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*साम्यवाद के सिद्धांतों से ही बेहतर जीवन की संकल्पना साकार होगी*

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ज़ाहिद खान

साल 2025 भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्मशती वर्ष है। सौ साल पहले 26 दिसम्बर, 1925 को उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर में हुए एक छोटे-से सम्मेलन में साम्यवादी ख़यालात की नुमाइंदगी करने वाली इस इंक़लाबी पार्टी की बाक़ायदा स्थापना हुई। मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार ने सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। कॉमरेड चेट्टियार ने अपने अध्यक्षीय भाषण का आग़ाज़ कुछ इस अंदाज़ में किया था, ‘‘दुनिया के हर इंसान के लिए ज़्यादा ख़ुशहाल बनाने के वास्ते हम जो आंदोलन चला रहे हैं, कम्युनिज़्म के मुख़ालिफ़ीन उसे कुचल देने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे वक़्त हम हिन्दुस्तान के कम्युनिस्ट इस हॉल में जमा हुए हैं। ताकि हम मुल्क के राजनीतिक और आर्थिक हालत पर ग़ौर करें और ऐसे क़दम उठाएँ, जिनसे ख़ुद हमारे मुल्कवासियों की ज़िन्दगी बेहतर और ख़ुशहाल हो।’’ अपनी इस तक़रीर में उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि ‘‘आम लोग ख़ासकर औद्योगिक मज़दूर और खेतिहर मज़दूर हमारे क़दमों की तारीफ़ करेंगे, जिनके फ़ायदे के लिए ख़ास तौर पर यह सम्मेलन हो रहा है।’’ मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार कौन थे और हिन्दुस्तानी सियासत…ख़ास तौर से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में उनका क्या योगदान है ?

अगर इसे अच्छी तरह जानना-समझना है, तो ‘भारत में साम्यवाद की दस्तक और मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार’ एक ज़रूरी किताब होगी। ‘सेतु प्रकाशन’ से प्र​काशित इस किताब के लेखक हैं, ओमप्रकाश कश्यप। कश्यप ने समाजवादी आंदोलन और बहुजन समाज से जुड़ी कई अहम किताबों मसलन ‘समाजवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि’, ‘समाजवादी आंदोलन के विविध आयाम’, ‘पेरियार ई.वी.रामासामी : भारत के वॉल्टेयर’, ‘पेरियार संचयन’ और ‘भारतीय चिन्तन की बहुजन परम्परा’ का लेखन किया है। उनका ज़्यादातर लेखन शोधपरक और बेहद गम्भीर है। किताब ‘भारत में साम्यवाद की दस्तक और मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार’ इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। इसे तैयार करने में उन्होंने काफ़ी शोध किया है, जो किताब में जगह-जगह नज़र आता है। हिन्दी भाषा में चेट्टियार, उनके संघर्षशील जीवन और विचारों पर केन्द्रित यह पहली किताब होगी, जिसमें इतने विस्तार से यह सब बातें एक जगह मौजूद हैं।   

मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार दिग्गज क्रान्तिकारी और मज़दूरों के रहनुमा थे। उनका शुमार दक्षिण भारत के पहले साम्यवादी के तौर पर होता है। सच बात तो यह है कि चेट्टियार ने ग़ुलाम हिन्दुस्तान में कम्युनिस्ट आन्दोलन को एक दिशा देने का काम किया। मजदूर लीडर के तौर पर उन्होंने मुल्क में कई बड़ी हड़तालों की अगुवाई की। उन्हीं की लीडरशिप में 1 मई 1923 को हमारे मुल्क में पहली मर्तबा मजदूर दिवस का आयोजन हुआ। देश की साम्यवादी पार्टियों और उनकी विचारधारा से जुड़े कितने लोगों को यह पता है कि हमारे यहॉं ‘कॉमरेड’ कहने का चलन और मज़दूर इंक़लाब की निशानी लाल झण्डा फहराने की पहल करने का क्रेडिट भी मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार को ही जाता है।

उनका एक बड़ा काम, साम्यवादी विचारधारा पर आधारित ‘लेबर एंड किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान’ की स्थापना करना था। इसी पार्टी ने आगे चलकर देश में साम्यवादी राजनीति की नींव रखी। और उसमें भी चेट्टियार ने मुख्य भूमिका निभाई। किताब ‘भारत में साम्यवाद की दस्तक और मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार’ दो हिस्सों में बंटी है। पहले हिस्से में ‘मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार : घर—परिवार और जीवन’, ‘राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी’, ‘प्रतिबद्ध मज़दूर नेता’, ‘सिंगारवेलु : राजनीतिक सफ़र’, ‘मज़दूर हड़तालों का नेतृत्व’, ‘भौतिकवाद का प्रवक्ता’, ‘समर्पित साम्यवादी’, ‘हिन्दुस्तान मज़दूर और किसान पार्टी : नये इरादे, नये सपने, नया संगठन’ और ‘भारतीय समाज और साम्यवाद’ जैसे अध्याय हैं, तो किताब का दूसरा हिस्सा जो परिशिष्ट के तौर पर है, उसमें मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार के ऐतिहासिक भाषण, लेख, महात्मा गांधी के नाम खुली चिट्ठी और 26 दिसम्बर 1925 को कानपुर में आयोजित प्रथम कम्युनिस्ट सम्मेलन में दिए गए उनके अध्यक्षीय भाषण को शामिल किया गया है। उनके इन भाषणों में भी उनकी इंक़लाबी सोच दिखाई देती है। कांग्रेस पार्टी से कॉमरेड चेट्टियार के सैद्धान्तिक मतभेद थे, पर उन्हें गांधी जी के अहिंसा और असहयोग के रास्ते अपनाने पर कोई गुरेज़ नहीं था। अलबत्ता आज़ादी के बाद वे देश में राजनीतिक और आर्थिक स्वराज चाहते थे।

मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार ने महात्मा गांधी के नाम एक खुली चिट्टी भी लिखी थी, जो कि 24 मई 1921 को ‘द हिन्दू’ में प्रकाशित हुई थी। इस चिट्ठी में ​उन्होंने ‘श्रमिक स्वराज’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा है, ”जितने भी बड़े उद्योग और ज़मीन हैं, उन सभी को देश भर के मज़दूरों के भले और सामूहिक उपयोग के लिए सार्वजनिक क़ब्ज़े में रखा जाना चाहिए। इसी से हमारे देश में असली आज़ादी और सुख-संतोष की वापसी होगी।…हमें असली स्वराज चाहिए, न कि स्वराज के नाम पर भ्रान्ति।” चेट्टियार का मानना था, दुनिया भर के मज़दूरों के सुख-दुख, समस्याएं और चुनौतियॉं एक हैं। जब तक मज़दूरों में एकता क़ायम नहीं होगी, वे पूँजीवाद से नहीं जीत पाएंगे। मज़दूरों का असली दुश्मन पूँजीवाद है। 

18 नवम्बर 1921 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ‘गया सम्मेलन’ में श्रमिक बिल का समर्थन करते हुए चेट्टियार ने स्पष्ट तौर पर कहा था, ”हम साम्यवादी विश्व बन्धुत्व की भावना में विश्वास करते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को तरजीह देते हैं। भारत के श्रमिक वैश्विक एकता को बनाए रखने में मददगार सिद्ध होंगे।…..इसलिए पूँजीपतियों सावधान हो जाओ ! संभलो बुर्जुआओं, संभलो ! हमारे दुखों और अपने पसीने की लकीरों को याद रखो। श्रम ने आपको दुनिया की सारी इनायतें बख़्शी हैं। लेकिन आपने कभी उसे आगे नहीं आने दिया। हमेशा उसे अंधेरे में रखा है।

अपने स्वार्थ, और ज़रूरतों की भरपाई के लिए आप उसकी उपेक्षा करते आए हैं। जबकि आप उसके श्रम, उसके कौशल और बुद्धिचातुर्य से दुनिया की सारी विलासिताओं और सुख-वैभव का मज़ा लूट रहे हैं। लेकिन समय तेज़ी से बदल रहा है। घमंडी बुर्जुआ और उनके मदान्ध सहयोगी, संभले नहीं, तो डुबो दिये जाएंगे।” चेट्टियार की बातें आज भी सच हैं। लेकिन अफ़सोस ! न तो मज़दूरों में एकता स्थापित हो पा रही है, और न ही उन्हें अपनी ताक़त का एहसास है। मज़दूरों की इसी कमी का फ़ायदा पूँजीपति और बुर्जुआ समाज उठा रहा है। दुनिया भर के तमाम देशों में मज़दूर विरोधी कानून बनाए जा रहे हैं और उनका शोषण हो रहा है।   

प्रथम कम्युनिस्ट सम्मेलन में दिया गया मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार का भाषण काफ़ी लम्बा है। इस भाषण में उन्होंने काफ़ी विस्तार से यह बताया है कि देश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ज़रूरत क्यों है। यही नहीं वे रूसी क्रांति और फ्रांसीसी क्रांति के नायकों क्रमश: निकोलाई लेनिन, एम. जौरेस, रोजा लक्जमबर्ग एवं जर्मन लीडर कार्ल लिबकनेक्ट को याद करते हैं, उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हैं। चेट्टियार अपने भाषण में देश के बलिदानियों को भी नहीं भूलते। देशबन्धु चित्तरंजन दास, सुब्रमण्यम शिवा के अलावा वे देश के सभी ज्ञात—अज्ञात बलिदानियों—शहीदों को पूरा सम्मान देते हुए उन्हें अपना सलाम पेश करते हैं। उनका भाषण पार्टी से जुड़े कॉमरेडों को दिशा देने का भी काम करता है।

साम्यवाद के बारे में उस वक़्त देशवासियों की जो जिज्ञासा या सवाल थे, आगे अपने भाषण में वे बिन्दुवार ‘साम्यवाद और स्वराज’, ‘साम्यवाद और कांग्रेस’, ‘साम्यवाद और स्वराजवादी’, ‘साम्यवाद और दमित वर्ग’, ‘साम्यवाद की परिभाषा’, मार्क्सवादी साम्यवाद या मार्क्सवाद’, ‘साम्यवाद और स्पर्धा’, ‘भारतीय साम्यवाद बोल्शेविज्म नहीं है’, ‘हमारा साम्यवादी आदर्श’, ‘हमारा प्राथमिक उद्देश्य’, ‘हमारा तरीक़ा’, ‘मज़दूरों से अपील’, ‘किसानों से अपील’, ‘साम्यवाद का अभियान’ और ‘मौजूदा ख़तरे’ का तर्कसंगत ढंग से ख़ुलासा करते हैं।

भाषण का अंत उन्होंने कुछ इस तरह से किया है—”कॉमरेड्स ! भारत में हम कम्युनिस्ट सभी के लिए एक सादा जीवन की कामना करते हैं। यही हमारा लक्ष्य है। हम ऐसा जीवन चाहते हैं जो रोज़ी-रोटी की चिन्ता से मुक्त हो, अकाल मृत्यु और क्षय के भय से परे हो। उसे अज्ञानता से भी मुक्त होना चाहिए। हम कम्युनिस्टों को यह विश्वास करना ​चाहिए कि साम्यवाद के सिद्धांतों के क्रमिक और शान्तिपूर्ण उपयोग से भारत में बेहतर जीवन लाया जा सकता है।

भारत का भविष्य हमारे हाथों में है, एक बेहतर भारत हमारे सपनों में है, इसलिए आइए हम एक स्वतंत्र भारत के सपने को साकार करने का प्रयास करें, जो शक्तिशाली द्वारा कमज़ोरों के शोषण से सर्वथा मुक्त हो। हम उस कठिन परिश्रम से मुक्त हो जाएं, जो हमारे जीवन को नष्ट कर देता है। हम भुखमरी, बीमारी और मृत्यु से मुक्त हो जाएं, हम बिना किसी बाधा के अपने विचार व्यक्त कर सकें। साथ ही कला, विज्ञान और संस्कृति के उच्चतम उत्पादों का आनन्द ले सकें और श्रम के गीत गा सकें। इन स्थितियों के बावजूद कि 

       लुटेरों के शासन में दुनिया होती जा रही बूढ़ी और उदास 

       दमकते सोने की ज़ंजीरों में बंधे—जकड़े हैं लोग

       फिर भी जब क्रान्ति—नाद होगा, दुनिया उभरते हुए दृश्य को देखेगी

       देखे​गी कि प्रकाश के आने से स्वर्ण—अर्गला पिघल रही है

       ओह ! प्रकाश का आना, ओह ! उम्मीदों का आना

       प्रकाश के आने पर स्वर्ण—अर्गला पिघल जाती है।”

मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार के इस ऐतिहासिक भाषण को पूरी एक सदी बीत गई, देश आज़ाद हो गया, लेकिन देश की स्थितियॉं ज़रा-सी भी नहीं बदलीं हैं। बल्कि कई मामलों में हालात बदतर ही हुए हैं। देश में एक बड़ी आबादी आज भी रोज़ी—रोटी की चिन्ता से जूझ रही है। भुखमरी और बीमारियॉं हैं। शिक्षित होते समाज में अज्ञानता का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। किसान, कामगार और मज़दूरों का शोषण दिन पे दिन बढ़ता जा रहा है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ख़तरे हैं। स्वतंत्र विचारों पर पहरे हैं। कला और संस्कृति के रूप बदल गए हैं। राजनीति ने इन्हें बदरंग कर दिया है। इतना बदरंग कि हम खुलकर इसका मज़ा नहीं ले पा रहे हैं। और ‘श्रम के गीत गाना’, एक ख़्वाब—सा बन गया है। ऐसे में साम्यवादी पार्टियों से जुड़े कार्यकर्ताओं, नेताओं और वामपंथी विचारधारा पर यक़ीन रखने वालों को उन्हीं लक्ष्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, जिसके लिए आज से एक सदी पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी। कॉमरेड चेट्टियार के शब्दों में कहें, तो साम्यवाद के सिद्धांतों के क्रमिक और शान्तिपूर्ण अनुपयोग से ही भारत में बेहतर जीवन की संकल्पना साकार होगी। 

किताब : ‘भारत में साम्यवाद की दस्तक और मलयपुरम सिंगारवेलु चेट्टियार’, लेखक : ओमप्रकाश कश्यप, प्रकाशक : सेतु प्रकाशन नोएडा, मूल्य : 625, पेज : 496

(ज़ाहिद खान पत्रकार, लेखक और समीक्षक हैं।)

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