पुष्पा गुप्ता
_1850 तक पोप, राजा भी हुआ करता था। इटली जब कई छोटे छोटे राज्यों में विभाजित था, तब पोप की भी अपनी टेरीटरीज थी। वह राजप्रमुख था, राजा था।_
दरअसल इस राज्य को बनाने के लिए वैसी ही खूनी लड़ाइयां लड़ी गयी, जैसे कोई भी और सेना लड़ती।
सीजर बोर्गिया, जो पोप एलेग्जेंडर का (अवैध) पुत्र था, उसने बड़ी लड़ाइयां लड़ी थी, जीत हासिल की थी। उसका दर्जा यूरोप के लीजेंडरी वारियर्स के मध्य है। औऱ वह मैकियवली के “द प्रिंस” का प्रमुख प्रेरणा स्रोत है।
_तो ऐसे लड़ भिड़कर बनाये गए राज्य को विक्टर इमानुअल, अपने अखण्ड इटली में मिला ले, तो उसे अच्छा कैसे लगता। पोप साहिब ने विरोध किया।_
58 साल, विरोध चला। पोप महाशय ने सेंट पीटर्स गिरजाघर के पास बने अपने शानदार महल में खुद को कैद कर लिया। वहीं से तमाम षड्यंत्र, औऱ सरकार की नाक में दम करते रहे।
_उन्होंने घोषणा की, कि इटली की अपवित्र धरती पर पांव नही रखेंगे। 58 साल वे महलनुमा चर्च की चारदीवारों से बाहर नही आये।_
उन्होंने डेमोक्रेसी को ईविल आइडिया कहा। कैथोलिकों के वोट देने, औऱ राजनीति में भाग लेने के विरुद्ध फतवा दिया।
_लेकिन वे अपनी एक कैथोलिक पापुलर पार्टी भी बनाए हुए थे। इस पार्टी में डिवोटेड ईसाई बड़ी संख्या में जुड़े थे। यह पार्टी सरकार का सरदर्द थी।_
मुसोलिनी इसी दौर में लांग मार्च के जरिये सत्ता में आया। अगले चुनाव तक मिलीजुली सरकार चलाई। जो अच्छी चली। तो 1925 में उसे अच्छा बहुमत मिला।
_बहुमत पाकर मुसोलिनी ने असली रंग दिखाने शुरू किए। सारे अक्लमंदों को भगाकर अपने गोबरभक्तों को उच्च पद दिये। देश मे टेरर, गिरफ्तारी, छापे, फासिस्ट गुंडों से पिटाई जैसे कर्म होने लगे।_
सरकारी उद्यम बिकने लगे. अर्थव्यवस्था गिरने लगी। खाद्य का अभाव होने लगा। आत्मनिर्भरता याने “आटार्की” का नारा पहली बार इसी दौर में गूंजा। 1930 आते आते मुसोलिनी को एक मास्टरस्ट्रोक की सख्त जरूरत थी।
भगवान से बड़ा मास्टरस्ट्रोक भला क्या होगा। मुसोलिनी ने पोप से सम्पर्क रखा हुआ था। वह खुद को डिवोटेड कैथोलिक क्रिश्चियन दिखाता था। पोप के सम्मान को वापस लाने के लिए एक सन्धि की।
_यही लैंटरेन ट्रीटी थी। पोप को एक वर्ग किलोमीटर का स्वतंत्र देश दिया गया। अपनी पुलिस, अपने गार्ड, अपना बैंक, सब कुछ स्वतंत्र। यहां तक कि मुसोलिनी के इटली में कोई पोप का मजाक बनाये, तो 5 साल की सजा होती, यह भी सन्धि का हिस्सा था।_
लेकिन जो अनकहा हिस्सा था, वो यह कि की पोप अपनी पापुलर पार्टी खत्म कर देंगे। तो सन्धि के बाद पोप ने पापुलर पार्टी की, और सारे धर्मपरायण कैथोलिक, थोक के भाव मे फासिस्ट पार्टी से जोड़ दिये. मुसोलिनी की डोलती नैया को किनारा मिल गया।
_पोप पायस अब राजा थे। देश विदेश जाने लगे। उन्होंने पड़ोस के जर्मनी में एक औऱ उभरते तानाशाह को संरक्षण दिया। वह नेशनल सोशलिस्ट पार्टी थी। हिटलर की पार्टी जर्मनी के आखरी फेयर इलेक्शन मे नाजी पार्टी की सीटों का उछाल, पोप पायस के आशीर्वाद का नतीजा था। हिटलर गद्दी पर आ गया। जर्मनी में उसके बाद चुनाव नही हुए।_
फासिज्म को धर्म के ठेकेदारों और व्यापारियों का साथ हमेशा मिलता रहा है। इसके पीछे दोनो के बराबर के लाभ छुपे होते हैं।
_यही वो दक्षिणपन्थ है, जो यूरोप इतिहास के कचरेदान में फेंक चुका है। और जिसे हम कचरादान से उठाकर चख रहे हैं।_
{चेतना विकास मिशन)

