अग्नि आलोक

*आज भी प्रासंगिक है नाटक “खाई”*

Share

अरूण डीके

हिंदी मराठी भाषाओं के नाटककार बाबा डिके आज ही के दिन १५ नवंबर १९९६ को हमसे हमेशा के लिए बिदा हो गए थे।

गॉंव का बेबस किसान और शहर की चमक दमक से आकर्षित होकर खेती छोड़ शहर भागते हुए(और अंत में निराश होते हुए)उसके बेटे के बीच के द्वंद्व की कहानी पर आधारित बाबा का सन १९६० में हिंदी (और मराठी में भी)लिखा नाटक खाई आज भी प्रासंगिक है।

१९६० में चंबल बांध के उद्घाटन पर आए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ कैलाशनाथ काटजु के आग्रह पर मात्र कुछ ही देर नाटक देखने पधारे थे लेकिन नाटक की प्रस्तुति देख पूरा समय उन्होंने खाई नाटक को तन्मयता से देखा।

भारत शासन ने खाई नाटक को देशभर में प्रस्तुति के लिए स्वीकृत किया और नाट्य भारती इंदौर ने बिहार छोड सभी हिंदी भाषी राज्यों में एक हज़ार से ज्यादा खाई नाटक का मंचन किया था।

  मुंबई में सन १९६६ में मराठी खाई (लोह परिसा लागेना) ने अखिल भारतीय मराठी नाट्य स्पर्धा में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था।

१५ अगस्त २०२३ को खाई नाटक का मालवी भाषा में (अदा समूह द्वारा)और २० अगस्त २०२३ को निमाडी भाषा में (अनवरत समूह द्वारा)इंदौर के माई मंगेशकर सभागृह में सफल मंचन हुआ।

बाबा की स्मृति को सादर नमन।

Exit mobile version