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*भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर मंडराते संकट पर दुनिया भर में बात*

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अवतार सिंह जसवाल

भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर मंडराते संकट पर दुनिया भर में बात उठ रही है कि भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर की जा रही हैं; उन पर हमले जारी हैं; भारत एक चुनावी तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है। नागरिकों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार हो रहा है। धार्मिक अल्पसंख्यकों पर तथाकथित हिंदूवादी लंपट गिरोहों द्वारा हमले हो रहे हैं और भाजपा सरकारें इन लंपट तत्वों को सुरक्षा दे रही हैंलोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की स्वतंत्रता लगभग खत्म हो चुकी है। मुख्यधारा का मीडिया (मोटे तौर पर) गोदी मीडिया बनकर सरकार और संघ प्रायोजित नफरती एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगा है। स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। उनको नौकरियों से निकाले जाने से लेकर राष्ट्रद्रोह तक के अभियोग से गुजरना पड़ रहा है। भाजपा और संघ से असहमत विचारों वाले नागरिकों और बुद्धिजीवियों का तरह-तरह से लंपट गिरोहों और सत्ता द्वारा उत्पीड़न किया जा रहा है।

राजदीप सरदेसाई अपनी पुस्तक ‘मोदी की जीत, 2019’ में लिखते हैंः ‘जिन लोगों ने भी संविधान में इस साम्प्रदायिक हस्तक्षेप का विरोध किया उन पर किसी न किसी रूप में हमले हुए और उन्हें ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग, ‘खान मार्केट गैंग’ और ‘लिबतार्ड’ जैसे नामों से बदनाम करने की साजिशें की गईं। सभी नामकरण कोई न कोई राष्ट्रविरोधी व्यक्तित्व को लक्ष्य बनाकर बहुत चालाकी के साथ किये गये थे। उन पर इस प्रकार से निशाना साधा गया जैसे वे भाजपा विरोधी या मोदी विरोधी नहीं ‘राष्ट्र-विरोधी’ या ‘देशद्रोही’ हों।’

यह हालात मोदी सरकार द्वारा संविधान और लोकतंत्र की जानबूझ कर उपेक्षा करने और लगातार बढ़ रही उसकी तानाशाही प्रवृति की ओर भी इशारा करते हैं। अब यह सरकार नागरिकों के बुनियादी (मौलिक) अधिकारों पर भी कैंची चलाने और संघीय ढांचे में राज्यों को मिले संवैधानिक अधिकारों को धीरे-धीरे छीनने में लगी हुई है। इसे विडंबना कहें या मोदी सरकार की चारित्रिक विशेषता कि यह सब वह आज़ादी के उस काल में कर रही है, जिसे उसने ‘आज़ादी का अमृतकाल ‘ नाम दे रखा है।

अपने अतिआत्मविश्वास के चलते प्रधानमंत्री मोदी अपने इरादों को छुपाने की कोई कोशिश नहीं करते। 15 अगस्त, 2023 को लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में उन्होंने घोषणा कर दी थी कि आज़ादी के ‘अमृतकाल’ का मतलब कर्तव्यकाल है और वह अपना ‘कर्तव्य’ (देश को हिंदूराष्ट् बनाना?) पूरा करने के लिए अगली बार (2024 में) भी भाषण देने यहां आएंगे। उन्होंने कहा था:

“अगले पांच वर्ष अभूतपूर्व विकास के वर्ष होंगे। अगले पांच साल, 2047 के सपने को साकार करने के स्वर्णिम क्षण हैं। और अगली बार, 15 अगस्त को, इसी लाल किले से, मैं आपके सामने देश की उपलब्धियों को, आपके सामर्थ्य को, आपके द्वारा की गई प्रगति को प्रस्तुत करूंगा, जो सफलताएँ और भी अधिक आत्मविश्वास से प्राप्त की गईं।”

इस तरह की भविष्यवाणी करने का क्या अर्थ है? लगता है, उन्होंने तय कर लिया है कि भविष्य में, हर हाल में, वही देश के प्रधानमंत्री रहेंगे? 

दूसरे, उनके भाषण से लगता है कि उनके शासनकाल या ‘कर्तव्यकाल’ में लोकतांत्रिक अधिकारों और उनकी गारंटी देने वाली संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है। वह अतीत की वस्तु बन चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठता है, क्या उनका ‘कर्तव्यकाल’ अब भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था का समाप्ति काल बनने जा रहा है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस तरह की बातें क्या भारत को एक अधिनायकवादी, हिंदूराष्ट्र में बदलने की अप्रत्यक्ष घोषणा जैसी नहीं है? 

आज संघ के अनुषांगिक संगठनों, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और बजरंग दल, के प्रशिक्षित लंपट गिरोहों ने सड़कों पर समानांतर सत्ता कायम कर ली है, जो देश में जर्मन नाजी युग की याद दिला रही है। वे हिंदू धर्म के देवी-देवताओं और हिंदू महापुरुषों की जयंतियों को शक्ति प्रदर्शन और दंगा अभियानों में बदल रहे हैं। धार्मिक आयोजनों के नाम पर इन गिरोहों की अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भड़काऊ कार्रवाइयों की ओर से कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली सरकारी एजेंसियां आमतौर पर आंखें बंद किए रहती हैं।

देश के गरीबों, कमजोर वर्गों, बच्चियों और आम महिलाओं के साथ अल्पसंख्यकों की जिंदगी असुरक्षित हो रही है। यही नहीं, अब तो उच्च वर्ग या देश का नाम रोशन करने वाली खिलाड़ी/ पहलवान महिलाओं के यौन उत्पीड़न का दर्द सुनने को भी सरकार तैयार नहीं है। उन्हें एक प्रकार से सत्ता की उपेक्षा या दमन का सामना करना पड़ता है। आरोपी अगर भाजपा नेता या सांसद हो, तो उसके विरुद्ध पुलिस कार्रवाई नहीं करती। ऐसे में, तब उन्हें एफआईआर के लिए सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है।

जांच एजेंसियों सीबीआई, ईडी, आईटी और पुलिस जैसी संस्थाओं को राजनीतिक विपक्षियों को परेशान और उत्पीड़ित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उनसे विपक्ष की सरकार गिराने, सांसदों, विधायकों की खरीद-फरोख्त करने और विपक्षी दलों को तोड़कर कमज़ोर करने का काम लिया जा रहा हैं। हिंदुत्व और मोदी के प्रति प्रतिबद्धता वाली नौकरशाही सरकार के सभी गैरकानूनी कामों को व्यावहारिक धरातल पर कानूनी ठहराने के लिए सभी संवैधानिक और वैधानिक मान्यताओं को ताक पर रखकर काम कर रही है।

सवाल है, मोदी सरकार की मंशा क्या है? संघ और भाजपा की आंतरिक संरचना लोकतंत्र की मूल भावना के निषेध पर निर्मित हुई है। अपनी राजनीतिक विचारधारा को वह ‘हिंदुत्व’ नाम देते हैं, जिसे उन्होंने हिंदू महासभा के नेता वी.डी. सावरकर से ग्रहण किया है। उसने 1923 में ‘हिंदुत्व’ (बाद में‘हिंदू कौन’) के नाम से एक पुस्तिका में लिखी थी और हिंदुत्व की विचारधारा प्रतिपादित की थी। खुद को एक सांस्कृतिक संगठन बताने वाले आर.एस.एस ने अपने राजनीतिक उद्देश्य (भारत को एक हिंदूराष्ट्र बनाना) के लिए 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना कर उसे देश की राजनीति में उतारा था। वही जनसंघ आज भारतीय जनता पार्टी के नाम से सत्तारूढ़ है और संघ के हिंदूराष्ट्रवादी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।

उपरोक्त तथ्यों की रोशनी में अगर देखा जाए, तो संघ प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी की संविधान और लोकतंत्र के प्रति कहीं कोई आस्था या प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती। हां, दिखावे के लिए वह जरूर उनकी ‘स्तुति’ करते हैं, ज़रूरत पड़ने पर उनके कुछ चुनिंदा प्रावधानों का, चालाकी से अपने हित में इस्तेमाल भी करते हैं। आम जनता के सामने अपने फासीवादी चरित्र को छुपाए रखने के लिए वह बार-बार संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देते रहते हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक कार्यशैली और कानून-व्यवस्था की आड़ में की जा रहीं लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाइयां इसकी कलई खोल देती हैं। 

फासीवादी अपनी अत्यधिक जोड़-तोड़ वाली रणनीतियों के लिए जाने जाते हैं, जिनकी योजना सावधानीपूर्वक बनाई जाती है। उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटना, हर प्रकार की असहमति पर अंकुश लगाना और स्पष्ट सच्चाई और गंभीर वास्तविकता को छिपाने के लिए हर संभव प्रयास करना होता है। वे अपने घातक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं: वे धमकी देते हैं, वे सहयोग करते हैं, वे समझौता करते हैं, वे झूठे मामले थोपते हैं, वे डराते और परेशान करते हैं, असहमति को रोकने के लिए यूएपीए जैसे कठोर कानूनों का उपयोग करते हैं; वे प्रत्यक्ष और मुखर रुख अपनाने वालों को परेशान करने के लिए ईडी, एनआईए, सीबीआई और यहां तक कि पुलिस जैसी आधिकारिक एजेंसियों का दुरुपयोग करते हैं; वे कैद करते हैं और मार भी डालते हैं।

ऐसा माहौल है इस समय देश में। फिर भी इसे बदलने की बातें और राजनीति करने वाले अभी इसके विरुद्ध एकजुट होकर एक बड़ा जनांदोलन खड़ा करने के लिए गंभीर दिखाई नहीं दे रहे हैं।

अवतार सिंह जसवाल

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