डॉ. अभिजित वैद्य
तालिबान का हम निषेध करते है । किसी भी धार्मिक मुलतत्ववादियों का हम कडा निषेध करते आए है ।
दहशतवाद का धर्म नही होता यह बात हमें मंजूर नही । ज्यादा तर दहशतवाद धर्म के मुल उपदेश से घसीटता
जाता है । इतना ही कह सकते हैं । लेकीन आदिम धर्म से संघटीत धर्मतक सभी धंर्मग्रंथो में हिंसा का प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष रूप में समर्थन नजर आता है इसे ध्यान में लेना चाहिये । इसे अपवाद केवल बौध्द एवं जैन धर्म है
लेकिन बौध्द धर्म के शिष्यो ने हिंसा की ही नही ऐसा नही है । पुरे विश्व में अन्य धर्मो के आधार पर
मूलतत्त्ववादी निर्माण हुये और उन्होने धर्म के आधार पर अनेक देशो में दहशतवाद को जन्म दिया । तालिबान
का किसी भी तौर पर समर्थन नही किया जा सकता । ऐसी गलती करनेवाला चीन जैसा देश राजनैतिक
विवेक से दूर जा रहा है । चीन के उघर मुस्लीमों को तालिबान द्वारा मदत नही मिलनी चाहीये इसके लिये यह
चाल होगी या सैनिकों को वापस बुलाने से बचा हुआ पैसा अमरिका उनके विरुद्ध इस्तेमाल करेगा इसलिये
तालिबनीयों को उनकी ओर घुमाने का प्रयास होगा । पाकिस्तान तालिबान का भक्ष कब बनेगा यह बात
पाकिस्तान की समझ में आएगीही नही । ऐसा होना भारत के लिये हानीकारक है । तालिबान के चुनौती का
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे मुकाबला करना है यह पुरे विश्व के धर्मनिरपेक्ष तथा जनतंत्र मे विश्वास रखनेवाले
देशो ने इकटठा होकर सामूहिक तौर पर निश्चित करना चाहिये । लेकिन अफगाणिस्तान में अमेरिका का अपयश
देखकर बाहर के देशो द्वारा यह चुनौती स्वीकृत करने की अपेक्षा अफगान जनताने ही आज नही तो कल यह
चुनौती स्वीकृत करना सबसे अधिक उचित होगा ।
तालिबान की यह चुनौती हमारे पडोस के पडोसवाले देशो में पहुँची है । तालिबान पाकिस्तान में अगर नही
घुसना चाहिये तो भारत ने पाकिस्तान के साथ जो बैर है उसे भूलाकर वहाँ की जनता को पुष्टी देनी चाहिये ।
पाकिस्तान राजसत्ता ने तालिबान को समर्थन देने कि मूर्खता रोकनी चाहिये । हमारा देश हम अगर धर्म के
अलग अलग टुकड़ों में बाँटे तो ऐसा समाज संकटो का मुकाबला नही कर सकता । इसलिये तालिबान के
विषय को लेकर अपने देश के सभी मुस्लीमों को तालिबानी ठहराने की अक्षम्य गलती नही करनी चाहिये ।
अफगाणिस्तान में इस्लामी मूलतत्ववादी जैसी तालिबान की प्रतिगामी एव जंगली हुकुमत स्थापित हुई है ।
उसके पाँव तले कुचलने वाली अफगाण जनता मुस्लीम ही है । जिस मात्रा में अफगानी लोग देश छोडकर जा
रहे है यह बात उन्हे हाथ में शरीयत लेकर आई हुई तालिबानी राजसत्ता स्वीकृत नही है यही बताती हैं ।
ऐसे समय में भारत के मुस्लीमों का तालिबानीयों को मूक समर्थन है ऐसा कहना अन्यायकारक है । ऐसा कहते
वक्त हम भारत के मुस्लीम समाज को भारत का हिस्सा न मानकर पुरे विश्व के मुस्लीम समाज का एक हिस्सा
मानते है । इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व के किसी भी मुस्लीम संघटन की ओर से की गई कृती का भारतीय
मुस्लीमों द्वारा हमेशा जाहीर निषेध करना चाहिये ऐसी अपेक्षा हम रखते है । भारत के हिंदुत्ववादी एवं
ब्राह्मणवादी समाज की ओर से दलित बहुजन एवं महिलाओं पर किये गए अत्याचारों का हमारे देश में हम ही
खुले आम निषेध नही करते इस बात को भुला नही सकते । भारतीय मुस्लीमों द्वारा यह निषेध हमेशा करना
चाहिये ऐसी अपेक्षा करना अवास्तव है । पुरे विश्व का मुस्लीम समाज एकसंघ नही है । वह शिया एवं सुन्नी ऐसे
दो विभाग में विभाजित है । लेकिन हर देश के अनुसार उनके रिवाज, जिंदगी के आयाम भिन्न है । विभाजन के
बाद भारत से पाकिस्तान में गए हुये मुसलमानों को वहाँ की जनता ने स्वीकृत नही किया यह वास्तव है । हिंदू
जितने मूलतत्त्ववादी बनेंगे उतने भारत के मुस्लीम मुलतत्ववादी बनेंगे ऐसी चेतावनी प्रखर पुरोगामी
समाजवादी मुस्लीम विचारवंत हमीद दलवाई ने देकर रखी है । इसके साथ-साथ ‘मुसलमानों की राष्ट्र निष्ठा
पर शक लेते गए तो यह समाज दुखी होगा और दूर जाता रहेगा’ ऐसा ही उन्होने कहा था । अर्थात समाज
कंटक बलात्कारी खुनी, डाकू, भ्रष्टाचारी तथा कर न भरने वाले कोई भी अगर वह हिंदू हो तो हम उसे राष्ट्रद्रोही
नही कहेंगे और अगर मुसलमान भारतीय सेना में हो फिर भी उसकी राष्ट्रनिष्ठा के बारे में साशंक रहेंगे ऐसा
दोहरा वर्तन त्यागना होगा । धर्म के आधार पर किये गए गैरवर्तन का सार्वत्रिकीकरण करके उस धर्म के सभी
को जिम्मेदार ठहराने की वृत्ती पक्षपाती है । भिंद्रनवाले पंजाब में हल्लागुल्ला मचा रहे थे तब हिंदुत्ववादी देश
के समुचे सिक्ख परिवार को शीखडया नाम से पुकारते थे और सभी को खलिस्तानवादी मानते थे, इसे हम भुले
नही है । तथा हिन्दुओं को खलिस्तानी दहशत से बचाने के लिये हाथ में बंदूक लेकर पंजाब में कोई संघ या
स्वयसेवक गए थे ऐसा हमने कभी सुना नही है । हिंदुत्ववादीयों की बंदुके केवल अहिंसा के पुजारियों के सिने
पर चलाने के लिये होती है ।
यहाँ और एक सवाल हमारे सम्मुख है । विश्व के सभी दहशतवादी संघटनाएँ – अल कायदा, इसिस मुजाहिदीन
या तालिबान हो – क्या इनका जन्म स्वयंभू है ? या इसमें अमेरिका तथा पाश्चात्य राष्ट्रों का विविध कारणों
से हाथ है ? इतिहास पर अगर नजर डाली तो प्रतिगामी, धर्मांध, लोकशाही पर विश्वास न रखनेवाली
संघटनाओं को आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, जनतंत्रवादी विश्व ने, खास तौर पर अमेरिकाने अन्यान्य कारणों के लिए
अमाप पैसा एवं शस्त्रास्त्रों को दिया है । उसका कारण कभी उस देश का भूभाग तो कभी रशिया का बढता
वर्चस्व, तो कभी सीधे अपने देश की शस्त्र लॉबी का हित अपनाने का प्रयास था । अफगाणीस्तान आज ध्वस्त हो
रहा है और गत अनेक दशकों से ध्वस्त होता आ रहा है इसके पीछे यह कारण है ।
अफगाणिस्तान का इतिहास प्राचीन है । कम-से-कम पचास हजार सालों से मानव का अस्तित्व वहाँ है । विश्व
में सबसे पहले जो खेती हो रही थी इसमें अफगाणिस्तान का नाम अग्रसर है ।पाँच हजारे साल पहले इस देश में
शहरो का निर्माण होने लगा । इसी दरमियान इस इलाके का मुख्य धर्म था झोराष्ट्रीयन धर्म । सिंधू संस्कृती ने
भी इस इलाके को स्पर्श किया और वैदिक धर्म ने भी इस पर दीर्घकाल तक अपना प्रभाव डाला । इसी
कालावधी में यह गांधार नाम से पहचाना जाने लगा । महाभारत की गांधारी इस साम्राज्य की । पर्शिया के
दारियस राजा की ओर से इ.स.५०० साल पहले इस साम्राज्य को नष्ट किया गया । अलेक्झांडर दी ग्रेट ने
दारियस के साम्राज्य पर हमला करके उसको पराजित किया और इस इलाके को अपने साम्राज्य में जोड दिया ।
अलेक्झांडर की हुकुमत चंद्रगुप्त मौर्य ने खत्म की । आगे चलकर सम्राट अशोक ने इस इलाके को अपने साम्राज्य
मे समाविष्ट किया । इसी कालावधी में वहाँ बौद्ध धर्म का प्राबल्य शुरू हुआ । बामियन की भव्य बुद्ध मूर्ती इसी
कालावधी में है । सन १६५ में ग्रीको द्वारा इस साम्राज्य पर कब्जा प्राप्त किया । आगे चलकर कुशण, हून आदि
अनेकों ने इस इलाके पर राज किया । इ.स.३ से ९वी शती में हिंदू एवं बौद्धों की राजसत्ता थी । इस ९ वी शती
में महमूद गझनी की राजसत्ता शुरू हुई थी । हाल ही में अफगाणिस्तान पूर्व इराण एवं पाकिस्तान का इतना
इलाका इस हुकुमत के अमल में आ गया । इस साम्राज्य की राजधानी गझनी बन गई । जो एक अत्यंत संपन्न
सांस्कृतिक तौर पर प्रगत शहर था । १२ वी शती में भले ही घोरी ने इस राजसत्ता को पराजित किया फिर भी
गझनी के वंशज नाशेर नाम से कुछ भागों पर २० वी शती तक राज करते रहे । १३ वी शती में घोरी हुकुमत
मंगोलो की ओर से नष्ट कर दी । मंगोलो की राजवट चंगेज़खान के वंशज तिमूरों ने खत्म कर दी । इस नए
साम्राज्य की राजधानी बन गई हेरात नामक शहर । तिमूर राजपुत्र शाहरुख खान ने विश्व का एक अत्यंत
आधुनिक शहर हेरात को बनाया । इस शहर की तुलना इटली के फ्लोरेन्स शहर से की जाती है । १६ वी शती में
इस राजसत्ता के सूत्र मुगल बादशाह बाबर ने हाथ में ली । लेकिन आगे चलकर बाबर ने दिल्ली को हमेशा के
लिए प्रधान किया । कुछ समय बाद अफगाणिस्तान दुराणी साम्राज्य का हिस्सा बन गाया । दुराणी साम्राज्य
का वशंज अहमदशहा अब्दाली ने मराठों का पानिपत पर पराभव किया । दुराणी साम्राज्य अटक काश्मीर तथा
पंजाब तक फैल गया । सिक्ख राजा रणजितसिंग ने १८ वी शती में इस दुराणी साम्राज्य को बहुत बडा हादसा
दिया और ज्यादा-से–ज्यादा भूभाग पर कब्जा किया । लेकिन अल्पावधी में ही अमीर दोस्त महंमद खान ने
काबुल फिर हस्तगत किया और बराक्झाई शासन निर्माण किया । १९ वी शती में ब्रिटीश एवं रशियन साम्राज्य
की स्पर्धा में अफगाणिस्तान फँस गया । अमीर अब्दुर रहमान इसका बेटा हनिबुल्लाखान एवं पोता
अमानुल्लाखान-ऐसी बराक्झाई राजसत्ता चलती रही । अमानुल्ला खान ने अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए ।
आधुनिक अफगाणिस्तान इसकी निव थी । इसके भाँजे ने जादीरखान ने सत्ता अपने हाथ में ली । इसकी हत्या
होने के बाद उसका बेटा झहीर खान के पास सत्ता आ गई । इसके बाद अफगाणिस्तान के इतिहास ने अलग ही
मोड ले लिया । झहीर खान ने जनतंत्र का प्रयोग करना निश्चित किया जीससे राजकीय पक्ष निर्माण हुए ।
इसमे से ही १९६७ में रशिया से सबंध दिखाने वाला कम्युनिस्ट पक्ष, पीपल्स डेमोक्रॅटिक पार्टी ऑफ
अफगाणिस्तान निर्माण हुए । राजा का प्रधानमंत्री मोहम्मद सरदार दाउद खान ने कम्युनिस्ट नेताओ का कत्ले
आम करना शुरू किया । अंत में कम्युनिस्ट पक्ष द्वारा नूर मोहम्मद तराकी के नेतृत्त्व में १९७८ में रक्त रंजित
क्रांती करके सत्ता काबीज की । दाऊद खान को उसके परिवार सहित मार डाला गया । तरकी अध्यक्ष बन गए ।
१९७९ में इसका प्रधानमंत्री हफिझुल्ल्ला अमीन ने रक्तरंजित क्रांती करके तरकी की हत्या की ओर सत्ता हासील
की । मार्क्स एवं लेनिन के तत्वों पर राज्य कारभार शुरू हुआ । मुस्लीम धर्म को हटाया । अफगाणिस्तान भूतो
न भविष्यति ऐसी आधुनिकीकता अनुभवित करने लगा । महिलाएँ मुक्ती से जिंदगी बिताने लगी । लेकिन यह
आधुनिकता पाश्चात्य संस्कृती से रिश्ता कह्नेवाली थी । इस कम्युनिस्ट राजसत्ता ने पारंपरिक नेताओ, ज्ञानियो
को कारागृह में दाल दिया । हजारों का कत्ल किया । शासन की नीती तथा इस्लामी नेताओ के बीच कडा संघर्ष
शुरू हुआ । सत्ता को बरकरार रखने के लिए रशिया की मदद अपरिहार्य बन गई । धीरे-धीरे यह हुकुमत रशिया
के अमल में जाने लगी । इसे रोकना अमेरिका की आवश्यकता थी । शीत युद्ध का यह कालावधी था । कार्टर एवं
रेगन के शासन ने इस्लामी मूलतत्त्ववादी मुजाहिनों को पैसा एवं शस्त्र देना आरंभ किया । सौदी अरेबिया भी
बहुत सारा पैसा लेकर अमेरिका की मदद करने लगा । दुसरी ओर रशियन सैन्य कम्युनिस्टो की मदद करने लगा
। इस सैन्य ने लाखों अफगानियो को मार डाला । हजारो महिलाएँ बलात्कार का शिकार हुई । लाखों अफगान
देश छोडकर भाग गए । तलवार की बलबुते पर धर्म का प्रसार करना जितना गलत था उतना ही बंदूक के
आधार पर धर्म को हटाना भी गलत था । विश्व दबाव के कारण रशिया ने अपना सैन्य पिछे लेना आरंभ
किया । कम्युनिस्ट राजसत्ता के साथ संघर्ष करने के लिए मुजाहिदीन पर्याप्त नही था । यह चुनौती स्वीकृत करने
के लिए प्रखर संघटना की आवश्यकता थी । तालिबान का कल का कालावधी था १९९४ साल । मुल्ला मोहम्मद
उमरने सिंतंबर १९९४ में तालिबान की स्थापना की । तालिबान इस शब्द का परतून भाषा में अर्थ है विद्यार्थी ।
५० विद्यार्थी लेकर मुल्ला उमरने यह संघटना शुरू की । रशियाने सैन्य हटाने के तुरंत बाद अफगाणिस्तान में
यादवी निर्माण हुई । जनता कम्युनिस्ट राजसत्ता तथा रशियन सैनिकों का अत्याचार तथा मुजाहीन के अतिरेक
से भी बहुत परेशान थी । इस स्थिती को काबू में लाने के लिए शांती एवं सुव्यवस्था प्रस्थापित करने का
तालिबान ने दिया हुआ आश्वासन जनता का हौसला बनाने वाला था । पाकिस्तान एवं सौदी की मदद से
तालिबान ने १९९६ में यह देश अपने कब्जे में लिया । पूर्व राष्ट्राध्यक्ष डॉ. नजीब की हत्या की गई । हत्याओ
का नया सिलसिला शुरू हुआ । तालिबान तो जंगली जानवरों की तरह पेश आने लगे । तालिबान के विरुध्द
लडने वाले अध्यक्ष मसूद की २००१ में हत्या हुई । दो ही दिन के बाद ९/११ का हमला हुआ । जॉर्ज बुश ने
अमरिकन सैन्य को अफगाणिस्तान में लाकर खडा कर दिया । मदद के लिये ब्रिटन भी था । लोकशाही सरकार
स्थापन हुआ । २००९ में ओबामा ने सैन्य में वृद्धी की । २०१० में अध्यक्ष कारझाई ने तालिबान के साथ शांती
का अनुबंध किया । २०१२ में तालिबान द्वारा लागू किए गए निर्बंधो को हटाकर पाठशाला में जाने का प्रयास
करने वाली मलाला युसुफ्झाई पर गोलियाँ चलाई । अमरिका ने ठंडे दिमाग से तालिबान को नष्ट करना आरंभ
किया । दुसरी ओर तालिबान को मदद करने वाला अल कायदा का प्रमुख लादेन को खतम किया । तालिबान
पीछे हटने लगी । २०१४ अश्रफ घनी अध्यक्ष बन गए । दो महिनों पहले अमरिका ने अफगाणिस्तान में से
सैन्य वापस बुलाने का अनपेक्षित निर्णय लिया । अमरिका का सैन्य पीछे हटते ही अल्पावधी में तालिबान ने
३४ प्रांतो से ३० प्रांतो में अपनी सत्ता काबीज की । कंदहार, जलालाबाद, मझार ए शरीफ एवं काबुल पर
कब्जा किया । गत बीस सालों से अच्छी तरह से रहनेवाली लोकशाही खत्म हुई । ‘तालिबान २-०’ सत्ता में आ
गया । केवल ७० हजार तालिबान सैनिकों के सम्मुख करीबन ४ लाख अफगान सैनिकों ने बंदूक की एक भी
गोली न चलाकर हार मानी । इस सैन्य को अमरिका द्वारा दिया प्रशिक्षण, अब्जावधी रुपयों का आधुनिक
शास्त्रस्त्रों का संचय सबकुछ बरबाद हो गया । अफगाणिस्तान में दो दशकों के कालावधि में अफगाणिस्तान को
खडा करने के लिए अमेरिका ने १४५ अब्ज डॉलर्स खर्च किए थे । इसमें से अफगाण सैनिकों पर ८३ अब्ज
डॉलर्स तथा वहाँ के युद्ध पर ८३७ अब्ज डॉलर खर्च किए । इसी दरमियान अमरिका का अफगाणिस्तान में
प्रतिदिन औसतन खर्च ३० करोड डॉलर्स होता था । इससे भी मह्त्वपूर्ण बात यह है कि इस युद्ध में अमरीका ने
अपने २४४२ युवा सैनिक तथा ३८४६ ठेकेदारों को गवाया । मित्र राष्ट्रो ने ११४४ सैनिकों को गवाया । ७०
हजार अफगान पुलिस एवं सैनिक मारे गए । हजारों युवा सैनिक अपाहीज हो गए । ५० हजार अफगाण
नागरिकों की मृत्यू हो गई, तालिबान विरोधी गुट के ५० हजार योद्धा मारे गए, ७२ हजार पत्रकार, ४४४ मदद
कार्य करने वाले और २६ लाख अफगानी नागरिक विस्थापित हो गए । अमरिका एवं विश्व द्वारा लगाई गई यह
किमत मिट्टी के मोल हो गई । राष्ट्राध्यक्ष घनी देश छोडकर अबुधाबी की छाया में चले गए । अमरिका के शस्त्र
सामग्री तालिबान के हाथ में आ गई । तालिबान ने हत्या का नया अध्याय शुरू किया । हजारो लोक देश
छोडकर भागने लगे । हवाई जहाज को लटकने लगे । तालिबान ने शरीयत लागू की । उदारमतवाद, मानवी
हक्क, स्वातंत्र्य, समता, न्याय एवं लोकशाही मूल्यों का तिरस्कार करनेवाले, हिंसा एवं शौर्य पर विश्वास रखने
वाले सत्ता में आ गए । अफगाण समाज फिर से भयानक अंधकार युग मे ढ्केल दिया गया । तालिबान ने
अमरिका की मदद करनेवाले, पुरोगामी विचारवंत, धर्मनिरपेक्ष लोग, महिलाएँ तथा कलाकारो को लक्ष बनाया
। दूरचित्रवाणी, चित्रपट,संगीत तथा चित्रकला पर पाबंदी लगा दी गई । साहित्य कला एवं विज्ञान में पुरे विश्व
को समृद्ध बनाने में इस्लाम का बहुत बडा योगदान है यह बात शायद अर्थशिक्षित तालिबानियो को शायद
मालूम नही होगी । बेटियों की पढाई के पर पाबंदी लगाई गई । पुरुषो को दाढी बढाना तथा महिलाओं को
बुरखा पहनने की अनिवार्यता की गई । इस्लाम नशा निषिद्ध मानती है । विश्व की ९०% अफू अफगाण में ही
तैयार होती है । २००१ मे तालिबान को हटाने पर कुराण एवं शरीयत की नशा चढने वाले तालिबान ने अफू से
मिलने वाले अफाट संपती को पाना शुरू किया । अब तालिबान ने उनकी भूमी पर अफू का एक बीज भी उँगाने
नही दिया जाएगा ऐसी घोषणा की है । अफगाणिस्तान का इतिहास केवल इस्लाम का नही है । वह झोराष्ट्रीय,
सिंधू, वेदिक, बौद्ध,हिंदू पर्शियन, ग्रीक, मंगोल, एवं मुघल जैसे अनेक संस्कृती का मिलाफ है । एक जमाने में
अत्यंत संपन्न आधुनिक संस्कृती का है । अफगाण लोग भारत को अपना बडा भाई मानते है । बडे प्यार से
भारतीयों की मेहमाननवाजी करते है । भारतीय सिनेमा तथा अभिनेता पर प्यार करते है । रवींद्रनाथ टैगोरजी
ने अफगानी ‘काबुलीवाला’ को अपने साहित्य में अजरामर किया है । सरहद गांधी खान अब्दुल गफारखान का
भारतीय स्वातंत्र्य लढा का योगदान अमूल्य है । यही अफगानिस्तान आज ध्वस्त होते हुए दिखाई दे रहा है ।
अफगाणिस्तान को इस्लामी अतिरेकीयों द्वारा ध्वस्त किया गया या साम्राज्यशाही मानसिकता की सत्ताओं ने
ध्वस्त किया इस पर विचार करना आवश्यक है । अमरिकाने तो विश्व के अनेक देशों के साथ लोकशाही रक्षण
हेतू जान की बाजी लगाने वाला यह खेल शुरू किया है । विएतनाम युद्ध से हुई नाचक्की से अमरिका नही सुधर
गई । अमरिका ने अपने देश की शस्त्र लॉबी के आर्थिक फायदे हेतू पुरे विश्व में हमेशा युद्ध, एवं हिस्सा को जारी
रखकर, खुद को जो सत्ता नापसंत है उसे नष्ट करती आ रही है या उस देश में यादवी शुरू करती आ रही है ।
अमरिका के इस भूभाग एवं शस्त्रास्त्रो के स्वार्थ के होम में अनेक देश जलकर राख हो गए । कोरोना महामारी
का सबसे बडा हादसा अमेरिका को हुआ । शायद इसके कारण आर्थिक बोजा कम करने की आवश्यकता महसूस
पडी होगी । अफगाणिस्तान से सैन्य वापस लेने का यह एक बडा महत्त्वपूर्ण कारण हो सकता है । तालिबान
अपनी जंगली मानसिकता छोडकर परिवर्तन करेगी यह मानना फिजूल है । ऐसे समय में हमे अफगाणन
जनता के साथ खडे होना आवश्यक है । इसकेलीए अपने देश की मुस्लीम जनता को विश्वास से हमारे साथ लेना
आवश्यक है । सत्ता का स्वार्थ तथा हिंदूराष्ट्र के कालबाह्य सपनों के लिए मुस्लीम द्वेष करना घातक है । अफगानी
जनता का आक्रोश सुनना भारत की बाह्य सूरक्षा के लिए आवश्यक है और भारत के मुसलमानों का आक्रोश
सुनना भारत की एकसंधता के लिये आवश्यक है । ये दोनों बाते एक दुसरे से पूरक है|
पुरोगामी जनगर्जना

