डॉ. गीता
ऑटिज़्म मनोरोग की एक ऐसी स्थिति है, जो लगातार बढ़ती रहती है। गर्ल्स और बॉयज में ऑटिज्म के लक्षण अलग हो सकते हैं. लड़कों में ये अधिक नज़र आते हैं.
सेंटर फोर डिज़िज़ कंट्रोल ऐंड प्रीवेंशन (सीडीसी) की रिपोर्ट के अनुसार आठ साल के बच्चों में 44 में से 01 की ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम की पहचान की गई है। लड़कियों की तुलना में लड़कों में इसके आंकड़े अधिक हैं।
लड़कियों में ऑटिज़्म का इलाज इसलिए कम हो सकता है, क्योंकि उनके अंदर ऑटिज़्म से सामान्य व्यवहार ज़रा कम ही नज़र आता है।इसे आप यह भी कह सकते हैं कि वे अपने लक्षणों को बेहतर तरीके से छिपा सकती हैं।
ऑटिज़्म के लक्षण :
ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जूझ रहे बच्चों को लोगों से घुलने-मिलने या बात करने में परेशानी होती है। बच्चा बारह महीने का होने के बावज़ूद अपना नाम सुनाई देने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। कुछ प्रमुख लक्षण ये भी हैं :
किसी आदेश का पालन करने में दिक्कत होना।
जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ को देखने को कहे, तो उसे नहीं देखना।
सामाजिक तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का सीमित होना।
नज़रें नहीं मिलाना।
रूटीन में आए किसी बदलाव को अपनाने में दिक्कतें होना।
इधर से उधर हिलना।
सामान को किसी सीक्वेंस या लाइन में लगाना।
कुछ खास शब्दों, लाइनों या आवाज़ों को दोहराना।
कुछ विशेष आवाज़ों पर अजीब-सी प्रतिक्रिया देना या एक अलग ही आवाज़ निकालना।
विजुअल, वास्टीबुलर, प्रोप्रियोसेप्शन से जुड़े सेंसरी इश्यु।
सोशल कनेक्शन में दिक्कत।
इनमें से ज़्यादातर लक्षण बचपन में ही दिखने शुरू हो जाते हैं, हालांकि कभी-कभी उन्हें अनदेखा भी कर दिया जाता है। दूसरे लक्षण कई बार तब तक समझ नहीं आते, जब तक कि बच्चा बड़ा नहीं हो जाता।
कभी-कभी क्यों चूक जाते हैं पेरेंट्स
लोग इन लक्षणों को देखने में कभी-कभी इसलिए भी चूक जाते हैं क्योंकि उनका लड़कों और लड़कियों के व्यवहार को लेकर एक खास तरह का नज़रिया होता है। ऐसा समझा जाता है कि लड़कों के मुकाबले लड़कियां शांत होती हैं और अकेले भी खेल सकती हैं।
हालांकि, कम बोलना और अकेले समय बिताना पसंद करना दोनों ही ऑटिज़्म के लक्षण हो सकते हैं। ऑटिज़्म के कुछ लक्षण लड़कियों के मुकाबले लड़कों में आम होते हैं। उदाहरण के लिए, बातों को दोहराने वाला व्यवहार और आवेग को नियंत्रण करने में कठिनाई होना।
ये लक्षण एक ऑटिस्टिक लड़के में ऑटिस्टिक लड़की के मुकाबले ज्यादा नज़र आते हैं। ये लक्षण लोगों से बात करने और मिलने-जुलने में आने वाली कठिनाई वाले लक्षणों के मुकाबले ज़्यादा आसानी से समझे जा सकते हैं, इसलिए ऑटिज़्म के लक्षणों को लड़कियों में दिखने वाले लक्षणों के मुकाबले समझना ज़्यादा आसान होता है।
आम तौर पर लड़कियां या तो अपने इन लक्षणों को छुपा देती हैं या फिर सामाजिक व्यावहारिकता सीखने में अपना ज़्यादा समय और ऊर्जा देती हैं।
इसलिए ऑटिस्टिक लड़कों के मुकाबले वे ज्यादा जल्दी दोस्ती कर लेती हैं। इससे उनका ऑटिज़्म छुप जाता है, क्योंकि ज्यादातर लोग सामाजिक व्यवहार सीखने में आने वाली परेशानी को ऑटिज़्म के प्रमुख कारणों में एक मानते हैं।
निदान में न करें गलती :
ऑटिज़्म का एक सामान्य गलत निदान मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा है। ऑटिज़्म के साथ-साथ कई सारे मेंटल हेल्थ से जुड़े मुद्दे भी हो सकते हैं। जैसे-बेचैनी, डिप्रेशन और पर्सनेलिटी डिसऑर्डर भी ऑटिज़्म के कुछ लक्षणों को साझा करते हैं, जिससे उसका गलत निदान भी हो सकता है।
इसके कारण कुछ लोगों को तनाव (स्ट्रेस) भी हो सकता है। लड़के और लड़कियों के व्यवहार में यह अलग-अलग ढंग से दिख सकता है। लड़कियां स्ट्रेस से कुछ इस तरह निपटती हैं कि उसका तुरंत लोगों को पता ही नहीं चल पाता, जैसे अपने-आप को नुकसान पहुँचाना।
लड़के अकसर स्ट्रेस वाली सिचुएशन को बाहर जता लेते हैं-उदाहरण के लिए, गुस्सा करके या फिर बुरा बर्ताव करके। उनका यह व्यवहार सबको नज़र आता है और इससे ऑटिज़्म का जल्द पता लगाने में भी मदद मिलती है।
लक्षणों को छुपा लेती हैं लड़कियां
लड़कियां अपने को लेकर ज्यादा जागरुक होती हैं और सोशली खुद को फिट करने को लेकर भी काफी सचेत होती हैं।
इसका मतलब यह हो सकता है कि वे बचपन से ही ऑटिज़्म के लक्षणों को छुपा पाने में सक्षम होती हैं, इस तरह उनका इलाज भी फिर देरी से ही होता है।
हालांकि, जब उनकी उम्र बढ़ने लगती है और सामाजिक ताना-बाना और दोस्ती ज्यादा जटिल हो जाती है, तब उन्हें दूसरों से अपने आपको रिलेट करने में दिक्कतें आती हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि उनमें ऑटिज़्म का इलाज उनके टीनएज वाले सालों से पहले नहीं हो पाता।
इस तरह से, ऑटिज़्म को लेकर लोगों में समझ का कम होने से हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स, टीचर और माता-पिता में लड़कियों के इन लक्षणों को अनदेखा करने की संभावना ज़्यादा रहती है।
ऑटिज़्म को लेकर एक स्टीरियोटाइप सोच के कारण कुछ ऑटिस्टिक लड़कियों का इलाज देरी से हो पाता है। इन स्टीरियोटाइप में शामिल हैं, यह सोच कि सारे ऑटिस्टिक लोगों की मैथ और साइंस में काफी दिलचस्पी होती है और ऑटिस्टिक लोग दोस्ती नहीं कर पाते। हालांकि, हर मामले में यही सच नहीं होता, जिसकी वजह से लड़कियों में कई बार ऑटिज़्म का इलाज नहीं हो पाता है।
लड़कियों में एक सिंड्रोम जिसे रेट सिंड्रोम का नाम दिया गया है, शायद ही मौजूद होता है, जो ऑटिज्म में होता है, लेकिन इसका एक नैदानिक पहलू भी है, हाथ की ऐंठन। क्योंकि रेट सिंड्रोम विशेष रूप से लड़कियों में मौजूद होता है।
इसलिए इसे भी सावधानी से लड़कियों में ऑटिज्म वाले लक्षणों में शामिल किया जाना चाहिए। (चेतना विकास मिशन).

