शशिकांत गुप्ते
महामारी के पहली लहर से ज्यादा कहर दूसरी लहर ने ढाया। पहली लहर को हमने ताली,थाली और दीप जलाकर शिथिल कर दिया था? ऐसा भ्रमपूर्ण माहौल भी हमने देखा है।
सारे देशवासी अपने घरों में कैद होकर एहतियात बरत रहे थे। मजदूर अपने गावों की ओर पैदल कूच कर रहे थे। लम्बीदूरी तय करने के पूर्व ही बहुत से भगवान के पास चले गए। बहुत से लोगों ने पैदल चलकर यातनाएं सहन की जो यातनाएं सहन करने में सक्षम नहीं थे,वे महाप्रयाण कर गए।
ऐसे संकट के दौर में प्रगतिशील विचारकों ने मानवीयता का परिचय देते हुए साम्प्रदायिक सौहाद्र को बरकरार रखा और बगैर किसी भेदभाव के लोगों की मदद की। ऐसे समय में भी कुछ लोग ऊपर से अति धार्मिकता का स्वांग रचने वालें छद्म लोगों ने द्वेषभाव रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी?
दूसरी लहर का कहर,आमजन के लिए अभिषाप सिद्ध हुआ और चिकित्सकों को वरदान। तादाद में आमजन तो अपनो का दाह संस्कार भी करने से वंचित रहे,मजबूरी उन्हें अपनो जलसमाधि देना पड़ी? चिकित्सकों पर लक्ष्मीजी प्रसन्न हो गई और उन्हें बेतहाशा धनलाभ हुआ ऐसा बहुत से लोगों का आरोप है? यह जांच का विषय है? अपने देश में एक नई परंपरा विकसित हुई है,आरोपी ही जांच एजेंसी को नियुक्त कर लेतें हैं? इसलिए दूध और पानी अलग होना असम्भव होता है?
दूध में पानी मिलाकर ही चाय बनती है। चाय उच्च पद पर विराजित करने के लिए श्रेष्ठ पेय साबित होती है।
विषयांतर को रोक कर महामारी की तीसरी लहर को हाशिए पर रख कर सियासत की तीसरी लहर पर विचार करतें हैं।
सियासी तीसरी लहर में तो मजबूर लोग घरवापसी के जगह घर से पलायन कर रहें हैं।
जो पलायन कर रहें हैं, वे मानसिक रूप से नकारात्मक महौल से निकलकर सकारात्मक महौल की तलाश है। उनमें से कोई साइकल पर सवार होने के लिए लालायित है। कोई हाथ के पंजे से हाथ मिलाने के लिए तत्परता दिखा रहा है। कोई अपनी नई टीम बना रहा है।
हाथी पर सवार होने से हर कोई डरता है, कहीं पशु अत्याच्यार के आरोप न लग जाएं? झाड़ू पर हर कोई भरोसा करने में संकोच कर रहा है। पता नहीं झाड़ू कीचड़ फैलने में अप्रत्यक्ष मददगार सिद्ध हो? ऐसा अंदेशा सियासी हलकों में है? कारण एक फूल कीचड़ में ही खिलता है।यह सर्वविदित है।
एक अहम प्रश्न तीसरी बार की सियासी लहर के लिए ईवीम मशीन क्या गुल खिलाती है? अब की बार, अब की बार, से परेशान होकर ईवीएम मशीन इस बार कोई गुल खिलाने की जगह अंग्रेजी का Fool ना बना दे? सियासत सम्भावनाओं का ही तो खेल है।
एक खेल का स्मरण हुआ। पचास और साठ के दशक में राह चलते जब भी सड़क पर मदारी के डमरू की आवाज सुनाई देती थी। कौतूहलवश लेखक भी भीड़ में शरीक हो जाता था।
मदारी डमरू बजातें हुए कर्कश आवाज में भीड़ को कहता,साँप और नेवले की लड़ाई दिखाऊंगा।
जब भीड़ इकठ्ठी हो जाती थी। तब वह अपनी औकात में आकर दंत मंजन या चिंता हरण ताबीज़ बेचता था। सिर्फ चार आने में।
बहुत असरे बाद सियासत में साँप और नेवले का जिक्र हुआ है।
देखतें है,नाई नाई कितने बाल अभी मार्च के दुसरें सप्ताह तक सामने आ जाएंगे।
निष्पक्षता से विचार करें तो महामारी और सियासत की तीसरी लहर से बचना अब अनिवार्य हो गया है।
बीमारी फैलने के पहले ही एहतियात बरतना आवश्यक है।
तीसरी बार लहर को आने ही नहीं देना चाहिए।
उपर्युक्त चर्चा सियासत के तीसरी लहर के सेमीफाइनल पर की गई है।
एक रेल दुर्घटना हुई है। इस दृघटना का कारण ज्ञात किया गया है कि रेलगाड़ी के इंजन में ही खराबी थी। इसीलिए रेल के डिब्बे पटरी से उतर गए?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

