अजय असुर
*भाग- 9*
जगमोहन के 1990 के कार्यकाल में कश्मीरियों पर अघोषित आपातकाल थोप दिया था और सुरक्षाबलों को हत्या, बलात्कार, जबरन गिरफ्तारियां…. जैसे कारनामों के लिए खुली छूट दे दी गई थी और मजे की बात तो यह है कि सेना और पुलिस के इस बर्बरता को भारत की राष्ट्रीय मीडिया ने बाकायदा जस्टीफाई कर रही थी। सुरक्षा के नाम पर विदेशी मीडिया को कश्मीर घाटी से निकाल दिया था और लोकल यानी स्थानीय मीडिया को सरकारी अंकुश लगा दिया गया था जिससे खबरों के नाम पर ये दलाल मीडिया सिर्फ और सिर्फ झूठ परोस रही थी और राज भवन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति को ही सत्य नारायण कथा की तरह बांच रही थी।
राष्ट्रवाद के नाम पर कश्मीर घाटी के जनता पर बर्बर कार्यवाही को मीडिया और इन राजनैतिक पार्टी के माध्यम से न्यायसंगत बताने का जोर-शोर से ढिंढोरा पीटा गया किन्तु वास्तविक रूप से कश्मीर घाटी के जनता के दिलो-दिमाग में ऐसी कार्यवाहीयों पर भारत विरोधी भावनाओं के रूप में उभरता गया। कश्मीरी नागरिकों के सभी हिस्से यहां तक कि सरकारी कर्मचारीयों का वह वर्ग जो अपने-अपने विभागों के झंडे उठाए रहते थे वो भी आजादी की मांग को लेकर सड़कों पर राज्य और भारत सरकार के खिलाफ और कश्मीर की आजादी के लिये उतर आये। जिसके फलस्वरूप उस दौरान बैंक, डाक, बीमा और अन्य विभाग के अलावा सामाजिक और लोककल्याण सम्बन्धी काम भी ठप्प हो गये। सरकार ने लंबे-लंबे अंतराल के लिये लगातार कर्फ्यू लगाये। जिससे सभी प्रकार की गतिविधियों स्वतः ठप्प हो जाती।
सरकारी सत्ता के दमन की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना निर्वाहन मौलवी फारूक की हत्या के बाद निकले जनाजे पर फायरिंग के रूप में सामने आयी। शासक वर्ग के इस तरह के दमन और अत्याचार ने कश्मीरियों को हथियारबंद संघर्ष की और मुड़ने के लिये मजबूर कर दिया, कश्मीरी जनता के दिलों में भारत सरकार के खिलाफ जो अविश्वास था ऐसे दमन और अत्याचार ने घाटी के लोगों के दिलों में आग में घी का काम किया।
इसमें कोई शक नहीं कि जगमोहन ने स्वयं कश्मीरी पण्डितों को घाटी छोड़ने के लिए कहा और उनके पलायन के लिए गाड़ियाँ तक मुहैया करायीं ताकि उन्हें घाटी में निर्ममता से सुरक्षा बलों का इस्तेमाल करने का बहाना मिल जाये। एक लेखक व पत्रकार तवलीन सिंह सिंह लिखती हैं कि “यह तो सच ही है कि जगमोहन के कश्मीर में आने के कुछ दिनों के भीतर वे समूह में घाटी छोड़ गए और इस बात के पर्याप्त सबूत है कि पलायन के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराये गए थे।” जगमोहन के कार्यकाल में कश्मीरी पण्डितों को सुरक्षित माहौल नहीं मिल पाया जिसकी वजह से पण्डितों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। उस समय जम्मू व कश्मीर में तैनात वरिष्ठ नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह ने लिखा है कि घाटी के कई मुस्लिमों ने उनसे कश्मीरी पण्डितों के पलायन को रोकने की गुहार लगायी थी जिसके बाद उन्होंने जगमोहन से आग्रह किया था कि वे दूरदर्शन के प्रसारण के माध्यम से कश्मीरी पण्डितों को घाटी न छोड़ने के लिए कहें। लेकिन जगमोहन ने ऐसा करने की बजाय यह घोषणा की कि अगर कश्मीरी पण्डित घाटी छोड़ते हैं तो उनका इन्तजाम शरणार्थी शिविर में किया जायेगा और सरकारी कर्मचारियों को उनकी तनख़्वाहें मिलती रहेंगी।
भाग- 10*
18 सितंबर 1990 को स्थानीय उर्दू अखबार अफसाना के माध्यम से कश्मीरी पण्डित के. एल. कौल बताते हैं कि “पण्डितों से कहा गया था कि सरकार कश्मीर में एक लाख मुसलमानों को मारना चाहती है जिससे आतंकवाद का खात्मा हो सके। पण्डितों को कहा गया कि उन्हें मुफ्त राशन, घर, नौकरियों आदि सुविधाएँ दी जाएंगी। उन्हें यह कहा गया कि नरसंहार खत्म हो जाने के बाद उन्हें वापस लाया जाएगा।” इससे यह बात साफ स्पष्ट हो जाती है कि जगमोहन को कश्मीरी पण्डितों के सुरक्षा के लिये नहीं अपितु कश्मीरी पण्डितों को भागने और सांप्रदायिक माहौल को बनाने के लिये भेजा गया था।
जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव रहे अशोक जेटली कहते हैं कि “जगमोहन ने पाँच महीने में वह कर दिया जो आतंकवादी पाँच सालों में नहीं कर पाते।” खेला हो जाने के बाद 26 मई 1990 को ही जगमोहन को राज्यपाल पद से स्तीफा दिलाकर, इस खेल के इनाम के रूप में जगमोहन मल्होत्रा को तुरन्त ही भाजपा ने 1990 में ही राज्यसभा में एक मनोनीत सांसद बना दिया और 1999 में भाजपा की सरकार बनने पर अटल बिहारी की एनडीए सरकार में मंत्री पद देकर पुरुस्कृत भी किया।
1990 का वो जनवरी की हाड़-मांस को जमा देने वाली वो काली रात का दौर भूला नहीं जा सकता, जब प्रायोजित कार्यक्रम के तहत कश्मीरी पण्डितों पर जुल्म हुए उसके बाद बीजेपी ने कश्मीरी पण्डितों का मुद्दा मुसलमानों को विलेन साबित करने के लिए राष्ट्रीय मुद्दा बना लिया। जब तथाकथित आतंकवादियों (आर एस एस के गुण्डों) ने कश्मीर से वहां के पण्डितों को विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया था। घाटी में हिंसा अपने चरम पर थी और प्रदेश के हर कोने से दिन प्रतिदिन कश्मीरी पण्डितों के हत्या की खबर आती थी। लाखों की संख्या मे जब कश्मीरी पण्डित अपना घर छोड़ सरकारी शिविरों में रहने को मजबूर किये गये। आज उस दुखद घटना के तीन दशक बाद भी कितनी सरकारें आई और गई लेकिन कश्मीर घाटी में पण्डित वापस अपने घर नहीं लौटे हैं। 1999 में अटल बिहारी के नेतृत्व में पूरे 5 साल भाजपा का शासन रहा है और फिर इधर तथाकथित हिंदूवादी भाजपा सरकार पिछले 8 साल से केंद्र में बीजेपी की प्रचंड बहुमत की तथाकथित हिंदूवादीयों की सरकार है और कश्मीर से धारा 370 हटा चुके हैं। पर इन विस्थापित एक भी कश्मीरी पण्डित के परिवार को पुनर्स्थापित नहीं किया और ना ही उनके हितों का जरा भी ख्याल आया, ना ही इनके पुनर्वास की ओर कोई योजना बनाई और कुछ भी नहीं किया और ना ही कुछ कर रहें इन कश्मीरी पण्डितों के हइत में। करेंगे भी क्योँ? भाजपा के लिये कश्मीरी पण्डितों का कश्मीर से बाहर रहना ही हितकर है, नहीं तो ये कश्मीरी पण्डितों के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटी कैसे सेकेंगे?
*शेष अगले भाग में….*
*अजय असुर**राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा*

