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लगातार संदिग्ध होती जा रही है चुनावों की निष्पक्षता और पवित्रता

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लिबरल डेमोक्रेसी का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव होते हैँ।इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि गहराते जा रहे संदेह के साये को जल्द से जल्द हटाया जाए। वरना, एक जीवंत लोकतंत्र के रूप में भारत की साख क्षीण होने लगेगी। विपक्षी राजनीतिक दलों में इस सवाल पर जिस तेजी से असंतोष बढ़ रहा है, उसे देखते हुए वह दिन बहुत दूर नहीं है, जब उनमें से कुछ की तरफ से चुनावों के दौरान अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक बुलाने की मांग की जाने लगेगी। इसलिए समय रहते इस मसले की गंभीरता को समझना और सुधार के उपाय करना अनिवार्य हो गया है।

सत्येंद्र रंजन

चुनावों की निष्पक्षता और पवित्रता पर जितने गंभीर प्रश्न अब उठ रहे हैं, वैसा आजाद भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ। चर्चा सोशल मीडिया से फैलते हुए अब राजनेताओं और विशेषज्ञों तक पहुंच चुकी है। सिर्फ हाल के महीनों की घटनाओं पर गौर करें-

उपरोक्त मुद्दे सीधे तौर पर चुनाव की निष्पक्षता एवं पवित्रता से जुड़े हुए हैं। जबकि कुछ अन्य स्थितियां ऐसी बनी हैं, जिनकी वजह से यह धारणा मजबूत होती चली गई है कि अब भारत में चुनावी मुकाबले का धरातल सबके लिए समान नहीं रह गया है। यह मैदान कुछ ऐसा बन गया है, जिसमें सत्ताधारी भाजपा हमेशा ही फायदे में रहती है। यह धारणा इन कारणों से बनी है–

ये तमाम आरोप सही हैं या नहीं, इस बारे में यह स्तंभकार यहां कोई राय नहीं व्यक्त नहीं कर रहा है। इस बारे में अंदाजा लगाने का कोई जरिया हमारे पास नहीं है कि उपरोक्त बताए गए कारणों से हाल के वर्षों में चुनाव परिणाम सचमुच प्रभावित हुए हैँ या नहीं। ईवीएम में सचमुच हेरफेर हुई है या नहीं, इस बारे में भी कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है- यानी तमाम कही गई बातें संदेह हैं। उन्हें अधिक से अधिक आरोप ही माना जा सकता है।

लेकिन अब जो परिस्थितियां बनी हैं, उनके बीच असल मुद्दा यह नहीं रह गया है कि चुनावों में सचमुच हेरफेर हो रही है या नहीं। मुद्दा यह है कि भारत में चुनाव परिणामों को लेकर अनेक हित-धारकों (stakeholders) के मन में अविश्वास पैदा हो गया है।

अगर वर्तमान सरकार के कर्ताधर्ता ईमानदारी से आत्म-निरीक्षण करें, तो संभवतः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि यह स्थिति पैदा करने की जिम्मेदारी काफी हद तक उन पर जाती है। साथ ही अनेक संवैधानिक संस्थाओं और यहां तक कि न्यायपालिका के कर्ताधर्ता भी अगर अपनी संस्थाओं की भूमिका पर ध्यान दें, तो वे भी ऐसे ही निष्कर्ष पर पहुंचेंगे।

इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि गहराते जा रहे संदेह के साये को जल्द से जल्द हटाया जाए। वरना, एक जीवंत लोकतंत्र के रूप में भारत की साख क्षीण होने लगेगी। विपक्षी राजनीतिक दलों में इस सवाल पर जिस तेजी से असंतोष बढ़ रहा है, उसे देखते हुए वह दिन बहुत दूर नहीं है, जब उनमें से कुछ की तरफ से चुनावों के दौरान अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक बुलाने की मांग की जाने लगेगी। इसलिए समय रहते इस मसले की गंभीरता को समझना और सुधार के उपाय करना अनिवार्य हो गया है।

यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि लिबरल डेमोक्रेसी का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव होते हैँ। राज्य की शक्तियों का पृथक्करण (separation or division of powers), स्वतंत्र न्यायपालिका, अवरोध एवं संतुलन (check and balance) सुनिश्चित करने वाली संवैधानिक संस्थाएं, आजाद प्रेस और पहरेदार की भूमिका निभाने वाले सिविल सोसायटी के संगठन लिबरल डेमोक्रेसी के अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इनमें से सभी पहलुओं की अपेक्षित भूमिका हाल के वर्षों में संदिग्ध होती गई है। आरोप है कि कुछ मामलों में ऐसे प्रतिकूल हालात बना दिए गए हैं, जिनकी वजह से उपरोक्त कुछ पहलू आज कारगर नजर नहीं आते।

इसी बीच विपक्षी नेताओं, जागरूक सामाजिक कार्यकर्ताओं, और प्रेस कर्मियों पर केंद्रीय एजेंसियों की तेज होती गई संदिग्ध कार्रवाई ने राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की जमीन को और भी प्रतिकूल बना दिया है।

इन गंभीर हालात के बीच अगर चुनाव परिणामों की भी साख नहीं रही, तो देश में ऐसे गतिरोध की हालत बन सकती है, जिससे संवैधानिक व्यवस्था में लोगों का यकीन चूकने लगे। चुनाव नतीजों में संदेह अनेक देशों में सामाजिक अशांति का कारण बन चुका है। लोकतंत्र तभी स्वस्थ बना रहता है, जब चुनाव परिणाम को सभी हित-धारक सहजता से स्वीकार लें।

चुनाव प्रक्रिया विश्वसनीय बनी रहती है, तो उस हाल में पराजित दल यह मानकर उसे बिना किसी हिचक के नतीजे को स्वीकार कर लेते हैं कि इस बार वे मतदाताओं का पर्याप्त समर्थन जुटाने में विफल रहे। उसके बाद वे अगले चुनाव के लिए समर्थन जुटाने में लग जाते हैं।

जबकि अगर उन्हें यह महसूस हो कि उन्होंने पर्याप्त समर्थन जुटाया था, लेकिन अनुचित ढंग से उन्हें जीत से वंचित कर दिया गया, तो फिर अनेक देशों में ऐसी परिस्थितियां आई हैं, जब संबंधित दल या नेता ने चुनान परिणाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इस हाल में पूरी राजनीतिक व्यवस्था की वैधता (legitimacy) ही संदिग्ध होने लगती है।

भारत अभी ऐसे मुकाम पर नहीं पहुंचा है। लेकिन सार्वजनिक चर्चा जो रूप ले रही है, उसमें ऐसी आशंका को सिरे से ठुकराया नहीं जा सकता। इसलिए यह सही वक्त है, जब चुनावों को विश्वसनीय बनाए रखने की पहल पूरी गंभीरता से की जाए। इसके लिए शुरुआती तौर पर निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते है–

न्याय के सिलसिले में अक्सर यह कहा जाता है कि इंसाफ ना सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। यानी इंसाफ इस ढंग होना चाहिए कि संबंधित पक्षों को यह महसूस हो कि न्यायालय ने सभी साक्ष्यों की रोशनी में बिना किसी राग-द्वेष और पूर्वाग्रह या पक्षपात के अपना फैसला दिया है। तब पराजित पक्ष यह मानकर निर्णय को स्वीकार कर लेता है कि सबूत उसके पक्ष में नहीं थे और उसकी दलीले दमदार नहीं थीं।

यही बात चुनाव पर भी लागू होती है। चुनाव ना सिर्फ स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से होना चाहिए, बल्कि उसके आयोजन में ऐसी पारदर्शिता जरूरी है, जिससे उसकी निष्पक्षता में सभी पक्षों का भरोसा बरकरार रहे।

अभी भी मुमकिन है कि चुनावों का आयोजन स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से होता हो- लेकिन हकीकत यह है कि राजनीतिक एवं सामाजिक दायरे में इनकी निष्पक्षता लगातार संदिग्ध होती जा रही है। इसीलिए इसके पहले कि ऐसी धारणाओं को तोड़ना नामुमकिन हो जाए, स्थितियों में पर्याप्त सुधार एक अपरिहार्य जरूरत बन गई है।

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