मुनेश त्यागी
भारत सरकार की केंद्रीय एजेंसी आयकर विभाग द्वारा बीबीसी दफ्तरों पर आयकर के छापों को लेकर देश विदेश में हलचल मच गयी है। इस सर्वे यानी छापों को लेकर सियासी संग्राम छिड़ गया है। विपक्ष ने जहां सरकार को घेरा है और इस छापे की कार्यवाही को केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करना बताया है, वही केंद्र ने कहा कि जांच एजेंसियों पर सवाल उठाना सही नहीं है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। सूत्रों के अनुसार आयकर अधिकारियों के अलग-अलग दल बीबीसी के दिल्ली और मुंबई कार्यालय पर छापे मार रहे हैं।
अचानक हुए इस सर्वे पर एडिटर्स गिल्ड ने आफ इंडिया ने चिंता जताई है। गिल्ड ने अपने बयान में कहा है कि ऐसी जांच में संवेदनशीलता बरती जानी चाहिए। कांग्रेस ने सरकार की इस कार्यवाही को प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर करने की कोशिश बताया है और कहा है कि यह सब आलोचनात्मक आवाजों को दबाने की कोशिश है। आम आदमी पार्टी ने कहा है कि सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है, वह विपक्ष और मीडिया पर दबाव बना रही है और वह लोकतंत्र पर प्रहार कर रही है। महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया है कि आयकर सर्वे के पीछे सरकार की सोची-समझी रणनीति काम कर रही है।
सर्वे को लेकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, नेशनल कांग्रेस और शिवसेना उध्दव ठाकरे ने भी केंद्र को घेरने की कोशिश की है। नीतीश कुमार ने कहा है कि जनता को एकजुट होकर इसके खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए।
वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है की सरकार बीबीसी के खिलाफ बदले की भावना से काम कर रही है और यह सारी की सारी डरावने वाली गतिविधियां और कार्यवाहियां हैं। सरकार द्वारा यह सब किया जाना एकदम खतरनाक है और बदले की भावना से किया जा रहा है। सरकार अडानी के मामले पर ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमिटी बनाकर जांच करने को तैयार नहीं है, मगर अब उसने प्रेस और मीडिया को डराने वाली यह नई नीति अख्तियार कर ली है।
मीडिया की अंतरराष्ट्रीय और घरेलू संस्थाओं ने सरकार की इन कार्रवाइयों को डराने वाली टैक्टिक्स बताया है जिस कारण जनतंत्र को लेकर देश की छबि पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इस प्रकार के छापे बीबीसी द्वारा दो भागों में बनाई गई विवादित डॉक्यूमेंट्री को लेकर यह बदले की कार्रवाई की जा रही है। न्यू यार्क की प्रोटेक्ट जनरनलिस्ट कमेटी ने भारत सरकार से पत्रकारों को परेशान करने वाली कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की है और कहा है कि सरकार की ये गतिविधियां दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी पर एक धब्बा है और यह बदले की कार्रवाई है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आईटी विभाग की कार्यवाही को विरोध की आवाज को दबाने वाली बताया है। भारत के एडिटर एडिटर्स गिल्ड ने और प्रेस क्लब ने भी सरकार की इन गतिविधियों को डराने वाली बतलाया है और कहा है कि यह कार्रवाई संवैधानिक जनतंत्र को निचले स्तर पर ले जाने वाली है।
सरकार की गतिविधियों से यह साफ हो गया है जो मीडिया संस्थाएं सरकार की नीतियों का विरोध कर रही है, ये छापेमारी की कार्यवाहियां उनको परेशान करने वाली हैं और इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अगर निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो बीबीसी पर की गई सरकार की यह कार्यवाही आजाद प्रेस पर एक भयंकर हमला है और इन हमलों से अधिनायकवादी और फासीवादी निजाम की झलक आती है। यह प्रेस की आजादी का गला घोटने का एक बहुत बड़ा कदम है।
सरकार आलोचना की आवाज का गला दबाकर खत्म करना चाहती है। दुनिया की कोई भी सरकार, अगर मीडिया और विपक्षी पार्टियों पर हमला करेगी, तो दुनिया का कोई भी जनतंत्र जिंदा नहीं रह सकता। सरकार की गतिविधियों से स्पष्ट है कि हमारे देश में घोषित आपातकाल लागू हो गया है। यह स्थापित करता है कि मोदी सरकार हकीकत, सच्चाई और आलोचनाओं से डर गई है और वह प्रेस और मीडिया को डराने धमकाने पर उतर आई है।
सरकार की ये प्रेस विरोधी गतिविधियां तानाशाही की ऊंचाइयां प्राप्त कर चुकी हैं। भारत के प्रधानमंत्री मोदी, “भारत को जनतंत्र की माता” कहते हैं, मगर सरकार का यह कैसा खेल है कि जनतंत्र की मां भारत में आलोचना और सच दिखाने का गला घोट रही है, मीडिया और पत्रकारों को डराने पर उतर आई है। वह आलोचना बर्दाश्त करना नही चाहती और लोगों की बात सुनने को तैयार नहीं है ।
सरकार की इन गतिविधियों से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार भारत में कार्य कर रहे मीडिया संस्थानों का गला घोट कर, आलोचना के अधिकार की हत्या करना चाहती है। सरकार की गतिविधियों से देश विदेश में भारत के जनतंत्र की और भारत की सरकार की छवि बहुत धूमिल हो रही है। विपक्षी पार्टियों और देशी-विदेशी मीडिया संस्थानों की आलोचना को देखते हुए, सरकार को मीडिया पर हो रहे इन हमलों को तुरंत बंद कर देना चाहिए और भारत में आलोचना की आजादी का गला घोटने से बाज आना चाहिए, केवल तभी भारत में संवैधानिक जनतंत्र और मीडिया की आजादी की हिफाजत की जा सकेगी और केवल उस स्थिति में ही भारत में एक आजाद मीडिया फल फूल सकेगा।

