मुनेश त्यागी
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यूज क्लिक के एडिटर इन चीफ प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को बुनियादी अधिकारों के खिलाफ और गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है। इसके बाद प्रबीर पुरकायस्थ जेल से बाहर आ गए हैं। यह भारत के स्वतंत्र, जनसमर्थक, सामाजिक न्याय और जनवादी लेखकों, पत्रकारिता और आजाद मीडिया के लिए स्वर्णिम दिन है।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने भारत के जनतंत्र का गला घोटने की लगातार प्रक्रिया पर जैसे रोक लगा दी है और भारत के लोकतंत्र को जैसे जिंदा कर दिया है। इससे भारत की न्यायपालिका की आजादी पर लगातार मंडराते बादल भी दूर हो जाने वाले हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पिछले कई फैसलों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन में जान डाल दी है। इससे पहले भी भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बिलकिस बानो के कानूनी हकों की रक्षा की थी और बिलकिस बानो केस के अपराधियों को जेल की सींकचों के पीछे भेजा था। चंडीगढ़ के मेयर चुनावों में साजिशकर्ता चुनाव अधिकारी के जनतंत्र विरोधी कदमों पर रोक लगाकर, चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी, निष्पक्षता और जनतंत्र की रक्षा की थी।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपने बहुत ही महत्वपूर्ण फैसले में संविधान के धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा की थी और स्पष्ट तौर से स्थापित किया था कि धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत भारतीय संविधान का बुनियादी सिद्धांत है और भारतीय राष्ट्र-राज्य का कोई धर्म नहीं है, वह पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष है।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले कई साल से जेल में सडाये जा रहे गौतम नवलखा को जमानत दी और उन्हें जेल से बाहर निकलने में मदद की। इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जमानत देकर जेल से बाहर निकाल कर जनतंत्र की हिफाजत की है।
इन सब मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और दूसरी केंद्रीय एजेंसी की दलीलों को सिरे से ही नकार दिया और उनकी तमाम दलीलों को आजादी के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत और गैरकानूनी बताया और केंद्र सरकार द्वारा अपने विरोधियों को जेल में डालने की मुहिम पर फिलहाल तो रोक लगाकर कानून के शासन को सर्वोच्चता प्रदान की है।
न्यूज़ क्लिक के मुख्य संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को जमानत देकर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की मनमानी, संविधान विरोधी और गैरक़ानूनी गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाने का काम किया है। प्रबीर पुरकायस्थ की जमानत का मामला भारत की प्रेस की आजादी के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। इससे आजाद पत्रकारिता और लेखन को नवजीवन मिलेगा। अब आजाद पत्रकारों के सिर से सरकारी खौफ और मनमानी के बादल हट जाएंगे। अब वे भयभीत हुए बिना, अपनी सही बातों को जनता तक पहुंचने में और ज्यादा समर्थ हो जाएंगे। अब वे बेखौफ होकर सरकार की जनविरोधी नीतियों के भयंकर परिणामों को जनता तक पहुंचने में और ज्यादा समर्थ हो जाएंगे।
प्रबीर पुरकायस्थ या उनके संस्थान का क्या दोष था? बस यही ना कि वे असली खबरों को जनता के बीच ले जाकर अपने पत्रकारता के पेशे को चार चांद लगा रहे थे और बिना किसी लालच और दबाव के पत्रकारिता के महान पेशे को बेचकर पैसा, नाम, पद या अवांछित लोकप्रियता नही कमा रहे थे।
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवीण पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को एकदम अन्यायपूर्ण, बुनियादी अधिकारों के खिलाफ और गैरकानूनी घोषित कर दिया है। इस केस में दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें जरूरी कागजात नहीं दिए गए थे और ना ही उनके वकील को जरूरी और कानूनी सूचनाएं दी गई थीं। न्यूज़ क्लिक ने किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन में उस समय बहुत प्रशंसनीय काम किया था और किसानों के हितों की बहुमूल्य और ऐतिहासिक हिफाजत की थी, जब बीजेपी और भारत के प्रधानमंत्री, इस आंदोलन को खालिस्तानियों द्वारा फंड दिए जाने की बात कर रहे थे। उसे समय प्रबीर पुरकायस्थ और उनके संस्थान के समस्त मीडिया कर्मियों ने अपना सब कुछ दाव पर लगाकर, किसानों की जायज मांगों को जोरदार तरीके से उठाया था और सरकार की किसान विरोधी नीतियों और मंशा का पर्दाफाश किया था।
सर्वोच्च न्यायालय का इस मामले में दिया गया यह अति महत्वपूर्ण फैसला सच में जनतंत्र के लिए जीवनदायिनी साबित होने जा रहा है। यह फैसला सरकार और बीजेपी-आरएसएस के फासीवादी और अधिनायकवादी मुहिम के लिए भारी धक्का है। सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान समय में दिया गया यह फैसला भारत के संविधान, जनतंत्र और मीडिया और प्रेस की आजादी के हिफाजत करने में बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
सर्वोच्च न्यायालय के इन फैसलों ने भारत की न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बहुमूल्य हिफाजत की है और उसे एक नया जीवन और हौंसला प्रदान किया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला पत्रकारों, लेखकों, फेसबुक और व्हाट्सेप पर लिखने वालों, विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस व मीडिया की आजादी की बेशकीमती रक्षा करने वाला सिद्ध होने जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला स्वतंत्र पत्रकारों और लेखकों के लिए एक राहत की उम्मीद लेकर आया है और उन्हें नया हौसला प्रदान करने वाला है।