-चंद्रशेखर शर्मा
दो दिन में दो पत्रकार साथियों की कोरोना से मौत सचमुच झकझोरने वाली है। पहले राजेश मिश्रा और अब जीएस यादव। दोनों बहुत मेहनती, सरल और काम के प्रति समर्पित साथी थे। ये कोई उम्र थी इनके जाने की ? किसी सूरत नहीं। इन दोनों के कुछ दिन पहले एक और पत्रकार साथी गुड्डू भी ऐसे ही चल दिए। सूझ नहीं पड़ रहा कि मन के दुःखी भावों को किन शब्दों में बयां करूं।
पिछले कुछ समय में देखने में आया है कि समाज में पत्रकारों की प्रतिष्ठा और सम्मान का क्षरण हुआ है। ये हकीकत है कि अब बहुत लोग पत्रकार समुदाय को हिकारत की नजर से देखते हैं। उस हिकारत के उनके अपने जायज-नाजायज कारण हो सकते हैं, लेकिन यह भी हकीकत है कि पत्रकार भी अंततोगत्वा जनता का नुमाईंदा होता है। इनमें से ज्यादातर बहुत कठिन परिस्थितियों में अपने काम को अंजाम देते हैं। उन्हें असह्य तनाव और दबावों से जूझना पड़ता है। इसके बावजूद दुनियाभर की तमाम अच्छी-बुरी सूचनाएं लोगों तक पहुंचाने के उनके उत्साह में कभी कमी नहीं आती। एक छोटे से वर्ग को छोड़ दें तो पत्रकारों के बकाया बड़े वर्ग को बहुत कम वेतन पर गुजारा करना पड़ता है। पत्रकारिता को यदि सोना माने तो निर्भीकता उसका सुहागा है, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर पत्रकार अपनी दुश्वारियों को अपने ही संस्थानों में उठाने में बहुत भीरू साबित होते हैं। सच तो ये है कि ऐसे पत्रकारों की जान को सैकड़ों गम होते हैं। एक किस्म का ये चक्रव्यूह होता है और आप उसे पत्रकारिता का क्रेज कहें, शौक कहें या बेचारगी कि वो उसमें से चाहकर भी बाहर नहीं आ पाते।
एक समय था कि इसके बावजूद उसे समाज से मिलने वाली इज्जत और सम्मान के सामने अपनी तमाम दुश्वारियां या धूल लगती थीं या विस्मृत हो जाती थीं। गोया ले-देकर उसकी तमाम साधना और जीवन की वो असल कमाई होती थी। वो सम्मान और वो इज्जत उसे ऐसे रुतबे से नवाजती थी जिसकी बिना पर वो समाज की बेहतरी और हक के लिए किसी से भी भिड़ने में कोई संकोच नहीं करता था। लेकिन अब ? अब सम्मान और इज्जत तो दूर, समाज अपनी इस जांबाज और निडर सेना को दुत्कार और हिकारत से देखने लगा है। यों कहते हैं कि आज भी जब कोई हर तरफ से निराश होता है तो आखिर में मीडिया से ही उम्मीद बांधता है। बहुत हद तक यह सही भी है। अलबत्ता फर्क देखिए और यह भी हकीकत है कि एक समय इसी उम्मीद के साथ लोग सबसे आखिर में नहीं, बल्कि सबसे पहले मीडिया के पास जाते थे और उनकी वो उम्मीद अक्सर पूरी भी होती थी। ऐसे बेशुमार उदाहरण हैं। जो हो।
कोई एक दशक पहले अपनी सक्रिय पत्रकारिता में मुझे ये आभास हुआ था कि नेताओं और अधिकारियों का गठबंधन मिलकर बहुत गोपनीय और सुनियोजित तरीके से पत्रकारों को साजिशन बदनाम करने लगा है। उसके लिए वो कतिपय पत्रकारों के वैसे चाल-चलन और करतूतों को हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे और निशाने पर पूरी पत्रकार बिरादरी को रखते थे। इस साजिश में धीरे-धीरे उन्होंने पत्रकारों को बायपास कर सीधे मालिकों तक पहुंच बना ली। ज्यादातर मालिकों को भी ये मुआफ़िक जान पड़ा। खैर। असल बात ये कि नेताओं और अधिकारियों को ये इसलिए करना पड़ा कि उन्हें बोध हो गया था कि उनके जितने भी खटकरम हैं उनकी पूर्ति में कोई बाधा है तो वो है पत्रकार जगत। वो पत्रकार जगत, समाज में जिसकी विश्वसनीयता और सत्यनिष्ठा असंदिग्ध है। सो वो जान गए थे कि इस विश्वसनीयता और सत्यनिष्ठा को धूल किए बिना उनके हेतु सधने वाले नहीं। उलटे उनके उन हेतुओं का भंडाफोड़ होने के आसार ज्यादा। सो उधर से उस विश्वसनीयता और सत्यनिष्ठा की साजिशन जड़ें खोदना शुरू हुआ। उस समय मुझे ऐसी कई हरकतें पता चली थीं और मुझे अच्छे से याद है तब मैंने इस बारे में अपने कई साथी पत्रकारों को आगाह भी किया था।
बहरहाल ये बात और इस साजिश को समाज को भी ठीक से समझने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि पत्रकार जगत पूरा दूध का धुला है, लेकिन तय मानिए हर जगह अच्छे लोग ज्यादा हैं। यद्यपि बात पत्रकार साथियों के इस महामारी के शिकार होकर उनके असमय निधन की वेदना से शुरू हुई थी, लेकिन अंत में गुजारिश यही है कि समाज और पत्रकारों के बीच विश्वास का जो सेतु दरका है और दरक रहा है उसके बारे में समाज और पत्रकार जगत दोनों को समय रहते बहुत चिंतन दरकार है। इसी में दोनों का और देश का भला है। सनद रहे, दोनों को एक-दूसरे की बहुत जरूरत हमेशा रही है और आगे भी रहेगी। आगे हरि इच्छा
!-चंद्रशेखर शर्मा

