अरविंद वरूण
गांधी की हत्या के बारे में देश में यह बात बहुत योजनाबद्ध तरीके से लगातार फैलाई जाती रही है कि उनकी हत्या इसलिए की गई कि विभाजन के समय उन्होंने मुसलमानों का समर्थन किया और पाकिस्तान के हिस्से का बकाया 55 करोड़ रुपए उसे दे देने के लिए भारत सरकार पर दबाव बनाया।
यदि यह सही है, तो फिर ये दोनों बातें तो विभाजन के समय की है। लेकिन गांधी की हत्या के तो पांच प्रयास उससे पहले हो चुके थे और हर प्रयास में वही लोग शामिल थे जिन्होंने अंततः 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या कर ही दी। यदि 55 करोड़ कोई कारण होता तो हत्या के वे सब पहले के प्रयास क्यों किए गए थे? 1944 में न तो देश-विभाजन की बात थी और न 55 करोड़ की, फिर उस वर्ष उसी नाथूराम गोडसे ने अपने उन्हीं साथियों के साथ गांधी पर छुरे से हमला का प्रयास क्यों किया था? इस सवाल का जवाब सावरकर के अनुयायी नहीं देते।
गांधी की हत्या की जांच कर रहे कपूर कमीशन के समक्ष अनेक लोगों ने गवाही दी। इनमें भल्लारे गुरुजी (भीकूदाजी भल्लारे, जिनका देहावसान जुलाई 2017 में सतारा में हो गया) की गवाही बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि 22 जुलाई 1944 के दिन हुए हत्या के प्रयास के वे प्रत्यक्षदर्शी थे जब पंचगनी में नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना सभा में छुरे से गांधी पर हमला का प्रयास किया। तब उन्होंने और मणिशंकर पुरोहित ने मिलकर गोडसे को पकड़ लिया। लेकिन गांधी ने गोडसे के साथ कोई मारपीट वगैरह नहीं होने दी। बल्कि गांधी ने गोडसे से यह कहा कि वह एक सप्ताह उनके साथ रहे। लेकिन गोडसे ने रहने से इंकार कर दिया जिसके बाद गांधी ने उसे छोड़ देने को कहा। इस तरह गोडसे वहां से चला गया।
इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि गांधी की हत्या तात्कालिक कारणों से नहीं की गई थी, बल्कि वैसा प्रयास पहले से ही योजनाबद्ध तरीके से वे ताकतें कर रही थीं, जिन्हें अपने मार्ग में गांधी अवरोध नजर आते थे।

