अग्नि आलोक

टैगोर जयंती 7मई पर विशेष …..अभी भरा नहीं है मंगलघट: रवीन्द्र नाथ टैगोर

Share

सुसंस्कृति परिहार

बहुलतावादी संस्कृति के प्रखर पैरोकार थेरवीन्द्र नाथ टैगोर जिन्होंने जीवन के कठोर सत्यों पर अपना पक्ष पुरजोर तरीके से रखा उनके नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कृति गीतांजलि की एक प्रसिद्ध कविता ‘भारत तीर्थ ‘में इस बात को वे पूरी शिद्दत के साथ रखते हैं —

यहां आर्य यहां अनार्य यहां द्रविड़ चीन

शक हून दल पठान व मुगल एक देह में हुए लीन

पश्चिम ने आज खोला है द्वार

ब लाए वहां से उपहार देंगे और लेंगे

मिलाएंगे और मिलेंगे लौटेंगे नहीं

म भारत के महामानव समुद्र के तट से

इसी कविता के अंत में वे कहते हैं –आओ हे आर्य /आओ अनार्य/ हिंदू मुसलमान आओ/ आओ आज तुम अंग्रेज आओ /आओ क्रिस्तान आओ/ आओ ब्राह्मण करो शुद्ध मन /पकड़ो सब हाथ आओ/आओ रे पतित /आओ अपने ऊपर हुए अपमान के बोझ/ मां के अभिषेक के लिए जल्द आओ सब /अभी भरा नहीं है मंगल घट /सब के स्पर्श से पवित्र हुए तीर्थ जल से/ आज भारत के महा मानव समुद्र तट से ।

एक व्यापकतम दृष्टिकोण टैगोर के पास था इसी के लिए वे ये कह पाए है कि मंगल घट वही है जो सब के स्पर्श से लाए जल से ही पवित्र किया जा सकता है आज सांप्रदायिक ताकतें इसी बहुलतावादी विचारधारा पर हमला करने में जुटी हैं इसके मुकाबले में टैगोर की यह कविता भारतीय संस्कृति की एकता और समन्वय की विचारधारा से ओतप्रोत एक सशक्त कविता आज बेहद प्रासंगिक है ।

आज जब मानवता कराह रही है तथा इंसान के साथ इंसान का शत्रुवत व्यवहार पनपाया जा रहा हो तब भगवान पर निर्भरता को ही मूलमंत्र मानते लोग मुक्ति की कामना करने लगते हैं ऐसे माहौल में रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘धूला मंदिर’भी बरबस याद आ जाती है वे लिखते हैं—-

भजन-पूजन साधना-आराधना सब-कुछ पड़ा रहे,

अरे, देवालय का द्वार बन्द किए क्यों पड़ा है!

अँधेरे में छिपकर अपने-आप
चुपचाप तू किसे पूजता हैं?
आँख खोलकर ध्यान से देख तो सही – देवता घर में नहीं हैं।

देवता तो वहाँ गए हैं, जहां माटी गोड़कर खेतिहर खेती करते हैं –
पत्थर काटकर राह बना रहे हैं, बारह महीने खट रहे हैं।
कैसी धूप, क्या वर्षा, हर हाल में सबके साथ हैं
उनके दोनों हाथों में धूल में लगी हुई है
अरे, तु भी उन्ही के समान स्वच्छ कपड़े बदलकर धूल पर जा।

मुक्ति! मुक्ति कहाँ पाएगा भला, मुक्ति है कहाँ?
स्वयं प्रभु ही तो सृष्टि के बन्धन में सबके निकट बँधे हुए हैं।
अरे, छोड़ो भी यह ध्यान, रहने भी दो फूलों की डलिया
कपड़े फट जाने दो, धूल-बालू लगे
कर्मयोग में उनसे मिलाकर पसीना बहने दो।

टैगोर की तरह रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता के अंश में भी यह बात सामने आती है वे लिखते हैं-

आरती लिए तू किसे ढूँढ़ता है मूरख

मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में ?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में

लेकिन सबसे ज्यादा फिल्म यादगार में चर्चित रहा इंदीवर का गीत जिसे महेंद्र कपूर ने ‘वो खेत में मिलेगा खलिहान में मिलेगा भगवान तो ए बंदे इंसान में मिलेगा’ गाकर जन जन की आवाज़ बनाया तथा मज़दूर किसानों के ना केवल हौसले को बढ़ाया बल्कि श्रम की महत्ता प्रतिपादित की।
वस्तुत: देखा जाए तो कविवर टैगोर ने मानवता को ऐसा संदेश देने की कोशिश की जिससे मेहनतकश और मुफ्त बैठकर माल खाने वालों की पहचान हो सके तथा मेहनतकश को पर्याप्त सम्मान मिले।

इसी तरह अपनी एक कविता ‘अपमानित’ में जातिवाद पर कठोर प्रहार करते हुए रवींद्रनाथ ने कहा-
‘ हे मेरे दुर्भाग्य देश /जिनका तुम करते हो अपमान/ अपमान में ही तुम्हें होना पड़ेगा उनके समान ।जातिवादी सामाजिक व्यवस्था में दलितों के उत्पीड़न की स्थिति को यथावत रखने की परिणाम को चेतावनी देते हुए इसी कविता में आगे लिखते हैं-
तुम्हें नहीं दिखता द्वार पर खड़ा है मृत्यु दूत
तुम्हारे जात के अहंकार पर अभिशाप है अंकित
अगर अब भी सबको ना बुलाया
अभी तो अगर हटे हटे रहे
अगर अपने झूठे अहंकार के तले
तुम खुद को चारों ओर रहते हो बांधे
तो फिर मौत के बाद चिता की राख में
बनोगे तुम सब के बराबर।’

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के भारतीयों पर जुल्म के खिलाफ रवींद्रनाथ प्रखरता से बोलते रहे जलियांवाला बाग की घटना के विरोध में उनकी त्वरित प्रक्रिया अंग्रेजी सम्मान ‘नाइट हुड’ को लौटाना सबको पता है बंगाल के बंटवारे के खिलाफ जन आंदोलन को विकसित करने में उनकी कविताओं व गीतों की प्रमुख भूमिका रही ।
गीतांजलि में ही वे लिखते हैं-मन जहां डर से परे है/और सिर जहां ऊंचा है/ज्ञान जहां मुक्त है/और जहां दुनिया को/संकीर्ण दीवारों से/छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है/जहां शब्द सच की गहराइयों से निकलते हैं/जहां थकी हुई प्रयासरत बांहे/त्रुटिहीनता की तलाश में हैं/जहां कारण की स्पष्ट धारा है/जो सुनसान रेतीले मृत आदत के /वीराने में अपना रास्ता खो नहीं चुकी है/ जहां मन हमेशा व्यापक होते विचार और/ सक्रियता में /तुम्हारे जरिए आगे चलता है /और आजादी के स्वर्ग में पहुंच जाता है/ ओ पिता/ मेरे देश को जागृत बनाओ।
अपने लेखन के जरिए रवींद्रनाथ ने मानवता, भाईचारे और देशप्रेम के कई आयामों को छुआ उनकी लघु कहानियां मानव रिश्तों के कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं । हज़ारों से ज्यादा लघु कथाएं 12 उपन्यास में सामाजिक सरोकारों के अलावा मानव को इंसानियत की राह दिखाई।अन्ना अख़्मातोवा जिन्होंने टैगोर की कई कविताओं का रशियन में अनुवाद किया ने टैगोर के बारे में कहा था -“कविता का वह शक्ति शाली प्रवाह जो अपनी ताकत और हिंदुत्व और गंगा से लेता है वह रवीन्द्र नाथ टैगोर कहलाता है “लेकिन उनके इस हिंदुत्व का असर बांग्लादेश पर नहीं पड़ता वे टैगोर के ‘आमार सोनार बांग्ला’ को वहां का राष्ट्र गान बनाते हैं।उनका हिंदुत्व संकीर्ण नहीं था।देश की विशेषता में शुमार था।

तो आइए टैगोर का अभी भरा नहीं है ‘मंगलघट’ इसे सबके स्पर्श से भरने की कोशिश जारी रखें ताकि जातिवादी और साम्प्रदायिक ताकतें अपने उसूलों से दूर हो सकें।अंत में महाकवि गुरुदेव टैगोर को नमन करते हुए उनकी एक रचना से हम सब का हौसला लें–
सांध्य रवि ने कहा-
मेरा काम करेगा कौन
सुनकर प्रश्न रह गया
जगत निरुत्तर मौन
एक छोटे से दिए ने कहा
नम्रता के साथ
जितना बन सकेगा
मैं करूंगा नाथ।

Exit mobile version