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फासिज्म की वैचारिकी की महीन परतों को समझना पड़ेगा

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विश्वनाथ डोभाल

अगर मैं कहूँ की एक वोटर छात्र जो यूक्रेन से बच के किसी तरह भारत पहुंचा , और तीसरे चरण में यूपी में बीजेपी को वोट डाल आया तो क्या आप भरोसा करेंगे ??
क्या आप भरोसा करेंगे की हालिया कोरोना संकट में मेडिकल सुविधा के अभाव में जिसने अपने बाप भाई को खोया वो भी बीजेपी को वोट डाल के आ गया होगा।
अगर मैं कहूँ की दिन रात बीजेपी की बुराई करने वाले , कोसने वाले , गन्ने और फसल के उचित मूल्य ना पाने वालों में से भी कुछ इन्हे वोट डाल आये हैं तो आप भरोसा करेंगे ?
अगर मैं कहूँ की रेलवे भर्ती परीक्षा और संविदा पर रहे शिक्षा कर्मी सरकार के डंडे खाकर और अपनी नौकरी खोकर भी कई लोग इन्हे वापिस से वोट डाल आये होंगे ? तो क्या आप यकीन करेंगे

अगर आप भरोसा नहीं कर पा रहें हैं तो आपको फासिज्म की वैचारिकी की महीन परतों को समझना पड़ेगा।

और इस उद्दाहरण को देने के लिए अग्रिम माफ़ी चाहूंगा –
लेकिन ये फासिज्म द्वारा पैदा की गयी कुंठा ऐसी है जैसे कोई अपने घर में किसी करीबी की मौत के अंतिम संस्कार में बैठा हो और उसी समय कोई सेक्स करने का ऑफर दे तो वो ऑफर स्वीकार कर लेगा।
उसे अपनी परेशानी से ज्यादा अपने अंदर भरी उस कुंठा को स्खलित करने में ज्यादा मज़ा आने लगता है।
ये एक गहन कुंठा होती है।
एक अजीब सी बेचैनी – की जैसे अभी किसी इंसान ने सरकार की नीतियों के कारण अपनी जॉब खोयी हो और वो जाकर फिर उसी को वोट डाल आये।

सिर्फ और सिर्फ इसलिए की उसे सरकार द्वारा बताये और खुद की धार्मिक नफरत के फलस्वररूप यकीन हो चला है की उसकी परेशानी की जड़ एक धर्म विशेष के लोग हैं।
इसी कारण वो हमेशा आर्थिक सामाजिक परेशानियों के बीच भी उन चीजों को खोजता रहता है जिससे उसकी अंदर दबी कुंठा का स्खलन होता रहे।
इसीलिए फासिस्ट सत्ता उसे ऐसा माहौल तैयार करके देती है जिसमे रोज उसे लिंचिंग की , उन लोगों को दबाने मारने की , उन लोगों को टाइट करते रहने की ख़बरें आती रहें।
इससे इंसान को रोज रोज उसकी कुंठा को बाहर निकालने चरमोत्कर्ष पाने में अजीब सा आनंद आने लगता है। लगभग एक अफीम के नशे जैसा।
ये आज की नहीं पिछली कई सदियों की कुंठा है जिसे भुनाया जा रहा है।

ये इनके पिछले नब्भे साल की मेहनत का नतीजा है जो ये अपने हर विरोधी को देशद्रोही साबित कर देतें हैं। और आपको रोज नए काल्पनिक दुश्मन देतें रहतें हैं।
पांच किलो राशन , आदि मात्र सामयिक मुद्दे हैं। ऐसे और इस जैसे बड़े बड़े दावे तो अखिलेश , प्रियंका ने भी किये थे।
लेकिन इस हद्द तक बर्बादी होने के बावज़ूद इनकी प्रचंड जीत के पीछे असली विचार वही है जो आप सोच रहें हैं।
परपीड़ा आनंद के नशे की लत लग चुके समाज को नब्भे साल से उनके अंदर भरी गयी साम्प्रदायिक कुंठा को बाहर निकालने वला माहौल जो जनता को मिला है ,,उसे ये जनता खोना नहीं चाहती।
ये वोट पड़ने , चुनाव जीतने से कहीं आगे की सामाजिक और सांस्कृतिक मनोविज्ञान का दर्शन है।
इसके कोई जोड़ घटा या कोई पक्का सिद्धांत नहीं हैं की कब ख़तम होगा।

समाज कभी कभी अपने आप अपने नियमों से संचालित होता है।
इसलिए किसी भी चुनावबाज पार्टियों से अगर आप इनके हारने की उम्मीद लगाते है तो ये बिलकुल अनसाइंटिफिक तरीका है समाज बदलने का।
पूंजीवादी दलाल पार्टियों में से किसी एक को जीता कर यदि आप फासिज्म के हारने की कल्पना करतें हैं तो आप गलत हैं।
इसलिए सही लाइन पकड़िये।
ये लड़ाई बीजेपी कांग्रेस या सपा की नहीं है।
ये लड़ाई सत्ता और जनता के बीच है …… और होनी चाहिए।
सत्ता में कोई भी हो सकता है। और किसी के पास हिंदुत्व तो किसी के पास कोई जातिवादी कार्ड होगा।
जिसका कार्ड मजबूत होगा वो जीत जाएगा।

इसलिए ऐसे पूंजीवादी समाज में सत्ता परिवर्तन मात्र एक सेफिटवाल्व चेंज से ज्यादा कुछ नहीं होता।
असली संघर्ष से नाता जोड़ो।
सत्ता की डायनेमिक्स को समझो और बिना किसी पार्टी का भक्त बने हर जनविरोधी फैसले का विरोध करो।

थैंक्स,

तू कि ना-वाक़िफ़-ए-ग़ुलामी ए-अदब है अभी

रक़्स (नृत्य )ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है।

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