सरकार द्वारा दिया गया है।
4). कार्रवाई का दायरा और गहराई — निंदा से आगे क्या कदम उठाए गए, जैसे आरोपी की गिरफ्तार या न्यायालय द्वारा सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना, अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
पिछले उदाहरण: व्यवहार और प्रवृत्ति (पैटर्न):
यहाँ कुछ पिछली घटनाओं के उदाहरण हैं जिनसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पीएम / सरकार ऐसी संवेदनशील घटनाओं में कितना सक्रिय रही है:
· “न्यायपालिका की स्वतंत्रता” विषय पर कानून मंत्री और अन्य सरकार सत्ताधारी लोगों से लगातार सवाल उठते रहे हैं। सरकार की ओर से ये कहा जा चुका है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित करने का कोई प्रयास नहीं हो रहा। India Today
· “आम आदमी की भाषा में न्याय” और “तीव्र न्याय वितरण” जैसे मुद्दों पर सरकार ने योजनाएँ शुरू की हैं। Hindustan Times
लेकिन अक्सर इन योजनाओं की गति, पैमाना और निष्पादन में देरी देखने को मिली है- जैसे न्यायालयों में मामलों का लंबित होना, उच्च न्यायालय/नीचे की अदालतों में संसाधन-संरचनात्मक असमानताएँ, न्याय क्षेत्र में भेदभाव जैसी शिकायतें आदि।
निष्कर्ष: कितना सफल हो रहे हैं?
अगर “दायित्व निभाना” से मतलब है घटना पर सार्वजनिक बयान देना, संस्थान की गरिमा बनाए रखना, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सम्मान देना, तो प्रधानमंत्री मोदी इस घटना में अपेक्षाकृत तेज़ी से और स्पष्ट रूप से पेश आये हैं। लेकिन यदि “दायित्व निभाने” से मतलब है भविष्य में ऐसी घटना वापिस न हो, सुरक्षा और व्यवहार संबंधी संस्थागत सुधार, जाति या धार्मिक चेतनाएँ हों तो उनका संवेदनशील व सावधानीपूर्ण तरीके से समाधान करना, तो अभी भी बहुत काम बाकी है।
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