
आर जी कुरील ‘ रसिक ‘
तंत्र – मंत्र भगवत-कथा, तीज और त्योहार।
शूद्र न मानव बनि सकै, यह बाभन हथियार।
दस प्रतिशत शासन करैं, नब्बे क्यों लाचार।
बहुजन मिलि कै छीन लो, खोया निज घरबार।।
राज पाट सब छिन गया, छिना मान सम्मान।
रक्षा कबहुं न करि सके, पत्थर के भगवान।।
बुद्ध कही कबिरा कही , कही संत रैदास।
झूठे देवी देव सब, छोड़ सबन की आस।।
पत्थर पूजत युग गया, हो न सका कल्याण।
देव देवियां झूठ सब, झूठा है भगवान।।
तिल-तिल मरता मांगता, न्याय सुरक्षा भीख।
भक्षक कब रक्षक हुए, लेत न काहे सीख।।
ऊंच नीच में फंसा है, जब तक शूद्र समाज।
अनंत गुलामी में जिए, मिलै न कबहूं राज।।
नित अपमानित होत है, तिल तिल जरत शरीर।
लगत न अपना देश ये, धरत हिये कस धीर।।
हाथ कलावा बांधि के, तिलक लगाये माथ।
शूद्र न सत्ता पा सकैं, गहि बाभन का हाथ।।
जो मनुवादी करत हैं, बहुजन पर अन्याय।
अरे बावरे मांगता, उस दुश्मन से न्याय।।
संविधान ने वोट का, दिया तुम्हें हथियार।
कुछ टुकड़ों में बेचते, क्यों अपने अधिकार।।
जय संविधान
- सुप्रसिद्ध कवि,लेखक तथा दार्शनिक श्री आर जी कुरील ' रसिक ', संपादक - बहुजन सवेरा,बहुजन भागीदारी मोर्चा,बीबीएम
प्रस्तुतकर्ती - श्री शारदा प्रसाद जी, प्रगतिशील व्यक्तित्व, कुशीनगर,जब जानो तब जानो फिर मानों पटल , संपर्क - 96270 14770
संकलन - निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र, संपर्क - 9910629632