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परंपरा की औपचारिकता खंडित नहीं चाहिए?

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

पितृपक्ष के दौरान पुरखों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा का निर्वाह किया गया।
अब नवरात्रि में नवदुर्गाओं की पूजा,आराधना का निर्वाह किया जाएगा।
निर्वाह करना मतलब किसी परंपरा को जारी रखना।परंपरा को निभाना।निर्वाह से तात्पर्य है,औपचारिकता पूर्ण करना।औपचारिकता शब्द का जहाँ भी प्रयोग होता है,वहाँ श्रद्धा लुप्त हो जाती है।
नवरात्रि उत्सव का महत्व धार्मिक रूप से कम हो रहा है।सामाजिक और राजनैतिक रूप से बढ़ रहा है।
नवरात्रि का महत्व राजनीति के कारण लंबी चुनरी की ओट में छिप गया है।चुनरी यात्रा के प्रायोजक,राजनेता द्वारा निर्मित चुनरी की जितनी लंबाई होती है, प्रायोजक राजनेता की उतनी ही लंबी उपलब्धियों को दर्शाने का प्रयास किया जाता है?
नवरात्रि के दौरान नो दिनों तक धार्मिक उत्सव का उत्साह चरम पर होता है।नवरात्रि के बाद सामाजिक संगठनों का राजनीति के साथ समन्वय स्थापित होकर दशहरा मनाने की परंपरा का निर्वाह किया जाता।
देश के लगभग हर शहर में असंख्य रावणों के पुतलों का दहन किया जाता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि, रावण के पुतलों का निर्माण बुराई के प्रतीक के रूप में किया जाता है।
प्रत्येक सार्वजनिक जगह पर रावण के पुतले की बनावट में थोड़ी बहुत भिन्नता होती है।लेकिन रावण के पुतलों की ऊँचाई में प्रतिस्पर्धा होती है?
एक ओर बुराई के प्रतीक के रूप में रावण के पुतलों का निर्माण करतें हैं, दूसरी ओर पुतले की ऊँचाई में प्रतिस्पर्धा करतें हैं।बुराई के प्रतीक की ऊँचाई में प्रतिस्पर्धा करना भी बहुत उलझन भरे सवालो पैदा करती है?
बहुत से सार्वजनिक स्थानों पर रावण के पुतले का निमार्ण कर उसे किसी तकनीक के द्वारा या मानवीय श्रम से चलायमान बनाया जाता है।इस क्रिया को स्वचलित रावण कहा जाता है।
स्वचलित रावण का निर्माण करना भी कंफ्यूज़न पैदा करता है?


कितना भी कंफ्यूज़न हो परंपरा का निर्वाह करने की औपचारिकता खंडित नहीं होनी चाहिए।
रावण के पुतले के दहन के पूर्व किसी कर्मठ कार्यकर्ता द्वारा कर्कश और डरावनी आवाज में दुस्साह से भरी हँसी ही ही हा हा आ …हा आ आ आ…..,निकालने की परंपरा भी दर्शकों में कौतूहल पैदा करती है।
आवाज निकलना भी एक परंपरा बन गई है।आवाज निकालने की परंपरा की औपचारिकता भी निरंतर निभाई जा रही है।
उक्त सारी परंपरा अंतहीन है।
जबतक सूरज चांद रहेगा,रावण के पुतलों का बुराई के रूप में दहन होते रहेगा।
बुराई के प्रतीक पुतलों की ऊँचाई में प्रतिस्पर्धा भी होती रहेगी।

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