हिसाम सिद्दीकी
किसी जमाने में सियासतदां किसी भी कीमत पर अपने नजरियात (विचारधारा) से समझौता नहीं करते थे भले ही इसके लिए उन्हें बड़े से बड़ा नुक्सान ही क्यों न हो जाता हो। अब उल्टा हो गया है। असम्बली या लोक सभा की सीटें जीतने, राज्य सभा और विधान परिषद का मेम्बर बनने के लालच में लोग एक मिनट में अपने नजरियात से समझौता कर लेते हैं। समझौता भी ऐसा कि समाजवादियों को आरएसएस का बनने और आरएसएस के लोगों को समाजवादी बनने में भी कोई गुरेज नहीं होता वैसे तो नजरियात से समझौता करने का सिलसिला काफी पुराना है लेकिन 1989 में भारतीय जनता पार्टी और नाम निहाद सोशल जस्टिस वाली पार्टियों की बढी हुई सियासी हैसियत ने सबसे पहले नजरियात की ही कुर्बानी ले ली। हालात इतने बदतर हो गए कि अब पता ही नहीं चलता है कि कौन कब संघी हो जाएगा और कौन कब समाजवादी।
यहां हम एक वाक्ए का जिक्र करना चाहते हैं वह यह कि जब खालिस समाजवादी चन्द्रशेखर वजीर-ए-आजम बनें, उनके घर पर एक दावत थी। जिसमें बीजेपी के कद्दावर लीडर भैरों सिंह शेखावत भी शामिल थे। शेखावत किनारे खडे़ होकर चन्द्रशेखर जी के बेटे पंकज शेखर से कुछ बात कर रहे थे। चन्द्रशेखर जी की नजर पड़ी तो उन्होने दूर से आवाज देकर कहा ‘भैरों बाबू मेरा बेटा है, खालिस समाजवादी है कभी भी आपके साथ नहीं जा सकता, इसलिए वक्त खराब मत कीजिए। उन्हीं चन्द्रशेखर का दूसरा बेटा नीरज शेखर जो समाजवादी पार्टी का राज्य सभा मेम्बर था वह समाजवादी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गया। सिर्फ नीरज ही नहीं चन्द्रशेखर का भतीजा और उनके कई नजदीकी लोग भी बीजेपी में चले गए। इन लोगों को भारतीय जनता पार्टी में कुछ मिल भी नहीं रहा था, लेकिन वह रातों-रात समाजवादी से संघी हो गए। यही नहीं आरएसएस में पैदा हुए पले-बढे सियासतदां बने साबिक वजीर-ए-आला कल्याण सिंह का जब बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी से टकराव हुआ तो खालिस समाजवादी मुलायम सिंह यादव ने उन्हें अपनी पार्टी में ले लिया, उनके बेटे राजवीर सिंह और उनकी खातून दोस्त (महिला मित्र) कुसुम राय को कैबिनेट वजीर बना दिया।
अब तो नजरियात के सिलसिले में सूरतेहाल और भी बदतर हो गई है। उत्तर प्रदेश के असम्बली एलक्शन शुरू होने से पहले जिस तरह सियासतदानों ने अपनी वफादारियां तब्दील कीं वह तो पस्ती (पतन) की इंतेहा है। पैदाइशी समाजवादी और राज नारायण के पक्के शागिर्द रहे शतरूद्र प्रकाश अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में समाजवादी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। उनके इस कदम के बारे में कोई ख्वाब में भी नहीं सोच सकता था। शतरूद्र ने बनारस में जब अंजना प्रकाश से शादी की थी तो राज नारायण जैसे बड़े लीडर ने उनका कन्यादान किया था। अब शतरूद्ध संघी हो गए हैं। अभी वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के मेम्बर हैं। उनका टर्म इसी साल छः जुलाई को खत्म होगा। आखिर समाजवादी पार्टी में उन्हें ऐसी घुटन क्यों महसूस हुई कि वह समाजवादी छोड़कर आरएसएस में चले गए और उन्हें वहां क्या मिलेगा?
उत्तर प्रदेश के मौजूदा असम्बली एलक्शन के वक्त तो वफादारियां और नजरियात तब्दील करने का दौर-दौरा ही चल पड़ा। भारतीय जनता पार्टी के तीन कैबिनेट वजीरों समेत तकरीबन एक दर्जन मेम्बरान असम्बली पार्टी की आइडियालोजी छोड़कर समाजवादी पार्टी या आरएलडी में शामिल हो गए। वजारत और बीजेपी छोड़ने वालों में स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान के नाम ज्यादा अहम हैं। मौर्य, पहले बहुजन समाज पार्टी में थे, उनके नजरियात यह थे कि वह खुद को हिन्दू भी नहीं मानते थे फिर 2016 में वह अचानक भगवा हो गए। भगवा रंग में रंगते ही उन्होने समाजवादी पार्टी और अपनी पुरानी पार्टी बीएसपी के खिलाफ उसी तरह का जहर उगलना शुरू कर दिया जिस तरह का जहर आम बीजेपी वाले इन दोनों पार्टियों पर उगला करते थे। स्वामी प्रसाद मौर्य पर 2014 में देवी-देवताओं की तौहीन करने का भी मुकदमा दर्ज हुआ था जिसमें उनके खिलाफ वारण्ट भी जारी हो चुका है। बीजेपी में शामिल होने के बाद वह ऐसा तब्दील हुंए थे कि असम्बली में खड़े होकर उन्होने मुसलमानों को दहशतगर्द तक करार दे दिया था। अब वह आरएसएस और बीजेपी को न सिर्फ पानी पी-पीकर कोस रहे हैं बल्कि यह कह रहे हैं कि इन दोनों को वह उत्तरप्रदेश में पूरी तरह खत्म कर देंगे।
स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी वगैरह ने तो अपने नजरियात छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल होना मुनासिब समझा क्योकि उन्हें एलक्शन जीतना है और अगर सरकार बनी तो वजीर भी बनेंगे। लेकिन अखिलेश यादव ने अपने नजरियात ताक पर रख कर बीजेपी से निकलने वाले लोगों को अपने साथ क्यों ले लिया? असल सवाल यह है। नजरियात से समझौता तो अखिलेश ने भी किया है और इस हद तक किया है कि सहारनपुर में पच्छिमी उत्तर प्रदेश के बड़े मुस्लिम लीडर इमरान मसूद को धर्म सिंह सैनी के मुकाबले कहीं का नहीं छोड़ा, वजह यह है कि धर्म सिंह सैनी के बारे में बताया जाता है कि वह मुसलमानों से नफरत करते हैं इस हद तक कि इमरान मसूद हों या कोई दूसरा मुसलमान उसे वह सहारनपुर में सियासी एतबार से आगे बढता नहीं देख सकते। अखिलेश यादव और उनके साथ मिलकर एलक्शन लड़ने वाले आरएलडी चीफ जयंत चौधरी दोनों ने ही अपनी आइडियालोजी जैसे तब्दील सी कर दी है। इसीलिए तो मुस्लिम-यादव और मुस्लिम-जाट की ताकत पर एलक्शन जीतने की ख्वाहिश रखने वाले इन दोनों लोगों ने तैंतालीस (43) फीसद मुस्लिम आबादी वाले मुजफ्फरनगर जिले की एक भी सीट पर किसी मुसलमान को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया है। इस तरह सियासतदानों के जरिए अपने नजरियात को छोड़ना समाज और मुल्क दोनों के लिए खतरनाक है।
लेखक लखनऊ से प्रकाशित उर्दू साप्ताहिक जदीद मरकज के संपादक हैं

