सुसंस्कृति परिहार
आजकल भारत का आम आदमी मंहगाई , बेरोजगारी, कोरोना,शिक्षा-परीक्षा के साथ चुनावों में चल रही बतकहियों और जुमलेबाजी से हैरान परेशान है। तमाम राजनैतिक दल भी तथाकथित बदलाव, सरकारी सम्पत्ति के विक्रय और नेताओं की ख़रीद फरोख्त से सहमा हुआ है। अजीबोगरीब माहौल है अब तक सत्ता की पकड़ मज़बूत करने सत्तारूढ़ दल ने जिस तरह दलबदल का खेल खेला अब उनके अपने लोग ही सतत साजिशों में लगे हैं जिन्हें उन्होंने दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया है।
जीवन भर की सेवा का ये प्रतिफल।उनके अंदर अंदर हाहाकार हैसामान्य कार्यकर्ता भी हैरान है। कब कहां क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता।लगता है, सबसे पहले मध्यप्रदेश में ही इस तरह के बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। वहीं बंगाल चुनाव में भाजपा को मुंह की खानी पड़ सकती है क्योंकि उन्होंने जिस तरह चुनाव से पूर्व तृणमूल के नेताओं की ख़रीदी की वह बंगाली मानुस को हजम नहीं हो रहा है।एन आर सी का भय दिखाकर बाहरी लोगों की वोट हासिल करने की उनकी मंशा पर भी विराम लग गया है ।इस बहाने हिंदू वोट का मकसद भी पूरा नहीं होगा। तृणमूल के साथ वाम संगठन जिसमें कांग्रेस और आई एस एफभी शामिल है, ने इस खेल को बिगाड़ दिया है। केरल में भाजपा लगभग साफ़ है।असम में भी भाजपा का सम्मोहन ख़त्म हुआ है । तमिलनाडु में इनकी लंबे समय से तैयारी ज़रुर इन्हें जिता सकती है लेकिन मंहगाई और बेरोजगारी के ख़तरे यहां हैं ही । पुदुच्चेरी में ज़रूर जीत का सेहरा तय लगता है यहां कांग्रेस का हाल बेहाल है।आप यहां प्रवेश करे तो कामयाबी मिल सकती है ।कहने का मतलब यह कि भाजपा भी सुकून में नहीं है ।ख़तरे बढ़े हैं तिस पर किसान आंदोलन भी हावी हैजनमानस भी बदल रहा है।
अब आमजन की हालात से भी रूबरू हो लेंं पेट्रोल,डीज़ल,गैस ने जो अंबानी जी का माल है ने दुनिया को दिखा दिया है कि सस्ते माल से कैसे जनता को लूटा जा सकता है।जियो के शिकार तो बहुतेरे हैं हीं।अब अड़ानी जी की रेल चले इससे पहले की एक रिहर्सल भी शुरू हो चुकी है किराया दुगुना और प्लेटफाम टिकिट पचास रूपए।आगे आगे देखिए किसानों के अनाज भंडारण हेतु अडानी के आधुनिक गोदामों को भी सरकार को भरना है।इधर बिकने के लिए बैंक तैयारी कर रहे हैं। मंहगाई चरम पर है। प्राईवेट सेक्टर छटनी में लगे हैं और सरकारी संस्थानों को प्राइवेट किया जा रहा है। सरकार हम दो और हमारे दो की नीति पर अमल कर रही है।वे मजे में रहें यही उनका लक्ष्य है। सरकार भी मज़े में रहेगी जब उसके अधीन कुछ भी नहीं होगा तो गुस्सा किस पर? बहुत समझदार है सरकार । परेशान दिखती ज़रुर है पर उन्हें भरपूर भरोसा है ई वी एम पर। अब हम किस पर यकीन करें।बस एक ही रास्ता बचता है वह लोकतांत्रिक रास्ता है।जनता ख़ामोश ना रहे ग़लत नीतियों का प्रतिकार करे।
जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की तरह विरोधी ताकतें एक हों।सदन में पुरज़ोर आवाज़ बुलंद करें और सतत करते रहें, जब तक मांगें पूरी ना हों। अंतिम विकल्प चुनाव होता है जिसने अमेरिका जैसे साम्राज्य को हिला दिया भारत में भी जनता ने अच्छे अच्छों को धूल चटाई है। चुनाव साफ सुथरे हों इसके लिए भी संघर्ष तेज करना होगा। ई वी एम को हटाने की पहली शर्त हो।याद रखें ई वी एम हटाने के लिए17राजनैतिक दलों ने भी वोट किया है सिर्फ भाजपा ही इस पर विश्वास करती है कहने की ज़रूरत नहीं क्यों?।ई वी एम द्वारा चुनाव का वहिष्कार हो तब बात बनेगी ।यही एक मात्र रास्ता है परिवर्तन का ।देश और अपनी ख़ुशहाली का ।
किसी ने क्या ख़ूब कहा है– तूफ़ानों से लोहा लो, और सैलाबों को पार करो मल्लाहों का चक्कर छोड़ो,तैर के दरिया पार करो आईए एकजुट होकर देश के भविष्य को सुरक्षित करने संकल्पबद्ध हों।सुको भी हमारे साथ है उसने साफ़तौर पर कहा है सरकार से अलग विचार राजद्रोह नहीं है ।

