शशिकांत गुप्ते
प्रख्यात शायर स्व. अनवर जलालपुरीजी का यह शेर याद आ गया।
अजमतें उसको मिली कुदरत भी जिसके साथ थी
हर किसी को था नशा मुझ से बड़ा कोई नहीं
(अजमतें का मतलब महानता)
यह शेर सुनकर एक महान शख्स का स्मरण होता है। अभी दो दिन पूर्व उनकी पुण्य तिथि थी।
9 सितंबर 1896 को कानपुर के नर्वल गांव में विश्वेश्वर प्रसाद और कौशल्या देवी के पुत्र के रूप में पैदा हुए श्यामलाल गुप्त ने पांचवी कक्षा में पढऩे के दौरान पहली कविता लिखी थी। 15 साल की उम्र में श्यामलाल की लेखनी प्रखर होने लगी थी, लेकिन पिता अपने बेटे को बड़ा आदमी बनाना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने श्यामलाल की रचनाओं को कुएं में फेंक दिया था। बावजूद श्यामलाल साहित्य साधना में जुटे रहे।
य्या बात है 3/4 मार्च 1924 की। एक साल पहले 1923 में फतेहपुर जिला कांग्रेस के अधिवेशन में आधुनिक तिरंगे का स्वरूप तय हो चुका था, लेकिन भुजाओं को फडक़ाने वाले एक प्रेरक गीत की जरूरत थी। बात श्यामलाल गुप्त तक पहुंची तो उन्होंने कानपुर के फूलबाग अधिवेशन से डेढ़ महीने पहले एक रात जागकर झंडागीत को रच दिया। पांच छंदों में लिखे इस गीत के पहले और आखिरी छंद को बेहद लोकप्रियता मिली। जालियावालां बाग नगसंहार स्मृति में पहली बार इस गीत को सामूहिक रूप से 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग मैदान में गुनगुनाया गया था। इस सभा में जवाहर लाल नेहरू भी मौजूद थे।
श्यामलालजी गुलामी के सख्त खिलाफ थे, इसलिए छोड़ी सरकारी नौकरियां।
श्यामलाल गुप्त को पार्षदी जी के उपनाम से भी जाना-पहचाना जाता था। क्रांतिकारी पार्षदजी ने पहली नौकरी जिला परिषद के अध्यापक के रूप में शुरू की, लेकिन जब तीन साल का अनुबंध लिखने का नंबर आया तो गुलामी से इंकार करते हुए उन्होंने नौकरी को त्याग दिया। इसके बाद नगर निगम के स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त हुए, लेकिन कुछ समय बाद यहां भी अनुबंध की बात आई तो दुबारा नौकरी को ठुकरा दिया। इसके बाद श्यामलाल गुप्त ने आजादी के लिए खुद को समर्पित कर दिया। पत्रकारिता के पुरोधा गणेशशंकर विद्यार्थी और साहित्यकार प्रताप नारायण मिश्र के सानिध्य में आने पर श्यामलालजी ने जनसेवा शुरू करते हुए खुद को कर्मठ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी के रूप में स्थापित कर लिया।
आठ मर्तबा जेल गए, आजादी मिलने तक नंगे पांव रहे
कानपुर की जिला कांग्रेस के बैनरतले क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहने के कारण अंग्रेज हुकूमत ने क्रांतिकारी श्यामलाल को ‘नमक आंदोलन’ तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जेल भेज दिया। असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूूमिका के कारण उन्हें गिरफ्तार करने के बाद आगरा जेल भेज दिया गया था। कुल आठ मर्तबा गिरफ्तारी के कारण श्यामलाल गुप्त की जिंदगी के छह साल जेल में गुजरे। आजादी की लड़ाई के दौरान श्यामलाल ने संकल्प लिया था कि, देश की गुलामी खत्म नहीं होने तक नंग पांव ही रहेंगे। आजादी के बाद वर्ष 1952 में वह ऐतिहासिक क्षण आया, जब पार्षदजी ने लालकिले की प्राचीर से अपना प्रसिद्ध ‘झंडा गीत’ गाया। 1973 में ‘पद्म श्री’ पुरस्कार लेने के लिए श्यामलाल गुप्त को दिल्ली बुलाया गया तो उधार की धोती पहनकर मंच पर पहुंचे थे। ईमानदारी की मिसाल श्यामलालजी की इस स्थिति को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भावुक हो गई थीं। सरकार ने मदद करनी चाही, लेकिन श्यामलाल ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
10 अगस्त 1977 की रात को 81 वर्ष की अवस्था में कानपुर के जनरलगंज मोहल्ले में श्यामलाल गुप्ता दुनिया को अलविदा कह गए।
झंडा ऊँचा रहे हमारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हरषाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा,
स्वतंत्रता के भीषण रण में,
लखकर जोश बढ़े क्षण-क्षण में,
काँपे शत्रु देखकर मन में,
मिट जावे भय संकट सारा,……..
इस गीत ने स्वतंत्रता सग्राम की अगुवाई की।
तिरंगे के प्रति सम्मान दिल से होना चाहिए।
तिरंगा झंडा ही हमारा राष्ट्रीय ध्वज है।
गुलिस्तां भी विभिन्न रंगों के गुलों से ही खूबसूरत लगता है।
एक ही तरह के फूल से कभी गुलिस्तां बन ही नहीं सकता है।
यही तो भारत की विशेषता है।
अनेकता में एकता।
पुनः स्व.श्यामलाल गुप्त पार्षदजी को शत शत नमन।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

