राकेश श्रीवास्तव
आज स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन पर उनके विषय मे चर्चा करते हुए हमें यह मानने में लेशमात्र भी संकोच नहीं होना चाहिए कि भारतीय समाज ने उनके विचारों को वह स्थान नहीं दिया जिसके वह वास्तविक अधिकारी थे।आज के समय मे स्वामी विवेकानंद जी के नाम का भी एक आभूषण की तरह से इस्तेमाल करने का चलन हो गया है।जन्मदिन और पुण्यतिथि पर याद करके अन्य महापुरुषों की तरह ही तस्वीरों पर माल्यार्पण करने की,सेमिनार और किताबों मे फ्रेम करने की वस्तु बना दिया गया है।उनके विचारों का जन मानस में व्यापक प्रचार प्रसार न कर कर उनको केवल मठ और सेवा का पर्याय बनाने का प्रयास रहा,जबकि उनके विचारों के लावा को पूरे देश में विस्फोटित होना चाहिए था।

उनके शताब्दी वर्ष पर मेरी आयु मात्र पांच वर्ष की थी पर पिताजी द्वारा घर पर लगाई गई उनकी तस्वीर आज तक संदेश देती है।समय के साथ जिस तरह से मान्यताओं का अवमूल्यन हुआ उसने विचारों को आडंबरों की काई से ढक दिया।इस काई की फिसलन मे हमारी पारिवारिक,सामाजिक और राजनैतिक चेतना भी दूषित हो गई है।हमने अपने महापुरुषों को अलमारियों मे कैद कर दिया या बहुत हुआ तो ड्राइंगरूम मे सजा दिया।मां-बाप बच्चों को सिखाने लगे कि यह सब केवल किताबी आदर्श हैं जिसका दंश आज समाज झेल रहा है। अविश्वास,झूठ,नफरत,भ्रष्टाचार,हिंसा,बलात्कार,हत्या हमे उद्वेलित नहीं करते हैं।हम इन सबको जस्टीफाई करने के लिए अपनी सुविधानुसार तर्क गढ़ लेते हैं।
ऐसे मे हम लोगों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि उनके विचारों और कार्यों को सही परिपेक्ष मे समाज मे रखा जाय वरना मानव सेवा के इस मसीहा को भी पोस्टर ब्वाय बनाने हेतु सक्रिय लोग अपने अभियान को आगे बढ़ाते रहेंगे।जिस प्रकार कुछ लोग शहीदे आजम भगतसिंह के विचारों को बिना समझे उन्हें हिंसा के पैरोकार के फ्रेम मे जकड़ने की कोशिश करते रहते हैं वैसे ही स्वामी जी की भी मनमाफिक छवि गढ़ने का दुष्चक्र चला करता है।यह भगत सिंह को पढ़ने मे उतनी ही उदासीनता बरतते हैं जितनी विवेकानंद को पढऩे मे।पूर्ण समानता रखते हुए दोनों महापुरुषों के साहित्य से दूरी बनाए रखते हुए व्हाट्सएप युनिवर्सिटी के ज्ञान भंडार पर आश्रित रहते हैं। यहां तक कि न तो “मै नास्तिक क्यों हूँ” और न ही “शिकागो भाषण” तक पढऩे की जहमत उठाते हैं।
स्वामी जी के शिकागो भाषण ने विश्व मे उन्हें प्रतिष्ठित किया और लोगों मे उनको जानने समझने की उत्कंठा बढ़ती गई। परंतु अपने देश में हमने उन्हें केवल शिकागो भाषण तक ही सीमित कर दिया और उसको भी गंभीरता से समझने की जहमत नहीं की।राम, कृष्ण, महाबीर,बुद्ध,पैगंबर,ईसा,कबीर, नानक,गांधी की तरह ही विवेकानन्द भी केवल श्रद्धा की चारदीवारियों में कैद कर दिए गए।उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास नहीं हुआ या अत्यल्प हुआ।जिस तरह से गांधी जी को केवल स्वच्छता अभियान से ही जोड़ने का प्रयास है उसी प्रकार से स्वामी जी को केवल सेवा या उग्र हिन्दुवाद से जोडने का प्रयास चल रहा है।इसके विपरीत यूरोप,अमेरिका में उनका खुले दिल से स्वागत हुआ।लोगों मे उनसे ग्रहण करने की अदम्य लालसा थी।
भारतीय चेतना को जाग्रत स्वरूप प्रदान करने वाले मनस्वी स्वामी विवेकानंद जी के विचारों को वह प्रचार-प्रसार नही मिला जिसके वह नैसर्गिक अधिकारी थे।शिकागो की धर्मसंसद मे विश्व के विभिन्न देशों एवं धर्मों के प्रतिनिधियों को झकझोरने वाले ओजस्वी स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो भाषण के संबोधन की विषय वस्तु का एक एक वाक्य,एक एक शब्द वास्तव मे अमृत कलश है।मेरी लुई बर्क शिकागो से प्रकाशित अखबारों के हवाले से कहती हैं कि स्वामी जी ने अपने भाषण मे कहा था “मुझे आप से कहने मे गर्व है कि मै ऐसे धर्म का अनुयायी हूं जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत मे एक्सक्लुयजन शब्द का अनुवाद नही है।” इस एक वाक्य मे अपने आप मे एक सम्पूर्ण विचारधारा निहित है।स्वामी जी के भाषण मे कहा
“मैं एक ऐसे धर्म का अनुयाई होने में गर्व का अनुभव करता हूं जिसने संसार को सहिष्णुता और स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है।हम लोग केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्म सत्य मानते हैं।मुझे आपसे कहने में गर्व है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूं जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में एक्सक्लूजन शब्द अननुवाद्ध है।मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मो और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है
मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि जिस वर्ष यहूदियों का मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया उसी वर्ष विशुद्धतम यहूदियों के एक अंश को जिसने दक्षिण भारत आकर शरण ली थी,अपने हृदय में स्थान दिया था।मैं उस धर्म का अनुयाई होने में गर्व अनुभव करता हूं जिसने महान जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह आज भी कर रहा है।” स्वामी जी का संबोधन लोगों के ह्रदय मे बस गया।उनके भीतर अन्य धर्मों के प्रति न तो निरादर और न ही किसी भी प्रकार की घृणा थी।
अपने भाषण मे आगे स्वामी जी दो श्लोकों के माध्यम से अपनी बात कहते हैं।
“भाइयों, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं जिसकी आवृत्ति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृत्ति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं :
।।रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव। ।
अर्थात् जैसे विभिन्न नदियां भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।
यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वत: ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है :
।।ये यथा मा प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम। मम वत्मार्नुर्वतते मनुष्या: पार्थ सर्वश:। ।
अर्थात् जो कोई मेरी ओर आता है- चाहे किसी प्रकार से हो, मैं उसको प्राप्त होता हूं। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अंत में मेरी ही ओर आते हैं।
स्वामी विवेकानंद जी द्वारा इन दो श्लोकों के द्वारा सभी मनुष्य का ईश्वर के साथ एकाकार होने का मार्ग बताया गया है।चाहे जिस धर्म के मानने वाले हों, चाहे जो उपासना पद्धति हो, चाहे जो मार्ग अपनाया हो, सभी अंततः ईश्वर मे ही मिल जाते हैं।सबका ध्येय एक ही है।
साम्प्रदायिकता पर स्वामी विवेकानंद बहुत ही निर्मम प्रहार करते हुए कहते हैं कि अब साम्प्रदायिकता एवं हिंसा का मार्ग हमे त्यागना ही होगा।”सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं।वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारंबार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं,सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं।”
बिना किसी धर्म की बुराई किये स्वामी जी ने भारतवर्ष की गौरवशाली परम्परा के महत्वपूर्ण बिंदुओं यथा सहिष्णुता, सार्वभौम स्वीकृति,सभी को आश्रय देने की नीति,सब धर्मों की महानता व एक ही लक्ष्य को रेखांकित करते हुए साम्प्रदायिकता,हठधर्मिता,धर्मान्धता एवं हर तरह की हिंसा एवं उत्पीड़न को समाप्त करने का आह्वान किया।यहां गांधी,
प्रेमचंद,भगतसिंह आदि उनके सही अनुयायी लगते हैं।
कोलकाता के बंगाली कुलीन कायस्थ श्री विश्वनाथ दत्त और श्रीमती भुवनेश्वरी देवी के घर 12 जनवरी 1863 को जन्मे बालक नरेंद्र को शिकागो मे लोग ब्राह्मण संयासी के नाम से सम्बोधित करने लगे।ज्ञान और अध्यात्म की पारलौकिक आभा से प्रदीप्त सांचे मे गढ़ा व्यक्तिव हर किसी के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गये।
स्वामीजी का यह भाषण हिंदू धर्म की आत्मा को समेटे हुए है।सही अर्थों में देखा जाय तो यहां सभी का स्वागत है।वास्तव मे जहां अन्य धर्मों मे सभी के प्रति सहनशीलता एवं सम्मान की बात की जाती है वहीं स्वामी जी उद्घोषणा करते हैं कि हम किसी को भी बहिष्कृत नहीं करते हैं।सबको समाहित करने की संस्कृति इसीलिए उनको दूसरे धरातल पर ले जाती है।इसीलिए उनका धर्म प्रतीकों और आडम्बरों की चारदीवारी मे कैद नहीं हो सकता है।यह बहुत दुःखद है कि उनके नाम का लाभ उठाने की मैराथन मे सब व्यस्त हैं पर उनके मार्ग पर दस कदम भी चलने को कोई तैयार नहीं।
आज बात बात पर स्वामी विवेकानंद जी के कहे को संदर्भ से काट कर उद्धरण देने के फैशन मे व्यस्त लोगों को स्वामी जी की बातें समझने या उनकी पुस्तकों को पढ़ने का धैर्य कहां है? वह तो उनके चंद वाक्यों को अपनी सुविधानुसार कट पेस्ट करते रहते हैं।शायद उनके गेरुये वस्त्रों के कारण वामपंथी विचारधारा भी उनके भीतर के विप्लव को न पहचान स्की। सामान्य जन और गरीबों के लिए रोने वाले ह्रदय का संदेश उनके डिब्बाबंद विमर्श का हिस्सा नहीं बन सका। जो इंसान भुखमरी से परेशान लोगों को देखकर अपने अनुयायियों से पैसे की कमी होने पर मठ की जमीन बेच देने को तत्पर हो उस से बड़ा मानव जाति का हितैषी कौन हो सकता है।
आश्चर्य की बात है कि जो व्यक्ति कहता है कि हमारी भाषा संस्कृत मे एक्सक्लुयजन शब्द का अनुवाद नही है उसी का नाम लेकर दूसरे धर्मों के प्रति घृणा का वातावरण बनाया जाता है।उनकी इसी बेबाकी और स्पष्टता से लोगों को भय लगता है।सम्भवतः इसी कारण से बिना स्वामी विवेकानंद को पढे उनके नाम का उपयोग करना सहज लगता है।स्वामी विवेकानंद को मात्र गेरुये वस्त्र औेर हिन्दू गौरव मे कैद करने के असफल प्रयास चलते रहेंगे।निस्संदेह उन्हें अपने धर्म पर गर्व था पर यह समावेशी था।उनका लेखन और प्रवचन मानव करुणा के अप्रतिम दस्तावेज हैं।
स्वामी विवेकानंद को सादर नमन।