डॉ. विकास मानव
_व्यवहार में देखते हैं कि किसी भी वस्तु के निर्माण में चार कारण होते हैं : उपादान कारण (Material Cause ), निमित्त कारण (Efficient Cause), उपकरण ( Instruments ) और उपभोक्ता (User/ Purpose)।_
सुनार सोने से आभूषण बनाता है : सोना उपादान कारण है, सुनार निमित्त कारण, जिस यन्त्र की सहायता से बनता है, वह उपकरण और जो आभूषण को पहनता है, वह भोक्ता है। इनमें से किसी एक के न होने पर कार्य निष्पन्न नहीं होता।
जगत् की उत्पत्ति में प्रकृति उपादान कारण है, ईश्वर निमित्त कारण, ईश्वर के बनाए ऋत्-सत्य के अटल नियम उसके उपकरण हैं और जीव भोक्ता है अथवा गौंण निमित्त कारण (Secondary Efficient Cause)। इनसे ही सारी चर-अचर सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।
सृष्टि-उत्पत्ति के विषय में वेद और उपनिषद् में अनेक मन्त्र हैं.
ऋग्वेद (10.190.1) में कहा गया है :
ऋतंं च सत्यं चाभीद्धात्।
अर्थात् परमात्मा ने सर्वप्रथम ऋत : सृष्टि के नियमों (Cosmic laws) और सत्य : आध्यत्मिक नियमों (Moral laws) की उत्पत्ति की।
ऋग्वेद के निम्न मन्त्र में परमात्मा की तुलना शिल्पी से की गई है।
ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मारइवाधमत् ।
देवानां पूर्व्ये युगेsसतः सदजायत ।।
— ऋग्वेद 10.72.2
अर्थात् ब्रह्माण्ड के स्वामी (परमात्मा) ने लुहार की भाँति इन दिव्य पदार्थों (The Holy Grail) के परमाणुओं ङको धौंका, तप्त किया। युग के पूर्व में (सृष्टि उत्पत्ति समय) सत् (अव्यक्त/ शाश्वत प्रकृति) से असत् (व्यक्त/ परिवर्तनशील) उत्पन्न हुआ।
इसी प्रकार ऋग्वेद का एक और मन्त्र है :
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।
-ऋग्वेद 10.190.3
अर्थात् सूर्य, चन्द्र को धारण करने वाले परमेश्वर ने पृथ्वी और द्युलोक एवं अन्तरिक्ष को उसी प्रकार रचा जैसे प्रत्येक कल्प में रचता है । अर्थात् उसके नियम अटल हैं और शाश्वत हैं तथा हर कल्प में रचना एक सी ही होती है।
मुण्डक उपनिषद (1.1.7) में सृष्टि की रचना का कार्य मकड़ी के जाले के दृष्टान्त से समझाया गया है :
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाsक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्।।
अर्थात् जिस प्रकार मकड़ी (जाले को) बनाती है और समेट लेती है, जिस प्रकार पृथ्वी में औषधियाँ उत्पन्न होती हैं (और) जिस प्रकार जीवित मनुष्य से केश और लोम उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी ब्रह्म (के प्रकृति रूपी शरीर) से सारा चराचर जगत् उत्पन्न होता है।
यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मकड़ी की आत्मा अपने जड़ शरीर से जाला उत्पन्न करती है । न तो मकड़ी का मृत शरीर जाला उत्पन्न कर सकता है और न ही मकड़ी की आत्मा शरीर के अभाव में जाला उत्पन्न कर सकती है । इसी प्रकार औषधियाँ पृथ्वी से नहीं, बीज से पैदा होती हैं और केश, लोम आदि भी जीवित शरीर से उत्पन्न होते हैं ; पर होते जड़ शरीर से ही हैं, आत्मा से नहीं।
इसी प्रकार परमात्मा अपने में स्थित प्रकृति से समस्त संसार की रचना करता है। अतः प्रकृति उपादान कारण है और परमात्मा निमित्त कारण।
सृष्टि-उत्पत्ति के संदर्भ में गीता के निम्न श्लोक भी अवलोकनीय हैं-
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।।
— गीता 8.18
अर्थात् (ब्रह्मा की) सुबह होने पर (सृष्टि उत्पत्ति के समय) अव्यक्त से सभी व्यक्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं ; (ब्रह्मा की) रात्रि होने पर (प्रलय के समय) अव्यक्त कही जाने वाली प्रकृति में सभी लय हो जाते हैं।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनाsनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।
— गीता 9.10
अर्थात् मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है। इसी कारण जगत् का चक्र घूम रहा है.
उपरोक्त शास्त्रीय प्रमाणों से सिद्ध होता है कि प्रकृति सृष्टि/ जगत् का उपादान कारण (Material Cause) है और ईश्वर इस का कुम्हार की भांति निमित्त कारण (Efficient Cause ) है। प्रकृति ईश्वर से भिन्न शाश्वत सत्ता है।
ईश्वर स्वयं प्रकृति का रूप धारण नहीं करता जैसा कि अद्वैत वेदान्त का सिद्धांत है।
(लेखक मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक एवं चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)

