पवन कुमार ‘ज्योतिषाचार्य
कर्मवृक्ष का फल भाग्य है। बिना पके फल गिरता नहीं। बिना गिरे खाने को मिलता नहीं। खाने के लिये लोग उतावले रहते हैं। कच्चे फल को तोड़ा जाता नहीं। प्रतीक्षा करना सब की बाध्यता है।
देवता राक्षस मनुष्य, ये तीन गुण हैं। देवों को अपना भाग्य जानना शक्य नहीं। मनुष्य अपना भाग्य कैसे जान सकता है ?
नृपस्य मनोरथं चित्तं कृपणस्य वित्तं मनोरथं दुर्जनमानवानाम् ।
स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः?
राजा के चित्त की गति, कृपण मनुष्य के धन, दुर्जनों के मनोरथ, स्त्रियों के चरित्र, पुरुष के भाग्य को देवता नहीं जानते। इसे मनुष्य कैसे जाने ?
भगवान् शंकर का भाग्य देखिये। इनके श्वसुर पर्वतराज हिमालय हैं, मित्र यक्षपति कुबेर हैं, पुत्र गणेश जी हैं। ऐसे शिव को भिक्षा के लिये जाना पड़ता है। ईश्वर की व्यवस्था कितनी बली है।
स्वयं महेशः श्वसुरो नगेश, सखा धनेश, तनयो गणेशः।
तथापि भिक्षाऽटनमेव शम्भो बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा ||
संसार भाग्य की डोरी से बँधा है। सब के भाग्य की डोर अलग-अलग लम्बाई की है। यह डोर न तनती है, न सिकुड़ती है, न कटती है। इस डोर से आबद्ध मैं भाग्य पर लेखनी चला रहा हूँ।
सुन्दर दृश्य से आँखें तृप्त हों।
सुस्वादु रस से जिह्वा तुष्ट हो।
संगीत की तरंगे कर्ण कुहरों में प्रवेश करती रहें।
सुगन्धमयता नासिका के रन्धों में विद्यमान हो।
स्पर्श सुख की अनुभूति श्रृंगार एवं वात्सल्य के रूप में चुम्बन के रूप में ओष्ठों को मिलती रहे।
भरा पूरा कुटुम्ब हो (संतति विस्तार)। स्थायी धन सम्पत्ति एवं कोप हो।
सहवास सुख/उपस्पजन्य आनन्द मिलता हो। इसके लिये स्त्री को सुन्दर पति एवं पुरुष को सुन्दरी भार्या मिले।लोक में ये आठ सुख हैं। इन अष्टसुखों के द्वारा जातक मृत्यु अपमान के घूंट पीता हुआ जीता। है। प्रथम सात सुखों का सम्बन्ध द्वितीय भाव से है, अन्तिम आठवें सुख का सम्बन्ध सप्तम भाव से है।
भाव २ = आँख, जिला, कान, नासिका, ओष्ठ, कुटुम्ब, धन भाव ७ = उपस्थ। भाग्य भवन = भाव ९= सर्वसुख।
【गणित की दृष्टि से ९ = २ + ७।】
【अर्थात् नवम स्थान = द्वितीय स्थान + सप्तम स्थान।】
वा, भाग्य = (आँख कान नाक ओष्ठ जिह्वा संतति सम्पत्ति का सुख) + सम्भोग सुख।
वा भाग्य = भोज + भोगः।
भाग्य का विचार करते समय केवल नवम तक ही सीमित नहीं रहना है। इसके लिये द्वितीय एवं सप्तम भाव का भी विचार करना आवश्यक है। क्योंकिए = २+७।
वा, गुरु = शुक्र, (९ = गुरु, २ = शुक्र, ७ = शुक्र)।
उक्त श्लोक का अर्थ :
कुण्डली में गुरु और शुक्र की स्थिति भी देखना है। गुरु भीतरी सुख का कारक है, जबकि शुक्र बाह्य सुख का। बाह्य सुखों का भाव है-द्वितीय तथा सप्तम अन्तर्सुख का भाव है-नवम। इन दोनों सुखों में कोई भेद नहीं है।
द्वितीय भाव के सुख…
. सुन्दर आँखें हों तथा सुन्दर एवं प्रिय का दर्शन होता रहे।
. सक्रिय कानों को प्रियवाणी सुनने को मिलती रहे।
सुन्दर नासिका हो तथा प्रिय गन्ध सूंघने को मिलती रहे।
. सुन्दर ओष्ठ हों तथा इन्हें चुम्बन का सुख प्राप्त होवे।
जातक अकेला न हो कर परिवार वाला हो। वह किसी का पिता हो, पुत्र हो, पति हो, पितामह हो।
धन सम्पदा से युक्त हो।
नित्य स्वादिष्ट भोजन मिले। जिह्वा को षड्स प्रिय हो।
सप्तम भाव के सुख.
जातक में भोग भोगने की शक्ति हो तथा उसे भोग उपलब्ध होता रहे। जिहा जैसी लोलुपता उपस्थेन्द्रिय में होती है। रसना से रस लेते लेते तथा उपस्थेन्द्रिय से मैथुन करते-करते जातक अपना सर्वनाश कर लेता है। देखने में यह भाग्य है, पर वस्तुतः यह उसका दुर्भाग्य है। जननेन्द्रिय अशक्त हो जाती है। किन्तु रसेन्द्रिय अन्त तक लार टपकाती रहती है। यही इन दोनों में अन्तर है।
【संख्या २ = जिहा।
संख्या ७ = जननेन्द्रिय।
संख्या २ + संख्या ७ = संख्या ९
अतएव, ९ जिह्वा + जननेन्द्रिय
वा, भाग्य = पड्सों का स्वाद + बहु स्लियों का भोग।】
सतत स्त्री समूह से घिरा हुआ तथा नित्य नये सुस्वादु भोजन का रस लेने वाला भाग्यशाली होता है। सामान्य व्यक्ति के लिये यह सम्भव नहीं। राजा / भूपति/ शासकों के लिये यह सुलभ है। इसलिये वे भाग्यवान् हैं। २ = जिह्वा एवं ७ = जननेन्द्रिय में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। दोनों लोलुप हैं। भोजन से जीभ तृप्त होती नहीं। भोग से जननेन्द्रिय तुष्ट होती नहीं। भोजन पाकर एक से लार टपकती है। स्त्री प्राप्त कर दूसरे से शुक्र टपकाता है। ये दोनों अंग अस्थिहीन हैं। इनकी तृप्ति एवं तुष्टि के पीछे नरक का सौन्दर्य है। स्वाद एवं शुक्र पर जय प्राप्त होने पर आनन्द ही आनन्द है। यह अव्यक्त है, अनुभवगम्य है। अवस्था ढलने पर जननेन्द्रिय शिथिल एवं अशक्त हो जाती है किन्तु स्वादेन्द्रिय मृत्युपर्यन्त गतिशील एवं सशक्त रहती है।
वयसिगते कः कामविकारः ?
(शंकराचार्य)
भोज एवं भोग की वासना अजर-अमर होती है। इस पर जय पाना कालसापेक्ष एवं कठिन है। एक सरल मार्ग है। भोज में भगवान् का भजन होता रहे तथा भोग में भी भगवान् का स्मरण होता रहे तो कल्याण होता है। जिससे ऐसा हो, वह भाग्यवान् है। ऐसा मैं करता हूँ। अपनी करनी को कथनी का रूप दे रहा हूँ। मेरी करनी एवं कथनी में कोई अन्तर नहीं है। यह भगवत्कृपा से सम्भव है।
संख्या २ और ७ को भाग्य के सम्बन्ध में विशेष महता है। संख्या २ पहले आती है, संख्या ७ बाद में इसलिये प्रथम स्थान २ = जिह्रा का तथा द्वितीय स्थान ७ = उपस्थ का है। २ और ७ के अंक से दो संख्याएँ बनती हैं-२७ एवं ७२। विराट पुरुष की कुण्डली से स्पष्ट है कि पुरुष २७ एवं ७२ वर्ष के बीच में सन्तति एवं सम्पत्ति का अर्जन करे-रसेन्द्रिय एवं जननेन्द्रिय को सीचे। इसके पहले एवं बाद पूर्ण । २७ में अर्थात् २७ से पूर्व एवं ७२ वर्ष के पश्चात् सन्तति एवं सम्पति के चक्कर में न रहे। यह अवधि जातक के लिये अधिकतम है। अर्थत् उसे ७२-२७ = ४५ वर्ष का समय इस हेतु है। संख्याएं २७, ७२ एवं ४५ पूर्ण हैं। क्योंकि, २७ = २+७ = ९;७२ = ७+२= ९ ;४५ = ४ + ५ = ९= से पहले का समय जीवन समर की सिद्धि हेतु तैयारी में तथा ७२ से बाद का समय मृत्यु पर विजय प्राप्ति करने की तैयारी में लगाना चाहिये। स्त्री जातक के लिये पुरुष का तृतीयांश कम कर ग्रहण करना चाहिये।
अर्थात् २७ x २/३=१८ वर्ष से पहले स्त्री जीवन संग्राम की तैयारी करें और १८ पूर्ण होने पर भोज एवं भोग के क्षेत्र में विवाह करके उतरे। ७२ X२/३ = ४८ । स्त्री को चाहिये कि वह ४८ वर्ष तक भोग भोगती रहे, सन्तान एवं सम्पत्ति का संचय करे। संख्या ४८ अपूर्ण है इसलिये स्त्री कभी तृप्त एवं दुष्ट नहीं होती। है यह सत्य है। (४८ = ४+८ = १२= १+२=३= अपूर्ण) भगवच्चिन्तन के बिना पूर्णता सम्भव नहीं। जो नारी ४८ के बाद भगवान् में रहे, वह भाग्यवन्ती है। १८ x ३ = ५४ |
स्त्री को पूर्ण होने में ५४ वर्ष की समय सीमा निर्धारित है। ५ + ४ = ९ = पूर्ण। इस समय तक स्त्री मासिक धर्म से पूर्णतः निवृत्त हो जाती है और सन्तानोत्पत्ति के सर्वथा अयोग्य होती है।
पुरुष के भाग्य की सीमा ७२ वर्ष तथा स्त्री के भाग्य की सीमा ५४ वर्ष है। ७२ वर्ष के बाद पुरुष का भाग्य उसके पुत्र, पौत्र वा शिष्यों से जुड़ जाता है। स्त्री का भाग्य ५४ वर्ष के बाद उसकी बेटी, पुत्रवधू वा सेविका से बँध जाता है। ७२ वर्ष का होते-होते पुरुष का भाग्य मर जाता है। ५४ वर्ष की होते होते स्त्री का भाग्य उसका शत्रु हो जाता है। कैसे ?
भाग्यांक = ९ ।
मृत्यु का अंक = ८ |
शत्रु का अंक=६।
【भाग्यांक x मृत्यु-अंक : = ९ x ८ = ७२ वर्ष तक पुरुष भाग्य।】
【भाग्यांक x शत्रु-अंक = ९ x ६ = ५४ वर्ष तक स्त्री भाग्य।】
भाग्य का कथन करते समय इस सत्य की उपेक्षा करने से फल खट्टा हो जाता है।
शरीर के माप से पुरुष के भाग्य का विचार किया जाता है। आजानुभुज पुरुष भाग्यवन्त होता है। महापुरुष आजानुभुज होते हैं। जिसकी भुजाएँ लटकती हुई उसके घुटनों को जुए वह आजानुभुज होता है।
देह दीर्घत्व से भाग्याभाग्य का निर्णय करने के लिये सर्व प्रथम नखसिख पर्यन्त उसकी लम्बाई नापना चाहिये। इसके बाद दोनों भुजाओं को प्रसार कर उसकी लम्बाई नपना चाहिये। सामान्य मनुष्य का दैहिक अंग विस्तार (लम्बाई, चौड़ाई) समान होता है। असामान्य पुरुष के अंग विस्तार में असमानता होती है।
ऐसा व्यक्तिया तो भाग्यशाली होती है या भाग्यहीन यहाँ तीन सूत्र है :
१. देह की क्षेतिज माप वा चौड़ाई = देह की ऊर्ध्वाधर माप वा लम्बाई ।
२. देह की क्षैतिज माप अधिक >देह की ऊर्ध्वाधर माप से।
३. देह की क्षैतिज माप अल्प < देह की ऊर्ध्वाधर माप से ।
सूत्र १ से जातक का भाग्य सामान्य है। शुभाशुभ युक्त। सूत्र २ से जातक का भाग्य बहुत अच्छा है। शुभ का आधिक्य। सूत्र ३ से जातक का भाग्य अति निकृष्ट है. अशुभ का आधिक्य।
ये सूत्र सर्वत्र अनुभूत एवं सत्य की अभिव्यक्ति करने वाले हैं।

