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आज्ञाचक्र का अस्तित्व औऱ शूक्ष्म शरीर का मेरा सफ़र

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 डॉ. विकास मानव

    _आज्ञाचक्र जब सक्रिय हो जाता है तो इससे चिजें दिखाई देने लगती है और यह हमारी दोनों आँखों के बीच में स्थित है इसलिए इसे तीसरी आंख कहते हैं।_

      हमारे मूलतः दो शरीर हैं, एक है स्थूल शरीर और दूसरा है शूक्ष्म शरीर। शूक्ष्म शरीर हमारे स्थूल शरीर के पीछे छुपा हुआ है। स्थूल शरीर दिखाई देता है जबकि शूक्ष्म शरीर दिखाई नहीं देता है। तीसरी आंख इसी शूक्ष्म शरीर का भाग है। 

हमारी दोनों आंखें स्थूल शरीर का हिस्सा है। ठोस हैं, भौतिक हैं। दिखाई देती हैं और हम इन्हें छू भी सकते हैं लेकिन तीसरी आंख हमारे सूक्ष्म शरीर का हिस्सा है, अभौतिक है, शूक्ष्म है इसलिए दिखाई नहीं देती है।

     तीसरी आंख हमारे दूसरे सूक्ष्म शरीर की आंख है जिससे वह देखने का काम करता है। हम सिर्फ दोनों आंखों के बीच में स्पर्श करके इसकी संवेदनशीलता को महसूस कर सकते हैं। 

    हमारे स्थूल शरीर की दोनों आंखों से हम बाहर के ज्ञात जगत को देखते हैं। इस तीसरी आंख से हम भीतर के अज्ञात जगत को देख सकते हैं। हमारे स्थूल शरीर से देखने के लिए हमारे पास दो आंखें हैं और हमारे दूसरे शूक्ष्म शरीर से देखने के लिए हमारे पास एक आंख है इसलिए भी इसे तीसरी आंख कहते हैं। 

तीसरी आंख सक्रिय होती है तो शूक्ष्म शरीर भी सक्रिय होने लगता है और यदि हम शूक्ष्म शरीर को सक्रिय करते हैं तो तीसरी आंख भी सक्रिय होने लगती है। दोनों बातें युगपत घटित होती है। यानि यह वैसा ही है जैसे हमारी आंखें खुल जाती है तो हमरा शरीर नींद से बाहर आ जाता है या कि हमारा शरीर नींद से बाहर आ जाता है तो हमारी आंखें खुल जाती है।

    शूक्ष्म शरीर हमारी पकड़ में नहीं आता है तो तीसरी आंख भी हमारी पकड़ में नहीं आती है, लेकिन आज्ञाचक्र हमारी पकड़ में आता है इसलिए शूक्ष्म शरीर को जगाने के लिए आज्ञाचक्र को जगाने वाली साधनाएं प्रयोग की जाती है।

     हमारी अधिकतम उर्जा दोनों आंखों द्वारा बाहर देखने में ही खर्च हो रही है। हम सुबह आंख खुलते ही देखना शुरू करते हैं जो रात सोते समय तक जारी रहता है। और रात सोने के बाद स्वप्न देखने लगते हैं । आज्ञाचक्र को जगाने के लिए हमारी दोनों आँखों की उर्जा को बाहर देखने से रोककर भीतर देखते हुए आज्ञाचक्र पर भेजना आवश्यक है।

*आज्ञाचक्र को देखना*

     यहां पर कुछ भी नहीं करना है। सिर्फ आज्ञाचक्र को देखना है। इसके लिए दोनों आंखों को बंद करके दोनों आंखों के बीच में आज्ञाचक्र को देखना शुरू करना है। आज्ञाचक्र पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही वहां दोनों आंखें गड़ाकर देखना है। दोनों आंखों को भीतर बीच में आज्ञाचक्र पर ठहरा देना है।

      आंखें बंद करके भीतर से दोनों आंखों के बीच में देखना है। यानि कि पलकें बंद करने के बाद भीतर से दोनों आंखें आज्ञाचक्र को देख रही हों! 

     हमारी आंखों से उर्जा बाहर देखने में सतत बह रही है। इस उर्जा को हमें भीतर मोड़ देना है। जब बाहर देखने की जरूरत नहीं होती है तब आंखों को बंद करके आज्ञाचक्र को देखना शुरू कर देते हैं। 

     ज्यों ही हम दोनों आंखों को बंद करके, दोनों आंखों के द्वारा , दोनों आंखों के बीच में स्थित आज्ञाचक्र को देखते हैं तो हमरी दोनों आंखों की बाहर देखने वाली उर्जा आज्ञाचक्र की ओर बहने लगती है। और आज्ञाचक्र उर्जा के प्रति बहुत ही संवेदनशील है इसलिए वह भी आंखों की उर्जा को अपनी ओर खींचने लगता है और धीरे-धीरे हमारी दोनों आंखें आज्ञाचक्र में ठहरने लगती है और उनकी देखने की उर्जा आज्ञाचक्र में प्रवेश करने लगती है। 

आंखों के आज्ञाचक्र में ठहरते ही हमारे विचार भी ठहर जाते हैं और हम निर्विचार होने लगते हैं। विचारों के साथ ही हमारी आंखें भी गतिमान रहती है। जैसे क्रोध का विचार आता है तो आंखें भी क्रोध से तन जाती उनमें खून उतरने लगता है। यही कारण है कि आंखों और विचारों में एक अंतर्संबंध निर्मित हो जाता है और दोनों एक साथ गतिमान रहते हैं।

     यदि एक की गति रोक दी जाए तो दूसरा भी रूक जाता है। यदि हम आंखों को गति करने से रोक देते हैं। आंखों को आज्ञाचक्र पर ठहरा देते हैं तो हमारे विचार भी ठहर जाते हैं। और इसके उलट यदि हम विचारों को ठहरा देते हैं तो हमारी आंखें भी ठहर जाती है। तभी तो ध्यानी की आंखें ठहरी हुई होती है क्योंकि भीतर उनके विचार ठहर गये होते हैं। 

      यहां पर हम दोनों आंखों को आज्ञाचक्र पर ठहरा रहे हैं ताकि हमारे विचार भी ठहर जाए। आंखों के ठहरते ही विचार भी ठहर जाते हैं और हम सिर्फ देखने वाले होते हैं। हम अपने को आज्ञाचक्र को देखते हुए पाते हैं, हम अपने को आज्ञाचक्र के साथ ही अपनी श्वास का, दिल की धड़कन का, अपने शरीर की हर क्रिया का साक्षी हुआ पाते हैं और अचानक हम अपने शरीर के प्रति बोध से भर जाते हैं। 

जब भी हम आंखें बंद करके भीतर आज्ञाचक्र को देखेंगे तो हमारी दोनों आँखें आज्ञाचक्र पर ठहर जाएंगी और हम निर्विचार होकर देखने वाले हो जाएंगे, साक्षी हो जाएंगे और हमारी बाहर देखने वाली ऊर्जा भीतर आज्ञाचक्र में प्रवेश करने लगेगी। 

     अपने शरीर के साक्षी होते ही हमें अपने स्थूल शरीर से दूरी महसूस होने लगती है। स्पष्ट अनुभव में आएगा कि शरीर अलग खड़ा है और हम शरीर से अलग खड़े हैं। शरीर से अलग हम शूक्ष्म शरीर में आ खड़े होते हैं। हमें शूक्ष्म शरीर की अनुभूति होने लगती है और हम अचानक अपने आप को शूक्ष्म शरीर में खड़ा हुआ पाते हैं। एक बार शूक्ष्म शरीर अनुभव में आ जाता है फिर तो हम साक्षी होते ही उसमें प्रवेश करते चले जाते हैं।

    एक बार शूक्ष्म शरीर में प्रवेश करने के बाद आज्ञाचक्र पर देखने की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, क्योंकि अब ज्यों-ज्यों शूक्ष्म शरीर का अनुभव बढता जाएगा त्यों-त्यों आज्ञाचक्र भी सक्रिय होता चला जाएगा।

    अब हम साक्षी होते हैं। अपना शरीर हमें अपने से दूर दिखाई देता है और हम अपने को शूक्ष्म शरीर के तल पर खड़ा हुआ पाते हैं। 

     यह एक दिन की बात नहीं है। बहुत धैर्य की आवश्यकता होगी। बरसों साधना होगा। सतत प्रयास और गहन संकल्प की जरूरत होगी।

     शरीर शुद्धि के उपाय, व्यायाम, प्राणायाम और रेचन होता रहे तो साधक को आज्ञाचक्र में प्रवेश करने में सात वर्ष लगते हैं और यदि सघन प्यास और त्वरा से प्रयोग जारी रखते हैं तो थोड़े समय में ही आज्ञाचक्र सक्रिय होने लगता है और हमारा शूक्ष्म शरीर में प्रवेश होता चला जाता है। 

*सूक्ष्म शरीर की मेरी यात्रा का विचित्र अनुभव :*

     एक दिन अवसर देख, संकोचभरे स्वर में मैंने एक प्रेरक से कहा–बाबा ! आप सन्त हैं, महात्मा हैं और योगी भी हैं–इसमें संदेह नहीं। जिन सिद्धियों की चर्चा आपने की है, उनका अनुभव तो आपको होगा ही। क्या किसी सिद्धि का दर्शन-लाभ मुझे भी हो सकता है ? अभी तक तो मैंने बस इन सबके बारे में केवल पढा और सुना है, देखा कुछ भी नहीं है… क्या….

     मेरा वाक्य पूरा भी नही हो पाया था कि बाबा बीच में ही बोल पड़े–पहले तू यह बतला कि तू सिद्धि देखना चाहता है कि उसका अनुभव करना चाहता है ?

     पता नहीं कैसे मेरे मुंह से अपने आप निकल गया– अनुभव करना चाहता हूँ बाबा !

     ठीक है मैं तुझे ऐसा अनुभव कराता हूँ जिससे तू एक बहुत बड़े सत्य से परिचित हो जाएगा–इतना कहकर बाबा ने मुझसे अपनी आंखों की ओर अपलक निहारने को कहा। मैंने वैसा ही किया। चित्त को एकाग्र कर स्थिर दृष्टि से अपलक देखने लगा मैं बाबा की आंखों की ओर।

      कुछ देर तो कुछ नहीं हुआ, लेकिन बाद में सिर भारी होने लगा। दोनों कनपटियां जलने लगीं। चाह कर भी पलक झपका नहीं पा रहा था मैं। धीरे-धीरे मुझ पर एक विचित्र-सी तन्द्रा छाने लगी और उसी के साथ चेतनाशून्य भी होने लगा मैं। 

     क्या उसे चेतनाशून्य स्थिति कहा जायेगा ? 

     नहीं, भीतर से सजग और चैतन्य था और उसी अवस्था में अपने-आप में हल्कापन अनुभव करने लगा मैं। हल्केपन का वह काफी विचित्र अनुभव था। फिर कब और कैसे मैं अपने पार्थिव शरीर से अलग हो गया–पता नहीं चला मुझे।

     मेरा शरीर बाबा के सामने पद्मासन की मुद्रा में निर्विकार भाव से बैठा था। निर्लिप्त भाव से काफी देर तक देखता रहा मैं उसकी ओर फिर तभी मुझे पास ही कहीं रोने-चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। मैं उधर ही चल पड़ा। शायद कोई मर गया था–समझते देर न लगी मुझे। मुहल्ले में एक अधेड़ उम्र के सज्जन रहते थे। नाम था उनका–बटुक शास्त्री।

     शास्त्रीजी से मैं परिचित था। काफी लंबे अरसे से बीमार थे वह। आंगन में शव रखा था। एकाएक मेरी नज़र घूम गयी। चौंक पड़ा मैं एकबारगी। अपने शव के निकट बटुक शास्त्री खड़े थे चुपचाप। उनके चेहरे पर आश्चर्य और कौतूहल का भाव था। मैं उनके पास चला गया। मुझे देखकर शास्त्री जी बोले–भाई ! यह सब क्या है ?–मेरी समझ में नहीं आ रहा है। ये सब लोग मुझे मरा हुआ समझ रहे हैं, जबकि मैं जीवित हूँ।

       मैंने कहा–शास्त्री जी आपका कहना ठीक है। आप अपने लिए जीवित हैं, लेकिन इन लोगों के लिए तो क्या पूरी दुनियां के लिए आप मर चुके हैं।

     क्या इसी को मरना कहते हैं ?–शास्त्रीजी थोड़ा विषण्ण भाव से बोले।

     जी हाँ–मैंने कहा–अपने लिए जीवित रहना और संसार के लिए मर जाना ही मृत्यु है।

     तो क्या तुम भी मर गए हो ?–शास्त्रीजी ने मेरी ओर प्रश्नवाची दृष्टि से देखते हुए पूछा।

     नहीं, मरा तो नहीं हूँ, मगर मरे हुए के समान ही समझें।

     शवयात्रा शुरू हुई। मैं भी शामिल हुआ शवयात्रा में। शास्त्रीजी भी मेरे साथ थे। बड़ी ही विचित्र और आश्चर्य की बात थी। जिसकी शवयात्रा थी, वह मेरे साथ था और अपनी ही शवयात्रा में शामिल था।

   दूसरी विचित्र और आश्चर्य की बात यह थी कि मैं सभी को देख रहा था लेकिन मुझे कोई नहीं देख पा रहा था, सिवाय शास्त्रीजी के। सभी के लिए हम दोनों अदृश्य प्राणी थे।

     हरिश्चन्द्र घाट (वाराणसी) का महाश्मशान ! एक साथ कई लाशें जल रही थीं धू-धू करके। काफी भीड़ थी वहां। लाशों के साथ आये हुए लोगों की भीड़ तो थी ही, इसके अतिरिक्त, एक और भीड़ थी हम जैसे अदृश्य प्राणियों की।

    शास्त्रीजी मूक दर्शक बने देख रहे थे सब कुछ। उनका चेहरा विषण्ण हो रहा था। मैंने उनसे धीरे से कहा–आइए, चलिए, कालीघाट की सीढ़ियों पर बैठें। शास्त्रीजी दुःखी स्वर में बोले–अब मेरा क्या होगा ?

     जो होगा, उसे ईश्वर की अनुकम्पा समझकर आपको स्वीकार करना होगा। अपने पार्थिव शरीर के जलकर भस्म हो जाने के बाद शास्त्रीजी अपने आप में हल्केपन के साथ-साथ परम शांति का अनुभव करने लगे थे, बोले–मेरे मन में अब किसी भी प्रकार का लोभ-मोह, माया-आकर्षण नहीं रह गया है। अब मेरे लिए देश-समाज, संसार, घर-परिवार का कोई मूल्य, महत्व नहीं रह गया है। मैं इस समय जिस स्वतंत्रता का अनुभव कर रहा हूँ, वह भौतिक जीवन मे कहाँ रखी ? मैं अभी तक बहुत भ्रम में था। सोचता था कि मरने के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है। जीवन जैसा कुछ भी नहीं रहता। अब तक मैं जिसे जीवन समझता था–वह एक प्रबल बन्धन और घुटन के सिवाय और कुछ नहीं था। वास्तविक जीवन तो यह है जो मुझे अब उपलब्ध हुआ है। कितना आकर्षक, कितना मोहक, कितना उपयोगी है–इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। व्यर्थ ही लोग मृत्यु से भय खाते हैं।

प्रश्न–1–

 पार्थिव शरीर छूट जाने या जल जाने के बाद क्या प्राणी का देखना, सुनना, बोलना, अनुभव करना सम्भव है ? यदि सम्भव है तो कैसे ? इसके पीछे का रहस्य क्या है ?

उत्तर–

सम्भव है। इसका कारण यह है देखना, सुनना, बोलना और अनुभव करना प्राणी का कार्य है, न कि पार्थिव शरीर का। पार्थिव शरीर में सूक्ष्म इन्द्रियों के स्थूल रूप हैं, उनके सूक्ष्म रूप तो सूक्ष्मशरीर में विद्यमान हैं। मरने के बाद प्राणी का पार्थिव जगत ही छूटता है और वह दूसरे सूक्ष्म (चतुर्थ) आयाम के अस्तित्व उपस्थित रहता है।

प्रश्न–2–

 पार्थिव जगत में विचार के आदान-प्रदान के लिए वाणी का स्थूल रूप (बैखरी वाणी) तो होती नहीं, तो विचारों का आदान-प्रदान कैसे होता है ?

उत्तर–

दूसरे सूक्ष्म लोक में चतुर्थ आयाम में विचारों के आदान-प्रदान के लिए बैखरी वाणी और स्थूल शब्दों की कोई सत्ता नहीं है। वहां चतुर्थ आयाम में आंतरिक संवाद द्वारा ही सब कुछ सम्भव है और इन्द्रियों की सूक्ष्म सत्ता से स्वतः ही सम्भव हो जाता है। यहां तक कि उसे किसी भी वस्तु का अभाव नहीं रहता।

     मैं भी मृत्यु-भय का अनुभव कर रहा था। हमारा स्थूल शरीर स्वयं एक बहुत बड़ी बाधा है। जैसे ही वह छूटता है, हमारा सूक्ष्म शरीर पहले से कई गुना अधिक गतिमान और सक्रिय हो उठता है। स्वयं इस बात का अनुभव कर रहा था मैं। मेरे लिए कोई पार्थिव वस्तु बाधक नहीं थी। मेरी गति तीव्र हो गयी थी।

     क्षणमात्र में पच्चीसों मील की यात्रा कर सकने में समर्थ था उस समय। लोगों के मन की बात तत्काल जान लेना मेरे लिए सरल था। मैंने एक बात का अनुभव किया कि लोग जैसे बाहर दिखलाई पड़ते थे, वैसे भीतर से नहीं हैं। बाहर कुछ और, भीतर कुछ और। जो परिचित लोग मर गए थे, उन्हें मैं जीवितों की तरह इधर-उधर भटकते हुये देख रहा था।

      पहली बार मेरी समझ में आया कि वे लोग जिन्हें हम मरा हुआ समझ लेते हैं, वे वास्तव में हमारे आसपास ही कहीं होते हैं। मृत बन्धु और स्वजन कुछ दिनों के लिए हमारी स्थूल दृष्टि से ओझल मात्र हो जाते हैं और हम व्यर्थ ही उनके लिए रोते हैं जबकि वे हमें देखते हैं और हमारे रुदन-क्रंदन पर आश्चर्यचकित होते हैं।

     वे यह नहीं जानते कि उन लोगों से उनका कोई अब भौतिक सम्बन्ध नहीं रह गया है। जितना मैंने पढा और सुना था, उसके अनुसार मैं समझता था कि सूक्ष्म जगत कहीं अंतरिक्ष में होगा। मगर यह भ्रम निकला मेरा। सूक्ष्म जगत वास्तव में पृथ्वी के बाहर कहीं नहीं, बल्कि हमारे चारों तरफ ही फैला हुआ है।

      सूक्ष्म जगत में प्रवेश करने पर व्यक्ति को लगता ही नहीं कि वह मृत हो गया है। वह उसी तरह देखता है, सुनता है, अपनी वस्तुओं को देखता है और अपने मित्रों और सम्बन्धियों की बातचीत सुनता है, समझता है और आश्चर्य करता है कि लोग उसके नाम पर क्यों रो रहे हैं, उसके लिए क्यों दुःखी हो रहे हैं। धीरे-धीरे वह उन बातों को समझता है जिससे उसे आभास होता है कि कुछ असामान्य घट गया है।

उदाहरण के लिए वह पाता है कि कमरे में रखे हुए सामान उसके लिए बाधा नहीं बन पा रहे हैं और वह उनके आर-पार देख सकता है, आसानी से आ-जा भी सकता है। वह पहले से अधिक हल्कापन अनुभव करने लगता है। उसे लगता है कि वह पलक झपकते ही जहां चाहे वहाँ पहुँच सकता है।

     मैंने यह भी जाना कि स्वर्ग-नर्क की धारणाएं व्यर्थ,  भ्रामक तथा मनगढंत हैं। मृत्यु के पश्चात हमारे कर्म और विचार ही हमारे साथ रहते हैं और हम उन्हीं के अनुसार सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। कोई अन्य शक्ति या स्वर्ग-नर्क हमें सुख-दुःख नहीं देते।

     हमने जो कुछ किया,

जो कुछ कहा और जो कुछ सोचा–बस, वही हमारे सामने आता है। वास्तव में धरती पर अपने जीवनकाल में ही मनुष्य अपनी उस मृत्यु-शैया का निर्माण स्वयं कर लेता है जिस पर उसे अंततः लेटना होता है।

   सूक्ष्मलोक के अपने अल्पप्रवास में मैंने यह भी जाना कि इस लोक में मनुष्य की विद्या, बुद्धि तथा विचार और अवधारणाएं पृथ्वी की तरह ही होती हैं, बल्कि पढ़ने-लिखने और सोचने-समझने की शक्ति कई गुना अधिक बढ़ जाती है। अगर वह पढ़ना चाहे तो सूक्ष्मलोक में वह बहुत कुछ और  सरलता से और शीघ्रता से पढ़-समझ सकता है बल्कि जो इस योग्य हैं, उन्हें वहां बहुत कुछ पढ़ाया-लिखाया भी जा सकता है।

   (शेष अगली बार)

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