अग्नि आलोक

फिर संवरेंगे पुस्तकों के आलय

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देश में ‘पुस्तकालय महोत्सव 2023’ का आयोजन एक बड़ी उम्मीद देता है। सच यह भी है कि इस तरह के दिवस या महोत्सव की जरूरत ही हम तब महसूस करते हैं, जब चीजें हाथ से फिसलने लगती हैं।

विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक
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पिछले दिनों जीर्ण-शीर्ण अवस्था में एक पुस्तक दिखाई पड़ी, ‘द्रुमदल’, नीरज की कविताएं और गीत। किताब के ऊपर एक बड़ी-सी गोल मुहर पर नजर पड़ी, मटमैले कागज पर धुंधले हो रहे शब्द अभी भी पढ़े जा सकते थे – मित्र-हितैषी पुस्तकालय, ग्राम – बहिरा, पोस्ट – लोहची, जिला मुंगेर। मध्य में स्पष्ट दिख रहा था, वर्ष-1944। मैं चकित रह गया। उस किताब को देखकर नहीं, बल्कि यह देखकर कि 1944 में बहिरा गांव में एक पुस्तकालय था, जिसकी अपनी मुहर थी, जिसमें उस समय युवा रहे कवि ‘नीरज’ की किताब थी।

बहिरा गांव की आबादी आज भी हजार से ऊपर नहीं होगी, सौ के आसपास घरों वाला, मिली-जुली आबादी का गांव है यह। अब गांव तक सडक़ें पहुंच गई हैं। बिजली के खंभे पहुंच गए हैं। सभी घरों से टेलीविजन की आवाज और मोबाइल की घंटियां सुनाई देने लगी हैं। गांव में हाई स्कूल तक चल रहे हैं। लेकिन सन् 1944 का वह पुस्तकालय, जिसमें कभी ‘नीरज’ का ‘द्रुमदल’ भी रहा करता था, आज कहीं नहीं दिखता। वर्तमान पीढ़ी को तो यह याद भी नहीं कि कभी इस गांव में पुस्तकालय जैसी कोई चीज भी हुआ करती थी, थी भी तो कहां थी।

पुस्तकालय विलीन करने वाले गांवों में बहिरा कोई एक अकेला नहीं। आज देश के अधिकतर गांवों और शहरों में पुस्तकालय इसी नियति को प्राप्त हो चुके हैं। कई शहरों की सैकड़ों वर्षों से पहचान रह चुके पुस्तकालय आज वीरान पड़े हैं। वास्तव में पुस्तकालय किसी न किसी रूप में हमारी सांस्कृतिक, मानसिक और सामाजिक समृद्धि के प्रतीक रहे हैं। ऐसे में देश में ‘पुस्तकालय महोत्सव 2023’ का आयोजन एक बड़ी उम्मीद देता है। सच यह भी है कि इस तरह के दिवस या महोत्सव की जरूरत ही हम तब महसूस करते हैं, जब चीजें हाथ से फिसलने लगती हैं। उम्मीद करते हैं जिस तरह इस वर्ष के बजट में पुस्तकालयों के डिजिटलाइजेशन की बात कही गई थी, यह महोत्सव कुछ सार्थक पहल के साथ हर व्यक्ति तक पुस्तकालय की पहुंच को सहज बनाएगा। इंटरनेट पर अधकचरा ज्ञान जिस तरह बिखरा पड़ा है, आधिकारिक स्रोत की जरूरत और भी बढ़ जाती है। एक पुस्तकालय किस तरह पूरे क्षेत्र की पहचान बदल सकता है, उत्तर प्रदेश के रामपुर से इसका बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। रामपुर की रजा लाइब्रेरी के भ्रमण के बाद रामपुर आपके लिए वही नहीं रह जाता, जो आप जानते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि रजा लाइब्रेरी के 250 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

शायद देश में पहली बार इस महोत्सव में तीन ऐतिहासिक पुस्तकालयों खुदाबख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी (पटना), रजा लाइब्रेरी (रामपुर) व मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी फारसी अनुसंधान संस्थान (टोंक) का एक मंच पर आना भी महत्त्वपूर्ण होगा। ऐसी पहल राज्यों व जिलों के स्तर पर भी वांछित हैं, जहां आकर्षण खो चुके पुस्तकालयों को एक मंच पर लाकर उन्हें जनोपयोगी व समृद्ध बनाने की शुरुआत की जा सके। नवाचार संस्कृति की अनिवार्यता बन गए हैं। किताबें सुनी जा रही हैं, किंडल पर पढ़ी जा रही हैं, लेकिन नए पन्नों की खुशबू का विकल्प कहां। किताब हाथ में लेने के बाद जो एक भावनात्मक रिश्ता बनता है, वह हमने महसूस किया है। ‘वन नेशन, वन डिजिटल लाइब्रेरी’ जरूरत है, लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि गांवों, मोहल्लों, कालोनियों में पुस्तकालय की परंपरा विकसित करने पर बात ही नहीं, पहल भी हो। पुस्तकालय के प्रति किसी सरकार की इस बड़े स्तर पर पहल आश्वस्त तो करती है, पर एक सवाल तो है द्ग क्या अपनी हर जरूरत के लिए हम सरकार की पहल की ही प्रतीक्षा करेंगे? भारतीय समाज में पुस्तकालय तो हमारे अपने द्वारा बनाए और बचाए जाने की परंपरा रही है।

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