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*एपस्टीन फाईल अपराधों का दस्तावेज़ नहीं , बल्कि वैश्विक मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब*

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राजीव राकेश

एपस्टीन से जुड़ी जाँच फाइलें केवल किसी एक व्यक्ति के अपराधों का दस्तावेज़ नहीं हैं, बल्कि वे उस वैश्विक मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब हैं, जिसमें सत्ता, धन और प्रभाव ने मनुष्यता को पीछे छोड़ दिया। यह तथ्य अपने आप में चिंताजनक है कि जिन नामों का उल्लेख इन फाइलों में आया है, वे अलग-अलग देशों, संस्कृतियों, रंगों, जातियों और धर्मों से आते हैं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या किसी एक समाज की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो स्वयं को नियमों से ऊपर मानने लगती है। जब किसी व्यक्ति के पास अत्यधिक शक्ति और साधन आ जाते हैं, तब उसके भीतर यह भ्रम जन्म लेने लगता है कि उसके लिए हर सीमा शिथिल है। यही भ्रम धीरे-धीरे संवेदनहीनता में बदल जाता है।

दूसरे मनुष्य को वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं, बल्कि अपने सुख का साधन समझने लगता है। नाबालिग बालिकाएँ, जिनका संरक्षण समाज का कर्तव्य है, ऐसे विकृत दृष्टिकोण में सबसे आसान शिकार बन जाती हैं, क्योंकि वे कमजोर होती हैं, निर्भर होती हैं और अक्सर अपनी पीड़ा व्यक्त करने में असमर्थ होती हैं।

आधुनिक समय की उपभोक्तावादी संस्कृति ने इस विकृति को और बढ़ाया है। जब जीवन का उद्देश्य केवल भोग, प्रदर्शन और सुख-साधनों का संग्रह बन जाता है, तब नैतिक विवेक धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। मनोरंजन उद्योग, डिजिटल प्लेटफॉर्म और दिखावटी जीवनशैली ने देह को वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे उम्र, मर्यादा और सहमति जैसी अवधारणाएँ गौण होती चली गईं। परिणामस्वरूप, कुछ लोगों के लिए अपराध भी एक ‘विशेष सुविधा’ जैसा बन गया।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब लगभग हर देश में कानून हैं, अंतरराष्ट्रीय संधियाँ हैं और मानवाधिकारों की घोषणाएँ हैं, तब भी ऐसे अवैधानिक कृत्य वर्षों तक कैसे चलते रहे। इसका उत्तर यही है कि कानून पुस्तकों में तो जीवित रहते हैं, लेकिन जब उन्हें लागू करने वाली संस्थाएँ प्रभाव, भय या स्वार्थ से ग्रस्त हो जाती हैं, तब न्याय निष्प्रभावी हो जाता है। जब अपराध करने वाले ही सत्ता और व्यवस्था के केंद्र में हों, तब सामान्य नागरिक के लिए न्याय पाना कठिन हो जाता है और प्रभावशाली लोगों के लिए हर दरवाज़ा अपने आप खुलता चला जाता है।

यहीं से समाज में दोहरी व्यवस्था जन्म लेती है—एक आम आदमी के लिए और दूसरी ताकतवर लोगों के लिए। जिन स्थानों तक सामान्य व्यक्ति की पहुँच असंभव होती है, वहाँ प्रभावशाली लोग सहजता से पहुँच जाते हैं। यही असमानता अपराध को जन्म देती है और उसे लंबे समय तक जीवित भी रखती है। इन परिस्थितियों से बचाव केवल कानून बनाने से नहीं होगा। इसके लिए समाज को कई स्तरों पर सजग होना पड़ेगा। सबसे पहले, परिवार और शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि उनकी देह, उनकी इच्छा और उनकी असहमति का महत्व क्या है। उन्हें बिना डर के ‘ना’ कहना सिखाया जाए और यह विश्वास दिलाया जाए कि सच बोलने पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा। दूसरे, समाज को प्रभाव और प्रसिद्धि से अंधा होना छोड़ना होगा। किसी व्यक्ति की सफलता, पद या लोकप्रियता उसे नैतिक जाँच से मुक्त नहीं कर सकती।

मीडिया, न्यायपालिका और नागरिक समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर न हो। तीसरे, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना अनिवार्य है। सत्ता में बैठे लोगों के कार्यों पर निरंतर निगरानी, स्वतंत्र जाँच और समयबद्ध न्याय ही ऐसे नेटवर्क को पनपने से रोक सकते हैं। चौथे, सांस्कृतिक स्तर पर यह पुनः स्थापित करना होगा कि संयम, मर्यादा और करुणा कमजोरी नहीं, बल्कि सभ्यता की पहचान हैं। जिन समाजों ने इन मूल्यों को जीवित रखा है, वे आज भी अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। एपस्टीन प्रकरण हमें यह याद दिलाता है कि नैतिक पतन अचानक नहीं होता, वह धीरे-धीरे तब होता है जब समाज छोटी-छोटी अनैतिकताओं को नज़रअंदाज़ करता रहता है।

यदि आज भी हमने समय रहते चेतना नहीं जगाई, तो नाम, स्थान और चेहरे बदलते रहेंगे, पर अपराध की प्रकृति बनी रहेगी। इसलिए यह केवल दूसरों की कहानी नहीं है, यह हम सभी के लिए आत्मपरीक्षा का अवसर है—कि हम किस प्रकार का समाज भविष्य की पीढ़ियों को सौंपना चाहते हैं। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है)

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