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बिहार के अप्रत्याशित चुनाव परिणाम से देश का लोकतांत्रिक जनमत सकते में 

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विपक्ष के लिए गम्भीर आत्म मंथन का समय है। वह कैसे अपने जनाधार को व्यापक बना सकता है तथा चुनाव आयोग के गठन से लेकर उसकी कार्यवाही को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए जनता को सड़कों पर जनांदोलन में उतार सकता है।

लाल बहादुर सिंह

बिहार के अप्रत्याशित चुनाव परिणाम से देश का लोकतांत्रिक जनमत सकते में है। लग तो यही रहा था कि कांटे की टक्कर लेकिन एनडीए इतने प्रचंड बहुमत से विजयी होगा और महागठबंधन की इतनी बुरी पराजय होगी इसका किसी को पूर्वानुमान नहीं था।

चुनाव विशेषज्ञ संजय कुमार के अनुसार इस तरह का प्रचंड बहुमत यह दिखाता है कि मतदाता मोटे तौर पर सरकार के काम से संतुष्ट थे और भविष्य के लिए सरकार के वायदों पर उन्हें विश्वास था कि वे पूरे होंगे। विशेषकर यह बात महिला मतदाताओं पर लागू होती है जिन्होंने एनडीए को निर्णायक जीत दिलाई।

वैसे कुल प्राप्त वोटों के लिहाज से देखा जाए तो राजद सबसे आगे रही लेकिन नीतीश या भाजपा की 101 और 101 सीटों के बदले उसे ये वोट 143 सीटें लड़ कर हासिल हुए। चुनाव नतीजों से यह भी स्पष्ट है कि राजद अपने कोर वोट पाने में तो अभी भी सफल रहा लेकिन उसके बाहर से अन्य वोटों को पाने में बुरी तरह नाकाम रहा।

जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर के बड़बोले दावों के विपरीत उन्हें कोई सीट नहीं मिल सकी,  अलबत्ता उन्हें 3% वोट जरूर मिला। बिहार से पलायन, शिक्षा, रोजगार आदि के सवालों को उन्होंने जोर-शोर से उठाया। बाद में अन्य पार्टियों ने भी ये सवाल उठाए।

बहरहाल कुछ सीटों पर भले उन्होंने एनडीए के वोट भी काटे हों आम तौर पर सत्ताविरोधी वोटों, एंटी इनकंबेंसी वोटों को उन्होंने एकमुश्त महागठबंधन की ओर नहीं जाने दिया और उसमें से एक हिस्से को महागठबंधन में जाने से रोकने में वे सफल रहे। वैसे तो जन सुराज ने लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास किया लेकिन वह इसमें सफल नहीं हुई।

लड़ाई अंततः एनडीए और महागठबंधन के बीच आमने सामने की ही हुई। एनडीए को 202 सीटें मिलीं और उसका मत प्रतिशत 46.6% रहा। महागठबंधन को मात्र 35 सीटें मिलीं। उसका मत प्रतिशत 37.7% रहा। मोटे तौर पर अन्य को मिलने वाले मत हमेशा से कम मिले। 2010 में एनडीए को मिली रिकॉर्ड 206 सीटों से चार सीटें ही कम मिलीं।

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने फिर 2020 के अपने इतिहास को दोहराते हुए 5 सीटें जीत लीं और अनेक सीटों पर महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया। भविष्य में विपक्ष को इसके प्रति भी सही रिस्पांस डेवलप करना होगा।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि कुल मतदाताओं के 42% ने किसे वोट देना है इसे अंतिम दौर में तय किया। अंतिम दौर में फैसला लेने वालों में 47% ने एनडीए के लिए मतदान किया। वहीं 36% ने महागठबंधन के लिए वोट डाला। कुल मतदाताओं के 50% ने माना कि प्रदेश के विकास के लिए डबल इंजन की सरकार जरूरी है। वहीं 37% का मानना था कि प्रदेश के विकास के लिए केंद्र और राज्य में एक ही सरकार का होना जरूरी नहीं है।

अधिकांश मतदाताओं की राय थी कि ऐसी सरकार बने जो प्रदेश को विकास की राह पर ले चले। मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों की बजाय राज्यस्तरीय मुद्दों पर वोट डाला। इस चुनाव में भाजपा नीतीश के पास फिर सबसे बड़ा मुद्दा “लालू के जंगल राज” का था 1990 से 2005 के बीच का। अधिकांश मतदाताओं का मानना था कि कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक है। इस मुद्दे पर खास तौर से महिलाएं बेहद संवेदनशील थीं।

पिछड़े दलितों को आवाज देने में लालू की जो भी भूमिका रही हो यह सच है कि महिलाओं के लिए विधि व्यवस्था का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण था। उनके लिए लालू राबड़ी राज की कानून व्यवस्था की स्थिति एक दुष्वप्न जैसी थी जिसे किसी भी हाल में वे लौटते हुए नहीं देखना चाहती थीं।

इसी संदर्भ में शराब बंदी का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। भले चोरी छिपे शराब का मिलना वहां जारी रहा हो और जहरीली शराब से समय समय पर वहां मौतें और अधिकांशतः गरीबों की गिरफ्तारियां होती रही हों। यह जगजाहिर है कि शराब बंदी के बाद शराब माफिया का एक समांतर सिस्टम वहां चल निकला था जो महंगे दाम पर शराब उपलब्ध कराता था।

लेकिन यह भी सच है कि इससे गरीब परिवार की तमाम महिलाओं पर घरेलू हिंसा में कमी आई है, अनावश्यक खर्च से परिवार में कुछ बचत हुई थी और आम तौर पर महिलाओं ने राहत की सांस ली थी। महिलाओं के इस विश्वास से नीतीश कुमार को लाभ मिला और तमाम आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने शराब बंदी की योजना पर रोक नहीं लगाई।

दरअसल महिलाओं का मत जो अंततः निर्णायक साबित हुआ वह महज दस हजार रूपये का परिणाम नहीं था। इस वोट बैंक को बीस साल के अपने कार्यकाल में नीतीश कुमार ने दूरदृष्टि के साथ कल्टीवेट किया था। लड़कियों को स्कूल जाने के लिए उन्होंने साइकिल दी, यूनिफॉर्म दिया।

इन पंक्तियों के लेखक के लिए सचमुच यह देखना सुखद आश्चर्य था कि नीतीश के पहले कार्यकाल में बिहार के छपरा में लड़कियां झुंड की झुंड साइकिल से स्कूल जा रही थीं। तब से एक पीढ़ी बीत गई और वे लड़कियां माताएं बन गई और घरों की मालकिन हो गईं। नीतीश कुमार के साथ वे मजबूती से खड़ी रहीं। मतदाताओं में आमतौर पर संतुष्टि का भाव था। ऐसे लोगों की तादाद बहुत बड़ी थी जो डबल इंजन की सरकार से संतुष्ट थे।

CSDS के आंकड़ों के अनुसार यह लगभग 75% के आसपास थी, 75% का मानना था कि बिजली समय से आ रही है। 70% रोड बनने से संतुष्ट थे। 60% लोगों का मानना था कि स्कूल पहले से बेहतर हुए हैं। इतने ही लोगों का मानना था कि पेय जल की व्यवस्था बेहतर हुई है।

54% लोगों का मानना था कि अस्पताल पहले से बेहतर हुए है। 48% का मानना था कि कानून व्यवस्था बेहतर हुई है। 60% लोगों का मानना था कि नीतीश कुमार को बतौर मुख्यमंत्री एक मौका और देना चाहिए। सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने महिलाओं को पुरुषों से अधिक आकर्षित किया।

विपक्ष कुशासन की बात को नीचे तक नहीं ले जा सका और आम मतदाताओं विशेषकर महिलाओं को  आकर्षित करने में विफल रहा। महिलाओं के भारी मतदान ने एनडीए को विराट जीत दिलाई। एनडीए को जहां सभी तबकों का वोट मिला वहीं महागठबंधन अपने कोर वोट तक सीमित रह गया। वह अपने कोर वोट के बाहर से कोई वोट आकर्षित नहीं कर पाया। वह अपने कोर वोट के बाहर के अप्रतिबद्ध वोटर जो किसी से प्रतिबद्ध वोट नहीं था उसे आकर्षित नहीं कर पाया। राजद को 70% यादव-मुस्लिम वोट मिला, लेकिन अन्य वोट नहीं मिल सका।

इस सब के ऊपर चुनाव आयोग ने जिस तरह साम दाम दंड भेद, हर तरह का तिकड़म करने में एनडीए की मदद की, उसने एनडीए की प्रचंड जीत पर मुहर लगा दी।

जाहिर है विपक्ष के लिए गम्भीर आत्म मंथन का समय है। वह कैसे अपने जनाधार को व्यापक बना सकता है तथा चुनाव आयोग के गठन से लेकर उसकी कार्यवाही को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए जनता को सड़कों पर जनांदोलन में उतार सकता है।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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