भोपाल। (आरएनएस)। मध्यप्रदेश में आंगनबाडिय़ों के माध्यम से महिला बाल विकास के द्वारा राज्य की गर्भवती महिलाओं और नन्हें मुन्ने बच्चों को बांटे जाने वाले पोषण आहार सत्ताधीशों और नौकरशाहों की ठेकेदारों की सांठगांठ के चलते प्रदेश की पोषण आहार व्यवस्था उनके चंगुल से मुक्त नहीं हो पा रही है हालांकि ठेकेदारों के चंगुल में फंसे इस पोषण आहार को मुक्त कराने के लिये प्रदेश में वर्षों से लंबी बहस चली आ रही है एक समय तो ऐसा भी आया था कि कांग्रेस स्वर्गीय जमुना देवी तब नेता प्रतिपक्ष थीं तो इसी मुद्दे को विधानसभा तक में उठाया था, जिसको लेकर सभी दलों के विधायकों ने अपनी-अपनी राय व्यक्त की थी
उस बहस को सुनकर कुछ क्षण के लिये तो लगा था कि शायद सरकार अब पोषण आहार के माफिया इन ठेकेदारों से इसे मुक्ति दिलाकर ही दम लेगी, लेकिन बहस के चलते-चलते एक समय ऐसा आया था कि पूरा माहौल बदल गया और आखिरकार सदन के सदस्यों की आम राय होने के बावजूद भी सरकार पोषण आहार के इन माफियाओं से इसको मुक्ति नहीं दिला पाई हालांकि इस बहस के बाद जो खबरें सुर्खियों में रही थीं उनमें यह बात खुलकर सामने आई थी कि पोषण आहार के इस माफियाओं की मिलीभगत सरकार और नौकरशाही से तो जगजाहिर है लेकिन लगता है कि लोकतंत्र का मंदिर विधानसभा पर भी प्रभाव नजर आता है
वर्तमान में महिला बाल विकास की कमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास है लेकिन लाख चाहते हुए भी वह पोषण आहार माफिया के चंगुल से इसे मुक्त नहीं करा पाए बल्कि लॉकडाउन के दौरान इसी पोषण आहार को लेकर जो खेल पूरे प्रदेश में खेला गया उसकी भी अजब-गजब दास्तान है, जहां नन्हे मुन्ने बच्चों व गर्भवती महिलाओं को वितरित किये जाने वाले इस पोषण आहार को शिवराज सरकार की कार्यशैली के अनुरूप कागजों में बांट दिया गया हालांकि लॉकडाउन के समय वितरित किए गए पोषण आहार को लेकर किसी मीडिया या विपक्ष के द्वारा उंगली नहीं उठाई गई बल्कि यह काम भारत सरकार द्वारा भेजी गई एक टीम ने प्रदेश के जिलों में जब पोषण आहार का जायजा लिया तो प्रदेश के १३ जिलों में पोषण आहार बंटने को लेकर सवाल उठाये तो वहीं यह भी सवाल उठता है कि लॉकडाउन अवधि के दौरान जहां महिला बाल विकास विभाग के मुखिया शिवराज सिंह चौहान और उनके विभाग के कर्ताधर्ता साह और स्वाति मीना नायक जैसे महारथियों के होते हुए भी पोषण आहार ही नहीं बल्कि महिला बाल विकास के अधिकरियों द्वारा तमाम तरह के खेल आये दिन खेले जा रहे हैं, लॉकडाउन के दौरान जहां आंगनबाड़ी के माध्यम से बच्चों को उनके घर पर पोषण आहार का वितरण किये जाने का दावा किया जा रहा है,
वहीं इस दावे से यह भी सवाल उठता है कि यह सर्वविदित है कि आदिवासी जिलों में वहां के लोग फलियों और टपरों में रहते हैं, उनके यहां क्या यह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पोषण आहार का वजन ढोते हुए पहुंचाने की ईमानदारी दिखाई होगी फिलहाल कोरोना महामारी के दौर में लॉकडाउन के के दौरान इस महामारी के बचाव को लेकर तमाम खेल सत्ताधीशो व उनकी नौकरशाही ने किये उन्हीं में से एक यह पोषण आहार और लॉकडाउन के दौरान गरीबों को वितरित किये जाने वाले मध्याह्न भोजन में भी तमाम तरह की गड़बडिय़ां होने की खबरें जमीनी स्तर पर मिल रही हैं। मध्य प्रदेश में पोषणाहार नीति का हल पांच साल बाद भी नहीं निकल सका है। सरकारी तंत्र की लापरवाही के चलते व्यवस्था ही कुपोषित हो गई है। वर्ष २०१६ में शिवराज सरकार ने घोषणा की थी कि जिम्मेदारी स्वसहायता समूहों को दी जाएगी। इस आशय का फैसला कैबिनेट में भी हुआ था, लेकिन यह नीति अभी तक सरकार में नहीं आ सकी है। इस बीच कांग्रेस की सरकार भी आई, लेकिन ठेकेदारी की प्रथा जारी रही। सरकार ने पोषणाहार संयंत्र भी बना लिए हैं, लेकिन उन्हें शुरू करने की हिम्मत नहीं कर सकी है। १४ साल से चल रही ठेकेदारी प्रथा को लेकर घोटाले के आरोप भी लगते रहे हैं। इसकी पुष्टि आयकर छापों में हुई थी। स्वसहायता समूहों को यह काम मिलेगा, तो लाखों महिलाओं को स्वरोजागर मिल सकेगा। इस बार राज्य के बजट में १४९५ करोड़ रुपये का प्राविधान पोषणाहार के लिए किया गया है। बता दें, प्रदेश में कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है।
एक सर्वे के अनुसार राज्य में ७० हजार से अधिक बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। इनमें नवजात को लेकर छह वर्ष तक के बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा चार लाख से अधिक बच्चे कुपोषित का शिकार हैं। पोषण आहार नीति लागू होने से कुपोषण के संकट से निपटने में मदद मिलेगी लेकिन ठेकेदारी प्रथा के चलते इसमें भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। ठेकेदार लॉबी से पार पाने में सरकार के वरिष्ठ अधिकारी नाकाम साबित हो रहे हैं। यह स्थिति तब है जब महिला स्वसहायता समूहों के हाथ में पोषण आहार की जिम्मेदारी देने के लिए मिशन के माध्यम से इनके महासंघ भी बनाए गए। कांग्रेस के कार्यकाल में प्लांट एमपी एग्रो को दिए गए। एमपी एग्रो में ठेकेदारों के माध्यम से काम होता है, इससे अप्रत्यक्ष रूप से कमान ठेकेदारों के हाथ ही रही। अब इसमें बदलाव के लिए प्रस्ताव कैबिनेट में जाना है। इसमें व्यवस्था एमपी एगो से लेकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को दी जानी है, लेकिन ठेकेदारों के दबाव में यह प्रस्ताव कैबिनेट तक ही नहीं पहुंच रहा है। मालूम हो आंगनबाड़ी केंद्रों में छह माह से तीन वर्ष तक के बच्चे, गर्भवती, धात्री महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को पोषण आहार दिया जाता है।

