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नई सूचना तकनीकों की मदद से तेजी से बढ़ रहे आतंकवाद, असहिष्णुता, पाखण्ड और अंधविश्वास

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रामस्वरूप मंत्री 

साधारण से साधारण वस्तुओं की उपभोक्ता तक पहुँच के बीच में दलाली और मुनाफे के कई स्तर होते हैं। आजकल इन्हें उत्पादन और वितरण का ‘सप्लाई चेन‘ कहा जाता है। ईश्वर और आम जन के बीच भी इसी प्रकार की ‘सप्लाई चेनें‘ शायद तभी से फल-फूल रही हैं जब से मनुष्य ने ईश्वर की परिकल्पना, बोध या परिभाषा गढ़ी होगी। सदियों से ईश्वर की कृपा, दया, क्षमा, स्वर्ग आदि के नाम पर धर्म के ठेकेदारों की दुकानें खूब धड़ल्ले से चल रही हैं। इसके अतिरिक्त मानव समाज में जितनी हिंसा, युद्ध और विनाश धर्म या मज़हबों के नाम पर अथवा इनसे प्रेरित असहिष्णुता और साम्प्रदायिकता के कारण हुए हैं, शायद किसी और के कारण नहीं। सत्ता, सम्पत्ति, शस्त्र और शास्त्रों का भी मज़हबों से रिश्ता बड़ा पुराना है।

धन्यवाद हो विज्ञापनों तथा टी.आर.पी. की बदौलत फल-फूल रहे टी.वी. चैनलों का, जिन्होंने इन दिनों ईश्वर, धर्म और योग के बाजार को आसमान की ऊँचाई तक पहुँचा दिया है। नित नए बाबा, चमत्कारी, योगी और तांत्रिक इत्यादि तरह-तरह की बीमारियों से जूझती, लालच और सफलता के शॉर्टकट की तलाश में भागमभाग में जुटी धर्मभीरु भीड़ को, भेड़ की तरह मूंडने में खूब कामयाब हो रहे हैं। इतना ही नहीं वे गाहे-बगाहे बलात्कार, हिंसा, धोखा-धड़ी यहां तक कि हत्याओं में भी लिप्त पाए जाते हैं।

ईश्वर, धर्म, अध्यात्म आदि विषयों पर जितने अध्ययन, मंथन, लेखन तथा बहस-मुवाहिसे आदि होते रहे हैं, शायद उतना किसी भी विषय पर नहीं। दुनिया के हर कोने में और हर काल में पैदा होने, बसने या विकसित होने वाले लोग किसी न किसी रूप में इनसे जुड़े रहे हैं। किन्तु इस सन्दर्भ में जितने, विचार, विश्लेषण और विवेचनाएं पनपीं, शायद उससे कहीं ज्यादा, भिन्नता भय और भ्रम फैले। एक ओर जहां समाज को अनुशासित, संयमित, सुसंस्कृत, परस्पर सहयोगी, संगठित तथा कल्याणकारी आदि बनाने में धर्म गुरूओं और धर्मों की ऐतिहासिक भूमिका रही है, वहीं दूसरी ओर महान संतो के बलिदानों, मानवीय करूणा, शुद्ध संकल्पों और ‘सर्वजन हिताय‘ की बुनियाद पर मत, मज़हबों, धर्मों आदि के जो भवन बने, वे उनसे ठीक विपरीत साबित हुए हैं।

समाज में सभी की बेहतरी और इंसाफ के लिए लगातार चलने वाले संघर्ष ही धर्म है। जिनकी बुनियाद पर ऐसे संघर्ष चलते हैं, वे शाश्वत मूल्य ही अध्यात्म हैं, और इन मूल्यों को निरंतरता, समग्रता तथा सार्वभौमिकता देने वाली अंतश्चेतना, संकल्प और प्रेरक शक्ति ही सच्चा ईश्वर है। ऐसे में ईश्वर व धर्मों आदि की वास्तविकता और प्रासंगिकता तथा समाज परिवर्तन के प्रयासों में अंतर्निहित बुनियादी मूल्यों और चरित्र पर एक गम्भीर व स्वस्थ बहस लाज़िमी है।

कालान्तर में अधिकांश मामलों में अलग-अलग लोगों द्वारा गढ़ी गई ईश्वर की परिकल्पना, व्याख्याएं और परिभाषाएं भय, पाप-मुक्ति, लालच, स्वार्थ, हिंसा, मौज-मस्ती, लूट, चालाकी, दलाली, बिचौलियापन, धोखाधड़ी, मृग-मरीचिका तथा सामुहिक हिस्टीरिया के साधन बनकर रह गईं। धर्म के दलालों और बिचौलियों ने ईश्वर से हमारा रिश्ता एक दोस्ती का, प्यार का या मां-बेटे का नहीं रहने दिया। बल्कि हमें सिखाया गया- ‘ईश्वर से डरो‘, जैसे कि वह कोई हौवा है। ‘वही तुम्हारे सारे गुनाह माफ कर देगा‘ या फिर ‘अमुक कर्मकांड करने अथवा चढ़ावा चढ़ाने से ईश्वर तुम्हारी मनोकामना पूरी कर देगा‘, जैसी भ्रांतियां जानबूझ कर समाज में फैलायी गईं। यानि कि कितने ही व्यभिचार, अत्याचार, चोरी, हिंसा, बलात्कार करते रहो, ईश्वर की चापलूसी या उसे रिश्वत देकर आसानी से बच निकलोगे; जैसी वाहियात धारणाएं व अंधविश्वास ईश्वर की आड़ में पनपाए गए।

विभिन्न मज़हब मानव समाज में विभाजन के कारण और सत्ता व सम्पत्ति आदि के सबसे बड़े और शायद सबसे आसान केन्द्र बन गए। शांति, समता, न्याय, मानवीय गरिमा व अधिकारों के विपरीत, कथित धर्म, दया, भीख, खैरात गुरूडम्, अंधविश्वास, पाखंड, सामाजिक व लैंगिक विषमता, जातिवाद, नस्लवाद आदि को सैद्धान्तिक आधार प्रदान करने वाले तंत्र के रूप में ही फल-फूल रहे हैं। यह तंत्र भौतिक, राजनैतिक व मनोवैज्ञानिक तौर पर इतना गहरा और व्यापक है कि धर्म का मूलभूत तत्व यानी सच्चा अध्यात्म और यहां तक कि ईश्वर भी जैसे इनमें ही कहीं लुप्त होकर रह गया है। ऐसा लगता है कि जिन महान विभूतियों की साधना, सत्य की अनुभूति, सभी की भलाई के लिए शुरू किये गए प्रयास तथा बुराई के खिलाफ जद्ोजहद से तमाम संगठित धर्म उपजे, यदि वे आज जिंदा होते तो इन्हीं मत-मज़हबों के ठेकेदारों द्वारा फिर से मार डाल दिये जाते।

सभी मत-मज़़हबों की शुरूआत एक गहरी करुणा, संवेदना और सत्य के प्रति पवित्र संकल्प से हुई है। ये ईश्वरीय या दैवीय गुण विचार के रूप में किसी अच्छे इंसान की कथनी और करनी में प्रकट हुए। बाद में वे ‘विचार धारा‘ बने जिन्हें मानने वालों ने एक जमात या अनुयायी समूह का गठन कर लिया। फिर उन्होंने एक मत या संप्रदाय का आकार ले लिया। इन्हीं के संगठित स्वरूप ने धार्मिक संस्थावाद को जन्म दिया। इस दौरान परिवर्तनकारी व समाजोपयोगी विचार के शुरूआतकर्ताओं की मौत हो गई या उनकी हत्या कर दी गई। फिर क्या था, अनुयायियों ने उनकी मूर्तियां बनाकर पूजना शुरू कर दिया। ज्यादातर पूजा स्थल मुनाफे और मजे के साथ ही ताकत के अड्डे बन गए। धीरे-धीरे इस नए कारोबार में कारोबारियों के बीच प्रतिद्वंदिता बढ़ती गई। जिससे और नए-नए धार्मिक-साम्प्रदायिक कारोबार जन्में और पनपे। आज यही सिलसिला काबू से बाहर हो चुका है।

अब किसी ईश्वरीय गुण को जीवन में उतारना धर्म नहीं रह गया। सिर्फ आसानी से बिकने वाली या अनुयायियों को भयभीत व लालची बनाकर अपने शिकंजे में रख सकने वाली पहचानें ही धर्म के नाम पर जानी जाती हैं। ये पहचानें हैं, पहली- अवतार या धर्म प्रवर्तक, दूसरी- धर्म ग्रन्थ, तीसरी- तीर्थ व पूजा स्थल, चौथी- पुजारी और पांचवी- शरीर को खंडित करके या बाहर से थोपकर दिखाई देने वाले चिन्ह। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह, हज़रत मोहम्मद साहब, गुरूनानक जी, गीता, कुरान, बाइबिल, मंदिर, मस्ज़िद, गिरिजाघर, पंडित, मौलवी, पादरी, खतना, जनेऊ, क्रॉस, केश, कृपाण आदि के लिए मरने-मारने वालों की कोई कमी नहीं हैं। किन्तु ऐसे कितने लोग हैं जो महान् ईश्वरीय गुणों -जैसे, सच्चाई, दया, करुणा, न्यायप्रियता, समता, निर्भयता एवं  सहभागिता आदि को अपनाकर सभी भेदभाव भुलाने के लिए तैयार हैं?

धर्म की बुनियाद आध्यात्मिक तत्व, और अध्यात्म की आत्मा ईश्वर का सच्चा स्वरूप है। लेकिन हजारों साल में यह सब कुछ इतना गड्डमड्ड हो गया कि व्यवहारिक तौर पर इनको अलग-अलग करके देख पाना तथा साथ ही साथ इनके अंतर्संबंधों की विवेचना कर पाना अत्यंत दुरूह है। इस सबके बावजूद व्यक्ति और समाज के जीवन के किसी भी पहलू से इनकी उपस्थिति और प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले इनके असली स्वरूप को समझा जाये व इससे उपजी वैज्ञानिक समझ को आत्मसात किया जाये। उसे जीवन में उतारने की ईमानदार कोशिश की जाए और अंततोगत्वा उसको सामाजिक अभियान का रूप दिया जाय। यह एक लम्बी यात्रा या यूं कहें कि संघर्ष यात्रा है जो पूर्ण विराम से नहीं, बल्कि प्रश्नवाचकों से शुरू होकर चलेगी।

ईश्वर से असली रिश्ता तो चेतना और अनुभूति का रिश्ता है। शायद इसकी शब्दों में व्याख्या भी नहीं हो सकती। दूसरा रिश्ता हमारे मस्तिष्क तथा हृदय (भावुकता) से जुड़ा है। मानव के तार्किक मस्तिष्क की सीमाएं हैं, और भावनात्मक मस्तिष्क की भी। ईश्वर के अस्तित्व की स्वीकार्यता के जहां एक ओर अनेकों दार्शनिक व तात्विक पहलू हैं तो वहीं दूसरी ओर ईश्वर के प्रति भावुकतापूर्ण आस्था, भक्ति और समर्पण आदि हैं। मस्तिष्क व हृदय ईश्वर की अनुभूति का आनंद नहीं ले सकते। हां, सिर्फ उसके गुणों से सीख जरूर सकते हैं, लाभान्वित हो सकते हैं और समानता, न्याय, सहिष्णुता तथा शांति की बुनियाद पर एक नए समाज की रचना का प्रयत्न कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, ईश्वर सर्वव्यापी है तो मंदिर, मस्जिद, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्मण, दलित, अमेरिका, अफ्रीका, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरूष, मालिक-मजदूर आदि के भेद-भाव कैसे? और यदि सर्वव्यापी नहीं है तो एक जगह बैठकर राज करने वाले तानाशाह और ईश्वर में फर्क ही कहां रहेगा? अगर वह किसी स्त्री या पुरूष की शक्लोसूरत वाला है तो उसको भोजन, कपड़े, आवास, शौचालय आदि की भी जरूरतें पड़ेंगी जिसके लिए उसे दूसरे कर्मचारियों पर निर्भर रहना होगा। ऐसे में वह सर्वशक्तिमान और कायनात चलाने वाला भला कैसे हो सकता है? इसीलिए उसका निराकार होना लाज़़मी है। यह आकारहीनता का गुण ही व्यक्ति व समाज में पारदर्शिता, पूर्वाग्रह मुक्ति और सर्वांगीणता का बुनियादी तत्व है।

ईश्वर यदि सृष्टि का रचयिता और न्यायकारी है, तो प्रकृति के साथ लूट खसोट, हिंसा, विध्वंश, युद्ध, सत्ता, पद और दौलत के लिए संघर्ष तथा उत्पादन व उपभोग के संसाधनों के बंटवारे में आकाश-पाताल जैसा फर्क ईश्वर विरोध ही माने जायेंगे। किन्तु यदि वह पक्षपाती है, तो उसका न होना ही अच्छा। इसी तरह अलग-अलग भाषाओं में उसे सत्, चित और आनन्द का स्रोत मान जाता है। यानि कि हमारे जीवन और चरित्र में भलाई का गुण। इस भलाई को लगातार ऊर्जा, सक्रियता तथा प्रेरणा देने वाली चेतना शक्ति और ऐसी भलाई व सक्रियता में आनन्द उठाना ही तो अपने अंदर ईश्वर को जीना है। एक शांतिपूर्ण और बेहतर दुनिया इन गुणों के बिना कैसे संभव है? विरोधाभासों की कमी नहीं है। सभी मज़हबों में ईश्वर को रहमान अर्थात् सबसे बड़ा दयालु कहा गया है। तब प्रश्न उठता है कि आखिर उसके अनुयायी करोंड़ों लोगों के अधिकार छीनकर उनका अमानवीय शोषण और उत्पीड़न भला कैसे कर सकते हैं ? बिना हिचक, निरपराध और निरीह अनगिनत पशु-पक्षियों और मासूम जानवरों की नृशंस हत्या करके उन्हें डकार जाने की बहादुरी कैसे दिखा सकते हैं? जिसका एक ही मतलब निकलता है कि या तो ईश्वर है ही नहीं अथवा वह दयालु नहीं है या फिर एक भी मांसाहारी या अत्याचारी उसका अनुयायी नही हो सकता। ईश्वर का एक गुण मुक्ति है। परन्तु इसके विपरीत पूरे मानव समाज का ताना-बाना ही कई प्रकार के मानसिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक व राजनैतिक बंधनों पर ही टिका है। सही अर्थों में स्वतंत्र कौन है? कोई धर्मतंत्र में कैद है, तो कोई विषमता मूलक अर्थतंत्र का दास बना हुआ है, या फिर कोई वाहियात परंपराएं ढोए जा रहा है।

निर्भयता यानि निडरता एक ईश्वरीय गुण है। किन्तु सबसे बड़े डरपोक लोग ही सबसे अधिक तथाकथित ईश्वर की शरण में जाते हैं। हर कोई जाने-अनजाने कारणों से डरा हुआ रहता है। पाप-पुण्य का डर, बीमारी और मौत का डर, बुढ़ापे का डर, बॉस का डर, पोल खुल जाने का डर, आर्थिक असुरक्षा का डर, भविष्य का डर – यानि कि चारों तरफ डर ही डर बिखरे पड़े हैं। जब तक समता, न्याय, पारदर्शिता, समवेत (इन्क्लूसिव) लोकतंत्र, सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की गारण्टी और अहिंसा पर आधारित समाज व्यवस्था नहीं बनती तब तक सार्वजनिक जीवन में यह ईश्वरीय गुण यानि ‘निर्भयता‘ कैसे आ सकती है? इसके साथ साथ भीतरी ईमानदारी भी अनिवार्य है।

ईश्वर के विभिन्न गुणों की खुले मन-मस्तिष्क से विवेचना करके उनके व्यापक सार्वजनिक, सार्वभौमिक व सार्वकालिक संदर्भ खोजने की जरूरत है। नई सूचना तकनीकों, मीडिया व संचार माध्यमों की मदद से धर्म व ईश्वर के नाम पर तेजी से बढ़ रहे आतंकवाद, असहिष्णुता, सर्वव्यापी भय, अपराध धींगामुश्ती, पाखण्ड और अंधविश्वास आदि को रोकना आज की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है। हमें हिम्मत जुटाकर धर्म की सामाजिक पुनर्व्याख्या और आम लोगों के भीतर के शाश्वत मूल्यों में से ही एक रास्ता खोजना होगा।

रामस्वरूप मंत्री 

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