शशिकांत गुप्ते
वजन तोलने की मशीन शब्दों को कैसे तोलती होगी?
यह सामान्यज्ञान का प्रश्न है?
मनोचिकित्सकों का मत है कि सामान्यज्ञान का उपयोग बहुत कम लोग ही करतें हैं,या कर पातें हैं।
शब्दों में वजन होता है,यह सुना है। शब्दों के वजन से तात्पर्य उपदेश देने वाले शब्द, सुविचार,अनमोल विचार आदि।
गाली जैसे तुच्छ शब्द में वजन कैसे हो सकता है?
शब्दों में वजन होता तो अभीतक आठ करोड़ बेरोजगारों को रोजगार मिल जाता। 35 रुपये लीटर पेट्रोल बिकता। महंगाई की मार से छुटकारा मिल जाता आदि आदि।
गालियां देने वाले संस्कारहीन लोग होतें हैं। आलोचना को गाली समझना अपरिपक्वता का लक्षण है। आलोचना को वही व्यक्ति गाली समझता है जो अपराधबोध
(Guilty feeling) से ग्रस्त होता है।
संत कबीरसाहब ने कहा है।
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।
अर्थ : जो हमारी निंदा करता है
उसे अपने अधिक से अधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।
यह उपदेशक दोहा उन लोगों के लिए हैं। जो स्वयं सदाचारी होतें हैं।
असहमति लोकतंत्र की बुनियाद है। जो कोई अपने स्वयं की आलोचना सहन नहीं करता है,उसकी सोच लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकती है।
यदि आलोचना को गाली समझा जाए,तो राष्ट्रपिता महात्मागांधी की यदि आत्मा जागृत होगी तो वह हाजरो किलों गालियों से पीड़ित होगी?
प्रथम प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरूजी भी पता नहीं कितने किलों गालियों को सहन करतें होंगे?
पता नहीं किस विशेषज्ञ ने यह खोज की है कि, गालियों का वजन होता है। एक गाली कितने ग्राम की वजन की होगी?
गालियां बकना दुश्चरित्रता है।
क्या हेट स्पीच गालियों की परिभाषा में आएगा?
साहित्य में आलोचकों का अपना विशेष महत्व होता है। साहित्य को समझने के लिए सिर्फ पढालिखा होना पर्याप्त नहीं है,शिक्षित होना अनिवार्य है।
गालियों को गिना जाता है तोला नहीं जाता है। द्वापरयुग में कृष्ण भगवान ने शिशुपाल का वध गालियां गिनने के बाद ही किया था।
इस मुद्देपर संत कबीरसाहब का यह दोहा सटीक है।
ज्ञानी को ज्ञानी मिले, रस की लूटम लूट,
अज्ञानी ज्ञानी मिले, होवे माथा कूट।
विशेष नोट:- यदि गालियों पर जीएसटी लग जाएं तो विरोधी,सामाजिक कार्यकर्ता ही दोषी हो सकतें है।ऐसी सम्भवना से इंकार नहीं किया जा सकता?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

