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वो भक्षक…..! तुम रक्षक…..

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महान प्रकाश स्तंभ महर्षि कार्ल मार्क्स का क्लास स्ट्रगल ऑफ थ्योरी समझने के लिए निम्नलिखित को समझें,जिन जालिम लोगों ने सन 1795 तक शूद्र किसान जातियों को उनकी भूमि का मालिकाना हक तक न दिया हो,सन 1941 तक किसान जातियों को सार्वजनिक रूप से जूती तक न पहनने दी हो,तमिलनाडु में कथित शूद्र जातियों की छाया तक से परहेज की जाती रही हो ! केरल में इन कथित शूद्र जातियों के लोगों की स्त्रियों को उन कथित उच्च जातियों के सामने अपनी इज्जत-आबरू-अस्मत मतलब स्तन को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र करके,अपने पीछे झाड़ू बाँधकर चलना पड़ता हो ! अपनी अबोध बच्चियों को कथित भगवान की सेवा के लिए मंदिरों के नीच,अधम पुजारियों की शारीरिक और दैहिक विलासिता की पूर्ति के लिए देवदासी बनकर आजीवन शोषण कराने के लिए बाध्य किया जाता हो ! वे लोग यह कैसे बर्दाश्त करेंगे कि उन कथित शूद्र किसान जातियों के कमेरे बच्चे पढ़-लिख कर डॉक्टर,इंजीनियर, आइएएस, डीएम,कलक्टर,कमिश्नर आदि बनें,विदेश जाएं, लग्जरी गाड़ियों में घूमें,आईफोन इस्तेमाल करें,वो तो शुक्र हो ब्रिटिश अंग्रेजों का,जिन्होंने मनुस्मृति के विरुद्ध 1795 के अधिनियम 11 द्वारा शूद्रों और ओबीसी को भी संपत्ति रखने का कानून बना डाला। इस अधिनियम से पूर्व सभी अनूसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, आदिवासियों व ओबीसी जातियों जैसे जाटों, अहीरों,गुर्जरों, पटेलों,तेलियों कायस्थों,मोचियों,शिल्पकार जातियों यथा कुम्हारों,सुनारों,ठठेरों,लोहारों, नाइयों,आदि हजारों शूद्र जातियों को भूमि का मालिकाना हक ही नहीं था। शुक्र हो बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर का जिन्होंने लन्दन में तीनों गोलमेज सम्मेलन में इन जातियों के पक्ष में अपना दमदार पक्ष रखा। जिसकी बदौलत भारत आये साइमन कमीशन को हमारे रहबर दीनबंधु सर छोटूराम ने प्रत्यावेदन दे देकर शूद्रों और ओबीसी-सेवक जातियों,अतिशूद्रों यथा एससी-अछूतों की उनकी वास्तविक स्थिति से अंग्रेजों को अवगत कराया,नतीजन सन 1941 में किसानों और मजदूरों को सार्वजनिक रूप से जूती पहनने का अधिकार प्राप्त हुआ।
अगर आपको लगता है कि आरएसएस भाजपा के एक जाति विशेष व अडाणी,अम्बानी नामक बनियों को सिर्फ व्यापारिक फायदा पहुंचाने के लिए ये काले कृषि बिल लाए गये हैं तो आप मूर्ख हैं,अभी भी नासमझ हैं। उन्हें नफरत है आपके अच्छे रहन-सहन,खान-पान,ओढ़ने-पहनने के ढंग से,आपके चमचमाते घरों,गाड़ियों और मोबाइलों से ।…और इसीलिए उन्होंने किसान आंदोलन में अच्छे खान-पान और अच्छे रहन-सहन पर सवालिया निशान खड़ा किया है और कहा कि इतना अच्छा रहन-सहन और खान-पान वाले कथित शूद्र और किसान हो ही नहीं सकते ! उनकी नजरों में तो उक्त वर्णित शूद्र जातियों के घोषित कथित सेवक शूद्र जातियों के किसानों को किसान आंदोलनस्थल यथा टिकरी बॉर्डर,शाहजहांपुर बॉर्डर,सिंधु बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर किसान आंदोलन स्थल पर बैठे किसानों को फटे-पुराने,मैले-कुचैले,कपड़े पहने,क्लांत-कृषकाय-झुर्रीदार मलीन मुख वाले,धूल से सने चमरौधे जूते पहने,बिल्कुल दीन-हीन अवस्था में रहने और दिखनेवाले ही वास्तविक और आदर्श भारतीय किसान के साँचे में फिट होनेवाले ही असली भारतीय किसान हो सकते हैं। सूट-बूट,टाई-पेंट-कोट,लक्जरी-मंहगी विदेशी कार में तो इस देश के दोगले-दलाल-जुमलेबाज,फ्रॉड,देश बेचनेवाले ही पहनने के इकलौते अधिकारी हैं। इसलिए बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर के बताए रास्ते पर दृढता से,संगठित, सशक्त व चैतन्य होकर अपने अधिकारों के प्रति आश्वस्त होकर संघर्ष करिए। जुल्म की इंतहा हो चुकी है। अब जाति,धर्म, मजहब से ऊपर उठकर संगठित होकर विरोध करने का समय आ गया है। याद रखें 15 प्रतिशत बनाम 85 प्रतिशत की लड़ाई है । हमारी मतलब 85 प्रतिशतवालों की जीत निश्चित है।
किसी दार्शनिक कवि ने बिल्कुल समयसापेक्ष व न्यायोचित्त लिखा है कि..

                         वो भिखमंगे,
                   तुम मेहनतकश

        वो महाठग,
 तुम अन्नदाता

                             वो भक्षक,
                        तुम रक्षक

     वो मनुस्मृति, 
तुम संविधान

   टकराव तो होना ही था...टकराव होनी भी चाहिए.. जीत हमारी है..जीत 85 प्रतिशतवालों की होगी..।

संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,उप्र,

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