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*समाजवादी आंदोलन की दिशा-दो धाराएँ-धार धार या धार चीर ?*

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(सन 1971 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का विलय हो कर सोशलिस्ट पार्टी बनी। सन 1972 आते आते राज नारायण इस विलय से नाराज़ हो गये। जॉर्ज और मधु लिमये उनके विचारों से असहमत थे। ’72 का अंत आते-आते सोशलिस्ट पार्टी का विघटन हुआ। ऐसे वक्त में मामा जी एक निष्पक्ष व्यक्ति के तौर पर काम कर रहे थे। यह उनके इन विचारों से लगता है।वे शिखर पर बैठे  नेताओं के बजाए शाखाओं के महत्वपूर्ण बनाने पर जोर दे रहे थे। यह विचार विवेक मेहता के सौजन्य से मामा बालेश्वर दयाल की पुण्यतिथि पर प्रकाशित कर रहे हैं।)

        एक नारा दिवंगत लोहिया ने दिया था-टूटो या सुघरो। अन्तर्चक्शु खुले होते तब तो पिछले दौर में ही सुधर जाते। पर अब टूट हो गई तो भी सुधरने की सीढ़ी कायम है। दुर्भाग्य होगा अगर कोई इसे टूट नहीं मानता। सिद्धांत में दोष था या संगठन में, इस जाल में नहीं फंसना है।

       निष्कासन और इलाहाबाद समान्तर सम्मेलन भी टूट के कारण नहीं है। वे परिणाम हैं उस शिखर राजनीति के जिसके संचालन और कौशल की प्रतिस्पर्धा में ही सब नेता नम्बर लेने के जतन करते रहे है। शिखर दोष को नियमित करने हेतु बहुमत की खोज में शिखर गुटबंदी अनिवार्य हो जाती है।

        दो शक्तियां रही हैं जो इन्सान को किसी भी दिशा में प्रवाहित करती है, धर्म या शासन। धर्म जब आचरण हीन हो जाता है तब विज्ञापन उसे तर्क से तोड़ देता है। शासन ही जब संगठन संचालक हो जाता है तब कार्यक्रम की कमजोरी उसे तोड़ देती है। ऐसा अंकुश हीन शासन समाज में अनुशासन हीनता फैलाता है। सभी सामाजिक, राजनैतिक संस्थान इसके शिकार होते हैं। ये सब जाने-अनजाने एकाधिकार की भाव-भूमिका पूरी करते हैं। दोनों ही स्थितियों में समाज का बिखराव होता है।

         समाज का अर्थ है-साथ चलों। इसी आंदोलन का नाम समाजवाद है। इसी साथ चलो को जब कोई समाजवाद की दुहाई देकर साथ चलाओ कर देगा, तब वहीं समाजवाद हो आयेगा, एकाधिकार-वाद, यानी दंडात्मक, एक साथ हांको पशु वत या मशीन वत ।

      पिछली ६ माही में देश में जो दो घटनाएं हुई हैं, उनमें सिद्धांत के नहीं व्यक्तियों के ही द्वन्द थे। तमिलनाडु के द्रमुक में तीन महा नेता का द्वंद्व है। अलग-अलग तीनों का विश्वास है कि वे अकेले ही द्रमुक को हांक सकते हैं। सोशलिस्ट पार्टी में तीन नहीं तो ५-७ का द्वन्द है कार्यक्रमों का। विश्वास पर अभी में कुछ नहीं कहूंगा।

       बुराई दूर न करते हुए आदमी को उसी के बुरे हथियार से खत्म करें, ये एक सस्ती किन्तु गन्दी आदत अनायास आ जाती है। यही आदत आज सोशलिस्ट पार्टी के द्वन्द की बुनियाद है। राज नारायण जी जो करते रहे हैं, उसी बुराई से (हथियार से) उन्हें या तो दुरुस्त करों या दूर करो। यही रहस्य है आज की टूटन का, विघटन का । 

         दिल्ली एडहॉक समिति की बैठक में मैंने सुझाव दिया था कि जब तक सम्मिलित सम्मेलन न हो जाए, कोई भी एडहॉक समिति दण्डात्मक संचालन से परे रहे। दफ्तर सिर्फ संयोजन पर सचेष्ट रहें, ताकि संयोजन समिति में सम्मेलन, विधान, आचरण पर किसी समग्र दृष्टि का सर्जन कर सकें। पर दफ्तरी कौशल के नेता सुझाव को ठुकरा गये। फलतः २-३-४ ग्रुपों में आज समाजवादी विघटित हैं। इसे हकीकत न मानना संगठन सुधार से इंकार होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

        समाजशास्त्री की एक राय है कि सामाजिक बुराई के सुधार तंत्र के लगातार संचालित करते रहने पर भी अगर बुराई बढ़ती ही जाए तो अंतिम तंत्र का अमल करो और समाज का ढांचा हो उलट दो। इस संकट सिद्ध-तंत्र में जोखम है पर यह आखरी इलाज है।

        विघटित इकाईयों के नेताओं से हम निवेदन करते आ रहे हैं कि अगर “जुल्म हटाओ-जनता बचाओ” की धड़कन शेष है तो सीमित मुद्दत के लिये एकाधिकार प्रेरक शिखर संगठन को शाखाई संगठन के तंत्र में पलट दो। जिस कार्यक्रम और नीति के लिये कार्यकर्ता मरता है, जूझता है उसका सर्जन एक बार उसी की सलाह से हो लेने दो। नीति-कार्यक्रम-आयोग प्रांतों में उनसे नजदीकी सम्पर्क करें, सदस्यता का फैसला करें, इस आयोग-रपट के सम्पादन में तीनों-चारों विघटित इकाईयों को खुले मन से नुमाइंदगी दो, ताकि सम्मेलन में पारित नीतियां ही शाखाओं की नेता बन सकें। किसी राजधानी के बदले शाखाएं ही संगठन का केन्द्र बने, ताकि नेताओं में तलब पैदा हो कि वे जोखम और मेहनत करके क्षेत्र शाखाओं और उनके सजीव दफ्तरों को दर्शन दें। आखिर केवल बोली के परिवर्तन से ही जनता आपको कांग्रेस का विकल्प तो नहीं मानेगी, वह आचरण भी परखेगी। राजनीति की अधोगामी धारा को पलटकर जब उसे ऊर्ध्वगामी बनाओगे तभी तो कांग्रेस की केन्द्र सीमित सत्ता के बदले व्यापक जनता में गठित विश्वास केन्द्रों का विकल्प अमूर्त कर पाओगे।

       अब तक शाखाई भावुकता ने भारी भरकम नेताओं की गलती का अधिकार जनतंत्र में बर्दाश्त किया। क्या परेशानी है अगर इस बार शाखाओं के प्रयोगात्मक अधिकार को मान लें और कुछ समय तक धीरज से बर्दाश्त करें। नेता सीमित इकाई है, जनता तो शक्ति की विराट इकाई है। वह संकट संग्राम में सक्षम है।

(नई दुनिया 13 नवम्बर 1972)

समाजवादी एकता पर बातचीत अंश

“दो आखाड़े एक दफ्तर वाला अखाड़ा और एक इलाहाबाद वाला। इन दोनों के बीच हम पार्टी ना बनाकर समाजवादी आंदोलन का ढांचा बनाए रखेंगे। हमारा यह अनुभव रहा है कि जितनी बार टूट हुई हमको ज्यादा से ज्यादा प्रखर साथी मिले। टूटन अच्छी चीज नहीं होती पर नीतियों के लिए टूटन बुरी चीज भी नहीं है। मौजूदा टूटन के पीछे का कारण नीतियों का ही था। और जिन व्यक्तियों के संदर्भ में टूट हुई है उनकी नीतियों में काफी हद तक टकराव थे। और दोनों एक दूसरे को फंसाने के निमित्त इंतजार में थे। उनके मत में ये सरकार आज जिन नीतियों की सिर्फ घोषणाएं करती जा रही है उसके लिए उपयुक्त वातावरण बरसों से समाजवादी दल ने बनाया हैं। तब इसी सरकार ने हमारा माखौल उड़ाया या था कि जमीन है कहां, पैसा है कहां, पर सन 67 में नो प्रान्तो में चपत खाने के बाद कांग्रेस को अक्ल आई। उसकी अंतर्दृष्टि खुली। पर हम ऐसा भी नहीं चाहेंगे कि आंदोलन हम करें और लाभ कोई और उठायें। अगर ऐसा होता है तो उसको बुरा भी नहीं कहेंगे क्योंकि समाजवाद हमारा अपना है सिर्फ राजनीति नहीं है। 

        कार्यकर्ताओं की कसक के संदर्भ में उनका कहना था कि हर टूट के बाद कार्यकर्ताओं में नई चेतना आयी है। जैसे इस बार शिखर को इतना भारी भरकम ना बनाओ की वह शाखाओं को खा जाए। अब समाजवादी आंदोलन अपने क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन जाएगा। 

(दिनमान 2 जुलाई 1972)

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