~ डॉ . सलमान अरशद
भारत में शासन प्रशासन सतत झूठ और गैरजिम्मेदाराना रवैये को आत्मसात करता हुआ दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ जनता का बड़ा हिस्सा रोबोट बन चुका है, उसे खास सियासी समूह के इशारों पर नाचना ही परम कर्तव्य लगता है।
याद कीजिये, कोरोना की पहली लहर में जब दुनिया बचने के उपाय ढूढ़ रही थी, हमारे देश में नमस्ते ट्रंफ का कार्यक्रम हुआ था, एक राज्य की सरकार गिराई गई थी, हिन्दू धर्म से संबंधित आयोजन देश के कई भागों में सम्पन्न हुए थे, हाँ मुसलमानों को ज़रूर क्रोना फैलाने का जिम्मेदार बताया गया था, जो इनकी सियासी ज़रूरत भी है।
हलांकि उस वक़्त राहुल गाँधी ज़रूरी चेतावनी दे रहे थे, लेकिन सरकार ने चीन और दूसरे देशों से आने वाले लोगों लेकर कोई सावधानी नहीं बरती थी। आज एक बार फिर जब क्रोना की आमद को लेकर शंकाएं जताई जा रही हैं तब आप देख सकते हैं कि चीन से आने वाले जहाजों पर न तो कोई रोक टोक है और न ही यात्रियों को आइसोलेट करने की कोई पहल।
राहुल गाँधी की यात्रा को लेकर ज़रूर चेताया जा रहा है लेकिन खुद बीजेपी के लोग वही सावधानी बरतने को तत्पर नज़र नहीं आते।
क्या मीडिया और जागरूक जनता की ओर से ये सवाल उठना नहीं चाहिए कि “आख़िर ये हो क्या रहा है” लेकिन मीडिया के बड़े हिस्से ने जनता से रिश्ता तोड़ लिया है और सोशल मीडिया के ज़रिए जनता के पक्ष में खड़े पत्रकारों की पहुँच इतना अप्रभावी बना दिया गया है कि उनका लिखना बोलना अब सरकार के लिए कोई महत्व नहीं रखता।
ये अवस्था जहाँ एक तरफ़ निराश करती है वहीं ये सवाल भी रखती है कि खामोशी से मौत का इंतज़ार करना क्या हमारे ज़िन्दा होने की निशानी है ?
समय निकाल कर सोचिये !
~ Dr. Salman Arshad

