शशिकांत गुप्ते
साँच को आंच नहीं,हाथ कंगन को आरसी क्या?दूध का दूध और पानी का पानी,सत्य कड़वा होता है,आदि मुहावरे सिर्फ पढ़ने सुनने में और सुनाने में ही सीमित हो कर रह गए हैं।व्यवहार में तो अच्छेदिनों का वादा करने वाले,जाँच की सिर्फ मांग से ही जाँच की प्रक्रिया की काल्पनिक आँच से झुलसने से डरते है?
जाँच की माँग ठुकराना अर्थात संशयों को पैदा करना है?
शारीरिक सौष्ठव की मजबूती किसी भी प्रकार की जाँच को नकारने के लिए मजबूर क्यों हो जाती है?
वर्तमान में सियासत में यही सब कुछ हो रहा है।वादों और दावों में लिपटी नीति के पीछे छिपी नीयत, संदेह के घेरे में नजर आती है।
इनदिनों यह सब तो राजनीति में स्वाभाविक रूप से हो रहा है।लोकतंत्र में बहुमत मिलना मतलब मनमानी करने छूट मिल गई ऐसा समझना अलोकतांत्रिक सोच है?यह सोच तानाशाही प्रवृति का द्योतक है?
सियासी माहौल में जो भी हो रहा है।लेकिन देश के पुरोत्तर राज्य मणिपुर के दूर दराज के अंचल में रहनी वाली युवती मीरा ने ओलंपिक में चांदी का पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया।मीरा ने वेटलिफ्टिंग में रजत पदक प्राप्त किया है।मीरा ने यह गौरव ओलंपिक खेल में प्राप्त किया है।
यह खबर पढ़ सुन कर,देश की वास्तविक स्थिति का स्मरण होता है।देश का हरएक नागरिक महंगाई का Weight उठाने के लिए मजबूर है।महंगाई के बोझ ने आमजन की आर्थित स्थिति खोखली हो गई है।
देश की मूलभूत समस्याओं को हल करने के लिए किसी भी प्रकार से कोई कौशिश नहीं की जा रही है।
देश की मूलभूत समस्याओं पर यदि प्रश्न उपस्थित किया जाता है तो पूर्व की सरकार पर दोष मढ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है।हरएक समस्या के लिए दूसरों पर दोष मढ़ने मतलब अपनी अक्षमता को छिपाना ही होता है।
असंख्य समस्याओं सहन करने की क्षमता का कोई पारितोषिक यदि घोषित हो तो निश्चित ही यह इनाम हम भारतवासी ही जीतेंगे।
अपने देश में एक ओर इनाम के हकदार मौजूद है, जो देश की समस्याओं को मौन रहकर सहन करतें हैं,और वे भी जो गलत नीतियों का भी आँख बंद रख कर समर्थन करतें हैं?
जो साहस के साथ यथार्थ को दर्शाने के लिए खबर छापते हैं,या दिखातें हैं, उनको छापों का सामना करना पड़ता है?
उपर्युक्त मुद्दों को याद करते हुए पुनः उक्त मुहावरों का स्मरण होता है है। साँच को आंच नहीं,हाथ कंगन को के क्या,दूध का दूध पानी का पानी और सत्य कड़वा होता है।
इनदिनों झूठ को मीठा बताने की पुरजोर कोशिश की जा रही है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

