Site icon अग्नि आलोक

इन्दौर के इतिहास का वह काला दिन,पूरा शहर लूटेरों के हवाले था

Share

राजबाड़ा का आग में जलना, मार्कण्डेय देव मन्दिर के ख़ज़ाने का लुप्त (अगर सही में ख़ज़ाना हो तो) होना, जोगी का नौकरी छोड कर कांग्रेस के टिकिट पर चुनाव लड़ना में कहीं कोई सीक्रेट ताना बाना तो नहीं है ।”अगर इस कानाफूंसी में थोड़ा बहुत भी सच है तो यह राजवाडे के इतिहास का एक काला सच होगा जिसे भविष्य कभी माफ़ नहीं करेगा ।आज इन गुप चुप चल रही कानाफूंसी और अफ़वाहों की सचाई जानने के लिए पुराने दस्तावेज़ों ,फ़ाइलों , गोपनीय ख़ुपिया रिपोर्टों तथा १९८४ में घटनास्थल पर मौजूद सभी सेवारत या रिटायर्ड अफ़सरों और कर्मचारियों से पूछताछ करना जरूरी है ।

राम श्री वास्तव


.. हॉ …ऐसी अक्सर रिटायर्ड अफ़सरों की क्लब पार्टियों की गप शपों में चर्चा होती रहती है कि १९८४ के दंगों में कुछ महत्वपूर्ण लोगों ने दंगाई भीड़ को उकसा कर कहा था कि ” यहॉ खड़े क्या देख रहे हो जाओ लूटो ।”…..और देखते ही देखते राजबाडे की दीवार से सटी एक सरदार जी की बिस्कुट और कटलरी की दुकान को लूट लिया गया । झुग्गी झोंपड़ी के दंगाई लुटेरे शटर तोड़ कर दोनों हाथों में थैले भर भर कर बिस्कुट के पैकेट ले भागे। इस बीच कुछ सिरफिरे आए उन्होंने गुमटी की आड़ में राजबाडे की दीवाल पर पेट्रोल फैककर आग लगादी । पलक झपकते ही राजबाडा धू-धू करके जल उठा । आग लगने के तुरन्त बाद मौक़े पर मौजूद अधिकारी तुरन्त राजबाडा के भीतर की ओर भागे । आनन फ़ानन में एक तरफ तो फ़ायर ब्रिगेड भीतर बाहर से पानी डालकर आग बुझा रही थी तथा दूसरी ओर तीन लोगों का दल मार्तण्ड मन्दिर के तहख़ाने में रखी तिजोरियों की चाबी ट्रेज़री से जल्दी से लेकर आये और दौड़कर भीतर गए तथा तिजोरी में रखे जेबरातों को कपड़ों के थैलों में ठूंस ठूँसकर भर रहे थे । ऐसी कानाफूस भी है कि कपड़ों की चार थैलियों में भरे हीरे मोती और अन्य बहुत क़ीमती लाल पुखराज से जनित आभूषण सील किये बिना और आभूषणों की लिस्ट या पंचनामा आदि न बनाकर जिले के किसी ज़िम्मेदार शीर्ष अफ़सर को सौंप दिए गए । और वह अफ़सर उन्है अपनी सरकारी कार में रखकर अपने घर लें गया । यह अफ़वाह आज भी १९८४ के दंगों में मौजूद चश्मदीद गवाहों के नाम पर इन्दौर में आम है , जिसे मोरसली गली में किसी समय परोसे जाने वाले भॉग घाटे के साथ आसानी से सुना जाता रहा है ।
उस समय प्राथमिकता कर्फ़्यू का पालन ,आग का बुझाना और दंगाईयों को रोकना थी । ख़बर थी कि नन्दानगर में तो दंगाईयों ने तो मानवता की हद ही पार करदी थी । गाड़ी अड्डे पर जब एक सरदार युवक को आग की जलती चिता में ज़िन्दा जलाने के लिए फैंक दिया गया । वह वीभत्स दृश्य जिसने भी देखा आज भी सिहर उठता है । इतने सालों बाद आज जब १९८४ के उन भयावह दंगों की याद आती तो सिरहन उठ जाती है। क्या आदमी राक्षसी उन्माद के बशीभूत होकर अपनी आत्मा को इतना ज़लील कर सकता है कि वह भी जंगली जानवरों से भी बदतर होकर आचरण करने लगे ?
राजवाडा जब जल रहा था उसकी लपटें उत्तरी भाग की गुमटियों से शुरू हुई थी पलक झपकते ही आग भीतरी क्षेत्र में फैल गई । कहा जाता है कि जो लोग मौक़े पर मौजूद थे उनमें ज़िला कलेक्टर स्वंय श्री अजीत जोगी भी कनटोपा लगाए घटनास्थल पर मौजूद थे । उनके साथ मधु नामक महिला अधिकारी भी थी । पुलिस का पूरा अमला लगभग ४०-५० जवान और तीन फ़ायर ब्रिग्रेड की टेन्डर गाड़ियाँ और पॉच पानी से भरे टेंकर मौजूद थे चारों तरफ़ सायरन और सीटियों की आवाज़ के साथ सामान लूटकर भागने वाले दौड़ लगा रहे थे । किसी अधिकारी और पुलिस कर्मी ने दंगाई और लुटेरों को रोकने या पकड़ने का कोई प्रयास नहीं किया । देखने वालों का तो यह भी कहना है कि इमलीबाजार कोने पर हनुमान मन्दिर के पास खड़े दर्जन भर पुलिस के जवान तो दंगाईयों से बिस्कुट छुड़ाकर अपनी भूख भी मिटा रहे थे । अराजकता का ऐसा घिनौना रूप और प्रशासकीय साया में हुए दंगों का यह माहौल इन्दौर के इतिहास का एक काला पन्ना बन जावेगा इसकी किसी को कल्पना नहीं थी ।
एक ज़माना था जब ३ अक्टूम्बर १७३० को मराठों की सेना ने उत्तर भारत की ओर कूच करके मुग़ल साम्राज्य का सफ़ाया करने का बीड़ा उठाया ।पेशवा बाज़ीराव ने १७३४ में मल्हार राव होल्कर की पत्नी गोरमाबाई होल्कर के नाम ‘खासगी’ जागीर का फ़रमान जारी करने के साथ ही इन्दौर का क़ानूनी जन्म होने की घोषणा की थी । सन्१७४७ में इन्दौर के राजवाडा का निर्माण चालू किया गया , १७६१ तक अभी राजवाडा पूरा तैयार ही नहीं हुआ था कि अब्बादी के साथ हुए युद्ध में मल्हार राव होल्कर पराजित होगए और राजवाडा को आग के हवाले कर दिया गया । मल्हार राव का देहान्त १७६५ में हो जाने के बाद होल्कर राज्य की बागडोर उनकी पुत्रवधु अहिल्याबाई होल्कर ने सम्हाली । उन्होंने अपनी राजधानी महेश्वर रखी तथा फिरसे राजवाडा का जीर्णोद्धार किया गया । १८११ में राजवाडा पुन: भीषण आग की चपेट में आगया । किन्तु शीघ्रही दो साल के भीतर इसकी पूरी सजावट करके होलकर स्टेट के प्रमुख स्थान के रूप में स्थापित किया गया । १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने इन्दौर का ख़ास महत्व समझते हुए मिलिटरी हेड क्वार्टर आफ वार के रूप में महू केन्टुनमेन्ट का विकास किया ,और मीटर गेज रेल लाइन डालकर इन्दौर को पूरे राजस्थानी रजवाड़ों से जोड़ा गया ।
आज़ाद भारत में राजवाडा को कासलीवाल परिवार को बैंचा गया , जिसे जनआक्रोश को देखते हुए श्यामाचरण शुक्ल की सरकार ने १८ करोड़ रूपयों में कासलीवाल परिवार को मुआवज़ा देकर पुन: अधिग्रहीत करके राजवाडे को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया । उस समय तक कोई नहीं जानता था कि राजवाडे के मार्तण्ड देवता के मन्दिर के नीचे रखे ख़ज़ाने में तीन तिजोरियाँ भी रखी थी । कहा जाता है कि तिजोरियाँ इतनी भारी थीं कि उनको खोलना तो दूर सरकाना भी कठिन था । खासगी ट्रस्ट के लोगों को भी इसके भीतर रखे ख़ज़ाने की जानकारी नहीं थी । क्योंकि कहा जाता है कि कोई पुराना मुकदमा अदालत में सम्पति के विवाद में चला आरहा था ।
१९८४ के दंगों में जले राजवाडे की रहस्यमय आग और उस समय मौक़े पर मौजूद कलेक्टर अजीत जोगी की भूमिका पर कई लोग दुबी ज़ुबान से आज भी कानाफूसी करते हैं । अधिकांश लोग तो यही मानते हैं कि हो ना हो जोगी जी ने ही राजवाडे में आग लगवाई थी । यद्यपि एक ज़िम्मेदार आई ए एस अफ़सर के बारे में ऐसा घिनौना आरोप लगाना पूरी तरह बेबुनियाद नज़र आता है । पर राजवाडे के जलने के तुरन्त बाद ही जोगी की पत्नी की विदेश यात्रा और अर्जुनसिंह तथा इन्दिरा जी से उनकी निकटता, फिर ‘आई ए एस ‘ की पकी पकाई नौकरी छोड़कर राजनीति में कूदना , यह सब मिलाकर लोगों की आमचर्चाओं में शंका की सुई ज़ोरों से हिलाती है कि “राजवाडे का आग में जलना, मार्कण्डेय देव मन्दिर के ख़ज़ाने का लुप्त (अगर सही में ख़ज़ाना हो तो) होना, जोगी का नौकरी छोड कर कांग्रेस के टिकिट पर चुनाव लड़ना में कहीं कोई सीक्रेट ताना बाना तो नहीं है ।”अगर इस कानाफूंसी में थोड़ा बहुत भी सच है तो यह राजवाडे के इतिहास का एक काला सच होगा जिसे भविष्य कभी माफ़ नहीं करेगा ।
आज इन गुप चुप चल रही कानाफूंसी और अफ़वाहों की सचाई जानने के लिए पुराने दस्तावेज़ों ,फ़ाइलों , गोपनीय ख़ुपिया रिपोर्टों तथा १९८४ में घटनास्थल पर मौजूद सभी सेवारत या रिटायर्ड अफ़सरों और कर्मचारियों से पूछताछ करना जरूरी है । बैसे श्री अजीत जोगी की छवि एक योग्य अधिकारी की रही है, उनकी ईमानदारी का प्रमाणपत्र तो उनके राजनैतिक मित्र ज़्यादा अच्छे तरीक़े से दे सकते है । पर कहा जाता है कि अगर कही घुंआ दिखाई देता है तो जरूर राख के नीचे आग होना चाहिए । फिर सरकारी अमले में और आम जनता में हमेशा से चली आरहीं इस सुरसुरी..अफ़वाह की जॉच कराने में क्या हर्ज है ? जाँच के बाद दूध का दूध और पानी का पानी अलग होज़ाना ही बेहतर होगा ।

Exit mobile version