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मीडिया का “घिनौना सच”: अंदर से दिखती तस्वीर

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(वीडियो संवाद: सोनल धैया से सुमित चौहान की बातचीत पर आधारित एक निबंधात्मक परिशोधन)

–      तेजपाल सिंह ‘तेज’

          लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है—एक ऐसा स्तंभ जो सत्ता और जनता के बीच सेतु का काम करता है, अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध पहरेदारी करता है, और समाज में विविधता व असमानताओं को उजागर कर बदलाव का मार्ग प्रशस्त करता है। परंतु जब यही स्तंभ स्वयं भीतर से दरकने लगे, जब इस पर बाज़ार, सत्ता और पहचान-आधारित भेदभाव की जकड़ मजबूत होने लगे, तब यह सवाल उठना लाजमी हो जाता है कि आखिर मीडिया जनता का प्रहरी है या किसी अजेंडे का औज़ार।

          मीडिया अक्सर बाहर से ग्लैमर, ताक़त और चमक-दमक की दुनिया प्रतीत होता है। चमकदार स्टूडियो, आकर्षक चेहरे और शोरगुल वाली बहसें लोगों को यह भरोसा दिलाती हैं कि देश की नब्ज़ यहाँ पकड़ी जा रही है। लेकिन इस चमक के पीछे कैसी अंधेरी सच्चाई है, उसे भीतर से देखने वाले पत्रकार ही बयान कर सकते हैं। इसी संदर्भ में सोनल धैया और सुमित चौहान का संवाद महत्वपूर्ण है। यह संवाद सिर्फ़ किसी एक पत्रकार के व्यक्तिगत अनुभव का बयान नहीं है, बल्कि पूरी मीडिया इंडस्ट्री के भीतर व्याप्त जातिगत, लैंगिक, और बाज़ार-आधारित विसंगतियों का प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

          इस लेख  का उद्देश्य इस संवाद को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना और उससे निकले गहरे प्रश्नों पर विचार करना है। यह प्रश्न न केवल मीडिया संस्थानों के लिए, बल्कि आम जनता के लिए भी उतने ही जरूरी हैं—क्योंकि मीडिया का स्वरूप तय करता है कि समाज किस दिशा में सोचेगा, बहस करेगा और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करेगा।

          यह लेख  उस बातचीत का परिष्कृत और व्यवस्थित रूप है जिसमें पत्रकार सोनल धैया ने टीवी/डिजिटल मीडिया की कार्य-संस्कृति,  बाज़ार दबाव, जाति-धर्म-जेंडर आधारित भेदभाव और पेशेवर नैतिकता के क्षरण पर अपने अनुभव साझा किए। नीचे प्रस्तुत   निष्कर्ष वक्ताओं के अनुभवआकलन और मत हैं—उन्हें “घोषित तथ्य” न मानकर मीडिया उद्योग की अंदरूनी कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

1) आदर्श बनाम वास्तविकतापत्रकार से उद्यमी तक

          सोनल के अनुसार कई पत्रकारों का शुरुआती आदर्श—“जनहित की निर्भीक पत्रकारिता”—समय के साथ टीआरपी/व्यूज़-केंद्रित संचालन में घुल जाता है। संपादकीय स्वतंत्रता सिमटती है, रचनात्मकता की जगह फॉर्मूले लेते हैं, और चुनावी मौसमों में एजेंडा-चालित कवरेज हावी होता है। इसी असंगति ने उन्हें मुख्यधारा टीवी छोड़कर द चबूतरा जैसे स्वतंत्र मंच की ओर बढ़ने का साहस दिया—जहां “पार्टी नहीं, जनता की बात” केंद्र में रखी जा सके।

2) ढांचागत भेदभाव: जातिधर्म और जेंडर:

बातचीत का सबसे तीखा पहलू पहचान-आधारित पक्षपात है—

·        जाति/धर्म: पहचान उजागर होते ही “तुम किस जाति/धर्म से हो” जैसी टिप्पणियाँ, सामाजिक दूरी, यहाँ तक कि साथ बैठने-खाने तक में अनकहा भेद—ये सब कमरे की हवा बदल देते हैं। वक्ताओं के मुताबिक यह सिर्फ व्यक्तिगत अभद्रता नहीं, बल्कि संस्थागत संस्कारों में घुसी प्रवृत्ति है, जहाँ “अपने लोगों” को आगे बढ़ाने का दबाव रहता है।

·        जेंडर: महिला होना एक ओर दृश्यता देता है, दूसरी ओर स्टीरियोटाइप थोपता है—कौन-सा शो “सॉफ्ट” है, कौन “हार्ड”; कौन “बहस” करेगा, कौन “लुक” के लिए रखा जाएगा। पुरुष एंकरों/रिपोर्टरों पर भी “एक खास किस्म के दिखने-बोलने” का दबाव बतौर उद्योग मानक बैठ चुका है।

          निष्कर्ष यह है कि मेरिट के ऊपर पहचान का पलड़ा अक्सर भारी पड़ता है—और यही विश्वसनीयता के क्षरण की जड़ है।

3) रूप-रंग की राजनीति: चेहरा”, “पोशाक” और स्क्रीन-फिट”:

          सोनल एक प्रसंग साझा करती हैं: “सुबह का शो—लोग ‘अच्छा’ देखना चाहते हैं; शॉर्ट्स पहनिए; थोड़ा ज्यादा तेज बोलिए।” युद्ध जैसे संवेदनशील विषय पर संयत भाषा के बजाय उत्तेजना माँगना उन्हें असंगत लगा। इसी कड़ी में—गोरे रंग, “खास” हेयरस्टाइलट्रेंडी” परिधान जैसी माँगें एंकर-रिपोर्टर की पात्रता का मानदंड बन जाती हैं। साड़ी पहनना “डीडी जैसा लुक”, लंबे बाल “कम प्रोफेशनल”, स्पोर्ट्स में साड़ी “मिसफिट”—ऐसी टिप्पणियाँ तय करती हैं कि किसे कौन-सा स्लॉट मिलेगा। यहाँ कंटेंट से पहले काया-काठी आ जाती है—जो सरोकार-केंद्रित पत्रकारिता के विरुद्ध है।

4) बाज़ार का शिकंजा: टीआरपीव्यूज़ और मार्केटिंग:

वक्ताओं के अनुसार न्यूज़रूम अब मल्टीनेशनल जैसे लक्ष्य-पुर्ज़ा मॉडल पर चल रहे हैं:

·        “व्यूज़ चाहिए—चाहे जैसे आएँ”;

·        “5–10 वीडियो रोज़”—गुणवत्ता से अधिक मात्रा;

·        मार्केटिंग की शर्तें संपादकीय पर हावी;

·        विवाद/ध्रुवीकरण से तात्कालिक ग्राफ़ चढ़ता है—इसलिए वही दोहराया जाता है।

          परिणामतः स्क्रीन पर हेट-बाइट्सशोर और नाटकीयता बढ़ती है, जबकि महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं।

5) कार्यस्थल संस्कृति और मानसिक स्वास्थ्य:

          चर्चा एक कम दिखाई देने वाले संकट पर भी रोशनी डालती है—मानसिक स्वास्थ्य

·        सख्त लक्ष्य, अपमानजनक व्यवहार, “ग़ुलाम-जैसा टोन”, “शो से पहले दस सिगरेट”—ये उदाहरण उस तनाव-संस्कृति की तरफ़ इशारा करते हैं जिसमें लोग काम करते हैं।

·        कोविड-19 काल में भी “लो-रेिटिंग्स” के नाम पर ऑफिस बुलाना जैसे प्रसंग सेफ़्टी बनाम रेटिंग की टकराहट दिखाते हैं।

          यह माहौल थकानअवसाद और बर्नआउट को जन्म देता है, जो अंततः कंटेंट की गुणवत्ता और सार्वजनिक भरोसे दोनों को क्षीण करता है।

6) ‘प्राइम-टाइम’ का विरोधाभास: दर्शक बनाम जिम्मेदारी:

एक सामान्य तर्क है—“लोग यही देखना चाहते हैं, हम वही दिखाते हैं।” बातचीत इसे आधा-सच मानती है– मीडिया केवल आईना नहीं, एजेंडा-निर्माता भी है। वह तय करता है कि किसे और कैसे दिखाया जाएगा। यदि चैनल लगातार विभाजनकारी बहसें परोसता है तो दर्शक का स्वाद भी उसी ओर ढलता है। इसीलिए, “रिमोट बदल दीजिए”—वक्ताओं का आग्रह है कि दर्शक सक्रिय संपादक बने; वहीं, मीडिया की भी यह अविचल जिम्मेदारी है कि वह लोकहितकारी कंटेंट को ‘अनकूल’ मानकर किनारे न करे।

7) भरोसे का संकट और द चबूतरा’ जैसी पहल:

          जैसे-जैसे विश्वसनीयता घटती है, वैकल्पिक/स्वतंत्र प्लेटफॉर्म उभरते हैं। द चबूतरा—गाँव के साझा चौपाल की तरह—लोगों के मुद्दों की सुनवाई का रूपक है: बिना शोर-शराबे, बिना सजावट के, जमीनी पत्रकारिता। ऐसे मंच संकेत देते हैं कि मीडिया साक्षरता बढ़ रही है; दर्शक/पाठक अब दावे-तथ्य का मिलान करने लगे हैं—यह आशा की किरण है।

8) सुधार के रास्ते: क्या किया जा सकता है:

(क) संपादकीय स्वतंत्रता की सुरक्षा—रेड-लाइनों, हित-संघर्ष, स्पॉन्सर्ड कंटेंट और राजनीतिक दबाव के स्पष्ट प्रकटीकरण।
(ख) विविधता और समावेशन—भर्ती, असाइनमेंट और ऑन-एयर अवसरों में जाति-धर्म-जेंडर-क्षेत्र की विविधता; जीरो-टॉलरेंस एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नीतियाँ।
(ग) कौशल-आधारित मूल्यांकन—“चेहरे/कपड़ों” से ऊपर रिपोर्टिंगरिसर्चभाषानैरेटिव-बिल्डिंग
(घ) मानसिक-स्वास्थ्य ढांचा—कार्य-घंटों की सीमा, काउंसलिंग, ब्रेक-नीतियाँ; ड्यूटी ऑफ़ केयर की संस्थागत जिम्मेदारी।
(ङ) गुणवत्ता-पहला एनालिटिक्स—शुद्ध व्यूज़ नहीं, एंगेजमेंट-क्वालिटीइम्पैक्टसुधारों को मीट्रिक बनाना; “कम, पर बेहतर” का प्रोत्साहन।
(च) संवेदनशील कवरेज प्रोटोकॉल—युद्ध/आपदा/हिंसा पर शोर नहीं, तथ्योंमानवीय गरिमा और संदर्भ को प्राथमिकता।
(छ) ओम्बड्सपर्सन/एथिक्स कमेटी—पब्लिक-फेसिंग सुधार-तंत्र, नियमित एडिटर्स नोट्स, त्रुटि-सुधार की दृश्यमान संस्कृति।
(ज) मीडिया-साक्षरता पहल—दर्शकों के लिए न्यूज़ को कैसे पढ़ें/परखें टूलकिट; स्कूल-कॉलेज साझेदारी।

          यह संवाद मीडिया-उद्योग की सिस्टम-लेवल चुनौतियों का आत्मकथ्य है—जहाँ पहचान आधारित पक्षपात, रूप-रंग की राजनीति, बाज़ार का दबाव और मानसिक-स्वास्थ्य संकट, सब मिलकर जनविश्वास को खोखला करते हैं। पर तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं: वैकल्पिक मंचबढ़ती मीडिया-साक्षरता और अंदर के ईमानदार पेशेवर अभी भी उम्मीद जगाते हैं।
मूल प्रश्न वही है जिससे यह लेख  शुरू हुआ: क्या हम कंटेंट से पहले कॉस्मेटिक्स चुनेंगेया सार्वजनिक हित को फिर से केंद्र में रखेंगेउत्तर, कुछ हद तक, न्यूज़रूमों में भी है और हमारे रिमोट/स्क्रीन-टैप (रिमोट” का हिंदी अनुवाद “दूरस्थ नियंत्रण” या “रिमोट कंट्रोल” हैऔर “स्क्रीन-टैप” (स्क्रीन पर टैप करना) का सीधा हिंदी अनुवाद “स्क्रीन पर टैप करना” हैजिसका अर्थ है स्क्रीन पर किसी चीज़ को छूना ) में भी—यही लोकतांत्रिक मीडिया-परिदृश्य का साझा उत्तरदायित्व है।

          मीडिया की दुनिया की यह पड़ताल हमें बताती है कि यह पेशा आज किस गहरे संकट से गुज़र रहा है। जातिगत और लैंगिक भेदभावरूप-रंग और पोशाक पर आधारित मूल्यांकनबाज़ार और जीआरपी का दबाव, तथा मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा—ये सब मिलकर पत्रकारिता की आत्मा को खोखला कर रहे हैं। ऐसे माहौल में ईमानदार और जुझारू पत्रकारों को या तो किनारे कर दिया जाता है, या वे स्वयं इस तंत्र से बाहर निकलकर स्वतंत्र मंच बनाने को विवश हो जाते हैं। फिर भी, आशा की किरण बाकी है। कुछ पत्रकार अब भी सच को केंद्र में रखकर अपने छोटे-छोटे मंच बना रहे हैं। दर्शकों में भी मीडिया-साक्षरता बढ़ रही है—लोग अब समझने लगे हैं कि जो दिख रहा है, वह हमेशा सच नहीं होता। यही प्रवृत्ति भविष्य में मीडिया को नया जीवन दे सकती है।

          अंततः, सवाल यह है कि हम किस तरह का मीडिया चाहते हैं? एक ऐसा मीडिया जो सत्ता और बाजार की कठपुतली बनकर समाज को विभाजित करे, या एक ऐसा मीडिया जो जनता की आवाज़ बने, लोकतंत्र को मज़बूत करे और विविधता को सम्मान दे? इसका उत्तर सिर्फ़ न्यूज़रूम में नहीं, बल्कि हर दर्शक, हर पाठक और हर नागरिक के हाथ में है। यदि हम ज़िम्मेदार दर्शक बनें, यदि पत्रकार अपने पेशे की नैतिकता को पुनः जीवित करें और यदि संस्थान अपने कर्मचारियों को एक न्यायपूर्ण व सुरक्षित माहौल दें—तो संभव है कि मीडिया अपनी खोई हुई विश्वसनीयता वापस पा सके। अन्यथा, यह “चौथा स्तंभ” धीरे-धीरे ध्वस्त होता जाएगा, और उसके मलबे में लोकतंत्र की आत्मा भी दब जाएगी।

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