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भारत को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनाने का ढोल और फैक्ट्रियों में मजदूरों की और खेतों में किसानों की जानें जा रही हैं

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सुनील कुमार

भारत को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनाने का ढोल खूब पीटा जा रहा है। इस अर्थव्यवस्था को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनाने वाली मेहनतकश आबादी—खासकर मजदूर-किसान—कहाँ खड़े हैं, इसकी बात नहीं होती। ढोल की आवाज़ उस समय और करकश लगने लगती है, जब यह खबरें आती हैं कि फैक्ट्रियों में मजदूरों की और खेतों में किसानों की जानें जा रही हैं। मजदूरों के मरने की खबरें भी खबर नहीं बन पातीं; यह संज्ञान में तभी आता है, जब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है।

16 फरवरी को दो औद्योगिक इलाकों से बड़ी घटनाएँ सामने आईं। पहली घटना राजस्थान के भिवाड़ी में घटित हुई, जहाँ 7–8 मजदूरों के जलकर मरने; और शाम होते-होते हरियाणा के फरीदाबाद से खबर आई, जहाँ 40–50 मजदूरों के झुलसने की सूचना मिली। ये दोनों घटनाएँ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में घटित हुईं।

ये घटनाएँ उसी दिन हुईं, जिस दिन भारत को एक सुनहरा सपना दिखाने के लिए राष्ट्रीय राजधानी में एआई इम्पैक्ट समिट की शुरुआत हुई थी, जहाँ भारत के प्रधानमंत्री से लेकर दुनिया के दिग्गज लोग जुटे हुए थे। सुनहरे सपनों के ढोल की आवाज़ में इन मजदूरों की कराह दब गई। ‘श्रमेव जयते’ की बात करने वाले लोग श्रमिकों की मौत पर दुःख व्यक्त तो कर देते हैं, लेकिन लगातार हो रही दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कार्रवाई करते नज़र नहीं आते।

22 जनवरी, 2026 को छत्तीसगढ़ के बलौदा बाज़ार स्थित इस्पात प्लांट में 6 मजदूरों की मौत हो गई और 5 गम्भीर रूप से घायल हो गए। मरने वाले सभी मजदूर बिहार के गया जिले के रहने वाले थे। इन मजदूरों के शव इतनी बुरी तरह जल चुके थे कि उनकी पहचान करना मुश्किल हो गया।

16 फरवरी, 2026 को खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र के प्लॉट जी-1-118 बी में सुबह आग लगने से 7–8 मजदूर जलकर मर गए और 5 से अधिक घायल हो गए। ये मजदूर इतनी बुरी तरह जल गए कि उनकी हड्डियों को पॉलिथीन में पैक करना पड़ा। घायलों को दिल्ली के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। मरने वाले बिहार के मुजफ्फरपुर के निवासी थे।

16 फरवरी, 2026 को शाम 4:30 बजे फरीदाबाद के सेक्टर-24 इंडस्ट्रियल एरिया में शिव स्टील और कालका लुब्रिकेंट वर्कशॉप में भीषण आग लगने से 40 से अधिक मजदूर और 3–5 अग्निशमन कर्मचारी झुलस गए। इन्हें इलाज के लिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में लाया गया। 19 फरवरी तक इलाज के दौरान दो लोगों की मौत हो चुकी थी।

15 फरवरी, 2026 को कर्नाटक के मांड्या जिले के कर्केट्टे गाँव में एक केमिकल फैक्ट्री में विस्फोट होने से 2 मजदूरों की मौत हो गई और चार गंभीर रूप से घायल हो गए। ये सभी मजदूर बिहार के रहने वाले थे।

लगभग सभी औद्योगिक दुर्घटनाओं में बिहार के मजदूर शामिल रहे हैं। यही कारण है कि बिहार विधानसभा चुनाव में पलायन एक बड़ा मुद्दा रहा और सरकार ने घोषणा भी की कि वह बिहार में रोजगार उपलब्ध कराएगी, ताकि लोगों को बाहर न जाना पड़े।

समाचार पत्रों में देखें तो 2020 के बाद औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में दुर्घटनाएँ बढ़ी हैं, लेकिन सरकारी आँकड़ों में यह संख्या घटती दिखाई जाती है। 2012 से 2022 के बीच क्रमशः 1317, 1312, 1266, 1107, 1189, 1084, 1154, 1127, 1050, 988 और 1017 मजदूरों की मौत दर्ज की गई। इसी अवधि में घायलों की संख्या में जो गिरावट दिखाई जाती है, वह और भी संदिग्ध है। 2012 में जहाँ घायलों की संख्या 28,700 बताई गई थी, वहीं 2022 में इसे घटाकर सिर्फ 2714 दिखाया गया।

शासन-प्रशासन की लापरवाही

सरकार उद्योगों के ऑडिट का काम लगभग छोड़ चुकी है। पहले खून-पसीना निचोड़ लेने वाला मालिक अब हाड़-मांस को भी जला डाल रहा है। चार लेबर कोड में लेबर इंस्पेक्टर को ‘फेसिलिटेटर’ की संज्ञा दी गई है, जो कंपनी की अनुमति लेकर उसके बताए गए समय और तारीख पर ही फैक्ट्री में जा सकता है। यह एक तरह से मालिकों को खुलेआम छूट देने जैसा है।

इसका नतीजा हम भिवाड़ी अग्निकांड के रूप में देख सकते हैं। जिस फैक्ट्री में दुर्घटना हुई, वह गारमेंट ज़ोन था, जिसे कागज़ों में बंद दिखाकर गैरकानूनी रूप से पटाखा बनाने का काम किया जा रहा था। मजदूरों की जान जोखिम में डालकर मुख्य दरवाज़ा बंद कर काम कराया जाता था और मजदूरों के रहने की व्यवस्था भी अंदर ही की गई थी, जिसका खुलासा वहाँ मिले दो बोरी आलू से हुआ।

दमकल इंचार्ज राजू खान के मुताबिक, फैक्ट्री परिसर में गत्तों और बारूद का बड़ा स्टॉक था, जिससे कूलिंग ऑपरेशन में घंटों का समय लगा।

दिसंबर के आखिरी सप्ताह में भिवाड़ी जिले के कहरानी औद्योगिक क्षेत्र में 60 करोड़ रुपये की मादक दवा निर्माण की फैक्ट्री पकड़ी गई थी। तब भी स्थानीय पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए थे। इसके बाद प्रशासन ने 15 दिनों में टीम गठित कर सभी फैक्ट्रियों के अंदर चल रहे उत्पादन की जाँच कराने संबंधी बयान दिए थे।

लेकिन लगभग दो माह बाद उसी जिले में गैरकानूनी रूप से चल रही फैक्ट्री 8 मजदूरों की जान ले लेती है। 8 मजदूरों की जान जाने के बाद जब जाँच आगे बढ़ी, तो खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र में ही दो और पटाखा फैक्ट्रियाँ पकड़ी गईं।

भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र: एक नज़र में

भिवाड़ी एकमात्र ऐसा शहर है जिसे 1991 में जनगणना नगर के रूप में अधिसूचित किया गया था और 2001 में इसे तृतीय श्रेणी के अंतर्गत मान्यता दी गई। 1971 में भिवाड़ी एक छोटा-सा ग्रामीण इलाका था, जिसकी आबादी मात्र 1,624 थी। 1991 में जब भिवाड़ी को पहली बार जनगणना नगर घोषित किया गया, तब इसकी जनसंख्या 15,000 थी, जो 2001 में बढ़कर 33,877 हो गई। 2011 की जनगणना के अनुसार भिवाड़ी की कुल जनसंख्या 1,04,883 थी। वर्तमान में भिवाड़ी में करीब 3.5 लाख प्रवासी मजदूर हैं।

ग्रेटर भिवाड़ी मास्टर प्लान 2031 के अनुसार 15 लाख की जनसंख्या का अनुमान लगाया गया है। हम अनुमान लगा सकते हैं कि 40 वर्षों में किसी स्थान की जनसंख्या 15 हजार से बढ़कर 15 लाख हो जाने पर वहाँ की स्थिति क्या हो सकती है।

27 नवम्बर, 2024 को टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक खबर के अनुसार भिवाड़ी में 6,500 से अधिक पंजीकृत औद्योगिक इकाइयाँ हैं, जिनमें जापान, दक्षिण कोरिया और फ्रांस की दिग्गज विनिर्माण इकाइयाँ शामिल हैं। भिवाड़ी इंटीग्रेटेड इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (बीआईआईए) के अध्यक्ष रणविजय लांबा के अनुसार भिवाड़ी सालाना 17,000 करोड़ रुपये का राजस्व देता है।

2021 में स्विस कंपनी आईक्यूएयर ने भिवाड़ी को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर घोषित किया था। रुके हुए प्रदूषित औद्योगिक जल की दुर्गंध, कूड़े के ढेर और मुख्य सड़कों पर अतिक्रमण—राजस्थान के दूसरे सबसे बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में इसकी पहचान के साथ एक भयावह विरोधाभास पैदा करते हैं।

मालिकों की छूट, मजदूरों की लूट

भिवाड़ी में कंपनी स्थापित करने के लिए सरकार मालिकों को कई तरह की छूट देती है, जिनमें इनपुट टैक्स क्रेडिट, स्टाम्प शुल्क छूट, बिजली शुल्क छूट, निर्माताओं के लिए सब्सिडी और ब्याज सब्सिडी शामिल हैं। मालिक विस्तार करने के लिए बैंक से कर्ज लेते हैं, तो सरकार द्वारा दी जाने वाली ब्याज सब्सिडी का लाभ मिलता है। सरकार मालिकों के कर्ज पर ब्याज का एक हिस्सा चुकाती है।

इसके अलावा रोजगार सृजन सब्सिडी, निवेश प्रोत्साहन सब्सिडी और वस्त्र उद्योग वाले कारखानों को विशिष्ट क्षेत्रों में स्थापित करने पर विशेष छूट दी जाती है। यही कारण है कि गारमेंट ज़ोन में शासन-प्रशासन की मिलीभगत से पटाखा निर्माण का कार्य चल रहा था।

भिवाड़ी में वास्तविक रोजगार सृजन का काम नहीं हुआ है। इसी छूट का लाभ उठाने के लिए दिल्ली और आस-पास से बहुत-सी कंपनियाँ भिवाड़ी क्षेत्र में गई हैं। विभिन्न स्रोतों के अनुसार 1996 के बाद से दिल्ली से लाखों कंपनियाँ स्थानांतरित हुई हैं, जिनमें लगभग 10 हजार भिवाड़ी और उसके आस-पास के इलाकों में हैं। ये कंपनियाँ अपेक्षित रोजगार नहीं दे रही हैं, लेकिन इन्हें रोजगार सृजन के नाम पर सब्सिडी दी जा रही है।

राजस्थान सरकार ने मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन 8–10 हजार रुपये घोषित कर रखा है, जबकि दिल्ली में 18 से 22 हजार रुपये न्यूनतम वेतन है। मजदूरों की संख्या कई गुना बढ़ जाने के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य पर राजस्थान सरकार ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि मजदूरों को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए निजी स्कूलों में भेजना पड़ता है।

भिवाड़ी में 150 से अधिक निजी स्कूल खुल चुके हैं, जिनकी फीस 800 से 2000 रुपये तक है। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि मजदूरों को जलने पर भिवाड़ी से दिल्ली लाया गया।

औद्योगिक हादसा: सिस्टम की खामियों का पुलिंदा

भिवाड़ी, फरीदाबाद, कर्नाटक हो या राजधानी दिल्ली समेत भारत के अन्य स्थान—औद्योगिक हादसे केवल हादसे नहीं हैं। यह मजदूरों के शोषण की पराकाष्ठा है, जो पूंजीपतियों की तिजोरियाँ भरने का काम करती है। इसके बदले में मजदूरों को मिलती है असमय मौत, बीमारी और बेरोज़गारी। औद्योगिक हादसे सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार और सरकार की खामियों को उजागर करते हैं, जिसमें अवैध फैक्ट्रियाँ, प्रशासनिक लापरवाही और मजदूरों का शोषण शामिल हैं।

यह सवाल केवल भिवाड़ी का नहीं, पूरे देश का है। हर हादसे के बाद फौरी कार्रवाई की जाती है। राहत राशि घोषित होती है, मुआवज़ा बाँटा जाता है और जाँच के आदेश दिए जाते हैं। लेकिन असली दोषियों तक पहुँचने का साहस बहुत कम दिखाई देता है। जिन अधिकारियों की निगरानी में यह सब चलता रहा, जिनकी आँखों के सामने अवैध उत्पादन, मजदूरों का शोषण और सुरक्षा मानकों की धज्जियाँ उड़ती रहीं—उन पर कानूनी शिकंजा कब कसेगा?

केवल तबादला कोई सज़ा नहीं है; यह तो अपराध को ढकने का एक आसान रास्ता है। ट्वीट करके शोक संदेश देना और अगले हादसे का इंतज़ार करना मेहनतकश जनता के साथ घिनौना मज़ाक है।

ज़रूरत है कि मजदूरों को सही वेतन मिले, काम के दौरान सुरक्षा की गारंटी हो, मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा दी जाए और मजदूर-विरोधी लेबर कोड को हटाकर मजदूर हितैषी कानून लाए जाएँ। सरकार मजदूरों और मजदूर प्रतिनिधियों से संवाद कायम कर कानूनों को अमली जामा पहनाए। मजदूरों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य मुफ्त हों। मजदूरों को ताउम्र ईएसआई की सुविधा दी जाए।

अभी तक मजदूरों को रिटायरमेंट होने पर ईएसआई सुविधा समाप्त कर दी जाती है, जबकि उसी समय उन्हें मेडिकल सुविधाओं की अधिक आवश्यकता होती है। मजदूरों के साथ इस तरह के घिनौने कृत्यों को बंद किया जाए। सुनहरे सपनों के शोर में मजदूरों की कराह को दबाना बंद करें।

यह तब तक संभव नहीं होगा, जब तक देश की मेहनतकश जनता जाति-धर्म से ऊपर उठकर वर्ग के रूप में संगठित नहीं होगी। तभी उन्हें हाड़-मांस की जगह इंसान के रूप में देखा जाएगा। मजदूरों की ताबूत पर कब तक हम पूंजीपतियों की तिजोरियाँ भरते रहेंगे? मजदूरों की हड्डियाँ कब तक गिनते रहेंगे?

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