मुनेश त्यागी
भारतवर्ष का पूरी दुनिया में तिरंगा लहराने वाली कई महिला पहलवान अपने साथ हुए बलात्कार और दैहिक शोषण के खिलाफ पिछले कई महीनों से आंदोलनरत हैं। तीन महीने पहले भी उन्होंने अपनी बात न सुनी जाने के बाद जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन किया था। मगर इसके बाद भी उनके साथ इंसाफ नहीं हुआ, उनकी बात नहीं सुनी गई, उनके आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया।
इसके बाद भारत की ये महिला पहलवान पिछले बारह दिन से फिर से जंतर मंतर पर धरना देने को मजबूर हो रही हैं और बलात्कार के आरोपी बृजभूषण शंकर के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करके, जेल में भेजकर, उसे सख्त से सख्त सजा देने की मांग कर रही हैं।
भारत की अधिकांश पार्टियों और बहुत सारे जन संगठनों ने भारत की इन पहलवान बेटियों को अपना समर्थन दिया है, प्रदर्शन किये हैं, ज्ञापन दिए हैं, धरने दिए हैं और बलात्कार के आरोपी बृजभूषण शंकर के खिलाफ तुरंत कार्रवाई कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है।
पहले तो दिल्ली पुलिस इनकी बात सुन ही नहीं रही थी, मगर जब ये पहलवान बेटियां भारत के सर्वोच्च न्यायालय में जाने को मजबूर हुई तो उसके बाद दिल्ली की महिला विरोधी पुलिस ने आरोपी के खिलाफ शिकायत दर्ज की। मगर अब एफ आई आर दर्ज करने के बाद भी पोक्सो एक्ट और बलात्कार की शिकायत करने के बाद भी दिल्ली पुलिस आरोपी बृजभूषण शरण को गिरफ्तार नहीं कर रही है। दिल्ली पुलिस रोज-रोज भारत के संविधान और कानून के शासन को रौंदती चली आ रही है।
इन बलात्कार की पीड़ित बेटियों को समर्थन देने के लिए वृंदा करात, हनान मौल्ला, सुभाषिनी अली, अरविंद केजरीवाल, सत्यपाल मलिक, राकेश टिकैत, राहुल गांधी प्रियंका गांधी, किसान सभा, एसएफआई, सीटू, महिला समिति, वकील, लेखक, कवि, बुद्धिजीवी, भूतपूर्व नौकरशाह और भारत के विभिन्न संगठन, इन बेटियों की मांगों को माने जाने के लिए इनका समर्थन कर चुके हैं, मगर सरकार किसी की बात को सुनने को तैयार नहीं है और अब तो ऐसा लगने लगा है कि जैसे भारत की सरकार और दिल्ली पुलिस तमाम तरह की मर्यादा और नैतिकता को ताक पर रखकर आरोपी को बचाने में लगी हुई हैं।
यहां पर सबसे बड़ा सवाल उठता है कि भारत सरकार, बीजेपी और हिंदुत्ववादी संगठनों के लोग और आर एस एस के सर्वेसर्वा मोहन भागवत इस बारे में चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? जैसे वे सब के सब अंधे गूंगे बहरे लंगड़े लूले हो गए हैं। जैसे उन सबको सांप सूंघ गया है। उन्हें भारत की पहलवान बेटियों द्वारा उनके खिलाफ बलात्कार के आरोपों के बाद भी कोई यकीन नहीं हो रहा है। आखिर इसका कारण क्या है कि ये सब की सब भारत की सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रवाद की बात करने वाली ताकतें, इस मामले में सोचने को, अपने मुखारबिंद से कुछ बोलने और कहने को क्यों तैयार नहीं है?
इनकी हैरान करने वाली और आश्चर्यजनक चुप्पी से यह स्पष्ट होता है कि इनके द्वारा लगाए गए, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, महिला विकास और महिला सशक्तिकरण के नारे झूठे हैं, इनके वादे झूठे हैं और ये सब के सब जुमलेबाजी कर रहे हैं। इनका महिला सुरक्षा को लेकर सबसे ढुलमुल रवैया है और इनका महिला हिफाजत में, महिलाओं की सुरक्षा में कोई विश्वास नहीं है।
यहीं पर सवाल उठता है कि ये तमाम तथाकथित हिंदुओं की ठेकेदार ताकतें, हिंदुओं के नाम पर वोट बटोरने वाले तमाम संगठन, ऐसा क्यों कर रहे हैं? ये सब के सब, इस तरह की महिला विरोधी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? इसका मुख्य कारण है कि ये तमाम हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतें मनुस्मृति में विश्वास रखती हैं और मनुस्मृति में स्पष्ट तौर से लिखा हुआ है कि भारत की महिलाओं को पढ़ने लिखने का कोई अधिकार नहीं है, उनका काम सिर्फ और सिर्फ पुरुष समाज की सेवा गुलामी और दास्तां करना है। यह मनुस्मृति महिलाओं को कोई अधिकार नहीं देती। पढ़ने लिखने का, नौकरी करने का, अस्त्र शस्त्र रखने का और वह महिलाओं को किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता, समता, समानता दिए जाने के पक्ष में नहीं है।
इन ताकतों की सच्चाई और हकीकत जानने पर पता चलता है कि ये कितने औरत विरोधी हैं। भारत की आजादी के बाद जब भारत का संविधान लागू किया गया तो इन्होंने संविधान का विरोध किया था और कहा था कि हमारे यहां किसी संविधान की जरूरत नहीं है। हमारे यहां तो बहुत पुराने समय से संविधान मौजूद है और इनका वह संविधान मनुस्मृति था जिसका इन्होंने पूरी तरह से समर्थन किया था। ये ताकतें तो आज भी मनुस्मृति के हिसाब से अपना कार्य कर रही हैं और इन्होंने प्रैक्टिस में भारतीय संविधान के आवश्यक सिद्धांतों और जरुरी प्रावधानों को लगभग नकार दिया है।
इसी सोच और मानसिकता को मानने के कारण करोड़ों की संख्या में होने के बावजूद भी ये तमाम मनुवादी और हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतें, भारत की इन पहलवान बेटियों की जायज मांगों का भी समर्थन करने के लिए तैयार नहीं है। इन ताकतों के अनेकों अनेक सांसद, विधायक, मंत्री, प्रधानमंत्री और यहां तक कि भारत की राष्ट्रपति भी, इन्हीं तत्वों से संबंधित रखती हैं, इनकी सदस्य हैं, मगर फिर भी ये तमाम ताकतें महिला पहलवानों पर हुए अत्याचारों को लेकर, आश्चर्यचकित करने वाली चुप्पी, निष्क्रियता और उदासीनता की शिकार है।
इन तमाम तत्वों द्वारा सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रवाद की बात करने वाली, औरतों को देवी बताने वाली, औरतों को देवी, सरस्वती, दुर्गा, गौरी मानने वाली, इन साम्प्रदायिक ताकतों की महिला विरोधी सोच और मौन धारण करने से, हम कतई भी सहमत नहीं हैं। इनकी बातों को देखकर और इनके रवैया से यह स्पष्ट है कि ये तमाम ताकतें महिला विरोधी हैं, इनका भारत की सभ्यता, संस्कृति और औरत के सम्मान में कोई विश्वास नहीं है और इन महिला विरोधी ताकतों का चेहरा देश और दुनिया के सामने बेनकाब हो गया है।
हम इन हिंदुत्ववादी ताकतों के महिला विरोधी रवैया से, सोच और मानसिकता से, सहमत नहीं हैं। इसका एकजुट होकर विरोध किया जाना चाहिए। हम पूरी तरह से इन पहलवान बेटियों को पूर्ण न्याय दिए जाने के समर्थन में हैं। हम यहां यही कहेंगे,,,,,
हमें इस देश की हर बेटी प्यारी है,
चाहे वह बेटी हमारी है या तुम्हारी है।

