अग्नि आलोक

आघात ! उनके यूं चले जाने से दिल वाकई गमजदा और आहत है

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चंद्रशेखर शर्मा

गयी पांच अगस्त को खेल प्रशाल में इंदौर के महापौर और पार्षदों का शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। अगले दिन छह अगस्त को कानोकान शीर्षक से मैंने पोस्ट लिखी। लिखा कि महापौर भार्गव जब भाषण देने आए तो उमेश शर्मा उनके बगल में ही खड़े थे और उनके चेहरे के भाव खास पढ़ने लायक थे !

कल एक व्हाट्सएप ग्रुप से खबर मिली कि उमेश शर्मा का हृदयाघात से निधन हो गया। यह खबर मेरे लिए क्या, बल्कि हरेक के लिए स्तब्धकारी थी ! सच कहूं तो पढ़कर मुझे खुद अपने हृदय पर आघात सा महसूस हुआ। वो व्हाट्सएप ग्रुप पत्रकारों और नेताओं का है। खुद उमेश शर्मा उससे जुड़े थे और तकरीबन रोज उसमें अपनी हाजरी लगाते थे। फिर भी खबर पर सहसा यकीन न हुआ। अलबत्ता पत्रकारिता में लम्बा समय बिताने के कारण जानता हूँ कि ऐसी खबरें भी तमाम अन्य खबरों की तरह एक खास तरह के ‘श्रेय और जल्दबाजी’ के चलते जैसी यानी जिस अवस्था में मिलती हैं, उसी अवस्था में परोस दी जाती हैं कि हमसे पहले कोई दूसरा उसे ‘ब्रेक’ न कर दे या परोस न दे ! यानी बिलकुल बेलिहाज, नंगी और निर्मम ! यह भी वैसी ही थी कि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता उमेश शर्मा का निधन ! सच भी अकसर ऐसे ही विकृत रूप में और अकस्मात सामने आता है। बिलकुल बेलिहाज। भले किसी के दिल पर उससे कैसा भी आघात पहुंचे। यह खबर भी उसी सच की तरह थी। 

बहरहाल एक मसले को लेकर कल सुबह ही मेरा उनसे फोन पर बात करने का मन हुआ था। इसके पहले उनसे रूबरू कई बार बात हुई थी, लेकिन फोन पर केवल एक बार संवाद हुआ था और वो टेलीफोनिक संवाद मेरे लिए बहुत ही बुरा अनुभव साबित हुआ था। यों किसी के जाने के बाद उसके बारे में अन्यथा जिक्र नहीं किया जाता, लेकिन सच का प्रकट करने का भी अपना एक दबाव होता है। सो सच यह है कि उस टेलीफोनिक संवाद के पहले तक मेरे मन में उनके लिए जितना आदर-सम्मान था वो सब छिन्न-भिन्न हो गया था। 

बात यह है कि वो कोरोनाकाल का समय था और अस्पताल में नाजुक हालत में भर्ती मेरे एक कजिन को रेमडेसिविर का एक इंजेक्शन उपलब्ध करवाने के लिए उसके बड़े भाई ने मुझसे निवेदन किया था। तब जाने क्यों मुझे उमेश शर्मा को ही फोन लगाना सूझा। हालांकि उसके पहले मैंने जीवन में कभी उनसे फोन पर बात नहीं की थी और रूबरू भी किसी काम के लिए कहने का तो सवाल ही नहीं। दरअसल बदनसीबी से अपन ने तबीयत ही ऐसी पायी है कि किसी के सामने याचक बनने का बिलकुल मन नहीं होता। खासकर अपने निजी या अपने परिजन के किसी भी काम को लेकर। उलटे उसके बजाय जो नसीब में लिखा हो, हमेशा उसे भुगतना मंजूर रहा। फिर भी कुछेक बार न चाहते हुए भी मुझे याचक बनना पड़ा है। 

उस दिन भी यही स्थिति थी। मैंने यह सोचकर उमेश शर्मा को फोन लगाया कि उनसे बिना परिचय के भी कई बार अखबारों में उनकी प्रतिभा और लायकी को लेकर इतना लिखा है कि इंदौर में किसी और ने न लिखा और यदि लिखा होगा तो वो छपा नहीं होगा अथवा अपन ने तो कहीं नहीं पढ़ा। हालांकि उसके बाद ही उमेश शर्मा इस नाचीज से बात करने लगे थे और आदर भी देते थे। बहरहाल मैंने तब जीवन में पहली बार उनको फोन लगाया और इंजेक्शन की जरूरत बताई। उन्होंने सुना और छूटते ही बोले, ‘काका, इसके लिए तो कलेक्टर (मनीष सिंह) से बात करना पड़ेगी !’ यह सुनकर एक पल तो सूझ ही नहीं पड़ा कि वो कहना क्या चाह रहे हैं ? क्या यह कि उन्हें कलेक्टर से बात करना पड़ेगी या यह कि मुझे कलेक्टर से बात करना पड़ेगी ? अलबत्ता लगा यही कि वो मेरे निवेदन को बला समझ रहे थे और उससे पल्ला झटक रहे थे। मैंने उन्हें कहा, ‘कोई बात नहीं भैया।’ और फोन रख दिया। 

उसके बाद मुझे खुद पर ही बहुत गुस्सा आया कि मैंने किस मूर्ति के सामने किस भावना या मुगालते से अर्जी लगा दी कि उसने तो अर्जी देखते ही चोला छोड़ दिया था और अपने विकृत स्वरूप में उजागर हो गयी ? वो भी तब, जबकि यह बात मैं अपने दीर्घ अनुभव से जानता था और जानता हूँ कि ज्यादातर भाजपा नेताओं और कांग्रेस नेताओं में यह फर्क है कि भाजपा नेताओं के पास कोई काम लेकर जाओ तो वो सबसे पहले यह देखते हैं कि उसमें काम लाने वाले का क्या लाभ है और खुद उनको क्या मिलेगा, जबकि कांग्रेस नेता न केवल लोगों के काम में दिलचस्पी लेते हैं बल्कि नफा-नुकसान को दूसरे नम्बर पर रख कामों को करवाने की अपने तई पूरी कोशिश भी करते हैं। यों भी अपना स्पष्ट मानना है कि राजनीति का उद्देश्य ही यही है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को ओबिलाइज करना। जाहिर है जो ओबिलाइज होते हैं वो जीवनभर के लिए आपके ऋणी या अहसानमंद हो जाते हैं और यूं आपके चाहने वालों का दायरा बढ़ता है और आपका कद भी ! फिर जिसका काम होता है वो उसकी माउथ पब्लिसिटी भी करता ही है। दीगर बात यह कि ऐसे ही यह बात नहीं कही गयी है कि ‘लोगों को फायदा पहुंचाते रहो और एक दिन आप बड़े आदमी बन जाओगे !’

अपने उस फोन और उसके जवाब के बाद तो उलटा हुआ था। जिसे अपन बड़ी मूर्ति समझ रहे थे, वो तो झटके में भरभराकर बिखरी पड़ी थी ! खैर। ऐसी बात नहीं है कि उस काम के लिए मैं मनीष सिंह जी से बात नहीं कर सकता था। जब वो औद्योगिक विकास निगम के एमडी थे तब उनसे भी बिना परिचय के उनके बारे में मैंने अखबार में एक पीस लिखा था और उसे लेकर उनसे फोन पर बात हुई थी तो उन्होंने भी बहुत अपनत्व और आदर से बात की थी। इसके बाद जब वो नगर निगम कमिश्नर बने तब अपन नगर निगम के न्यूज़ लैटर ‘नागरिक’ के संपादक थे और अकसर उनसे आमना-सामना और दुआ-सलाम हुई, लेकिन भगवान की कृपा और बदनसीबी वाले अपने मिजाज की वजह से कभी उनको किसी काम के लिए कहने की नौबत नहीं आयी। 

बहरहाल बाद में उसी इंजेक्शन के लिए मैंने भाभी और विधायक श्रीमती मालिनी लक्ष्मणसिंह गौड़ के निजी सहायक प्रणय चित्तौड़ा को फोन लगाया तो प्रणय ने मरीज की पूरी जानकारी ली और कहा, ‘काका, कल किसी को घर भेज देना, व्यवस्था हो जाएगी !’ खास बात यह कि प्रणय ने अगले ही दिन इंजेक्शन उपलब्ध करा भी दिया ! यहां बता दूं कि उस वक्त पूरे शहर में इंजेक्शन के लिए भयंकर मारामारी थी। 

सो उस दिन, जब खेल प्रशाल में वो शपथ ग्रहण चल रहा था तब मेरी नजर उमेश शर्मा के चेहरे पर गयी तो जैसे वहीं चिपक गयी ! उनकी बगल में ही माइक पर उनके मुकाबले काफी जूनियर, कच्चा डिबेटर और गोया कल का छोरा एक महापौर के तौर पर हजारों की तादाद में जमा भाजपाइयों, शहर के लोगों और अनेक बड़े नेताओं के सामने भाषण दे रहा था। सब जानते हैं कि महापौर उम्मीदवार बतौर भार्गव और डॉक्टर निशांत खरे सहित अन्य कई लोगों से उमेश शर्मा ज्यादा योग्य और ज्यादा हकदार दावेदार थे। फिर भी अनजाने से भार्गव को टिकट मिला, वो जीते और उनके सामने ही महापौर पद की शपथ ले रहे थे तो उनकी बगल में मौजूद उमेश शर्मा के मनोभावों को समझना मुश्किल न था। वहां तो वो सारे मनोभाव मुझे उनके उदास चेहरे पर साफ नजर आ रहे थे। गोया उनके दिल ने उस दिन भी एक आघात झेला था। उसकी पीड़ा मुझे भी महसूस हुई थी और यही कारण है कि अगले दिन अपनी पोस्ट में ढंके-छुपे तौर पर उसका जिक्र करने से मैं खुद को रोक नहीं पाया था। इसका एक कारण यह था कि तमाम लोगों की तरह एक बार मैंने भी उन्हें कहा था कि पार्टी को आपका उपयोग करना नहीं आया और आप कहीं बहुत ज्यादा के हकदार हैं। इसके जवाब में उन्होंने चिर-परिचित हंसी के साथ कहा था कि ‘काका, यही बात मैं आपके बारे में भी कह सकता हूँ !’ इसके बाद फिर हम दोनों खुद को ठहाका लगाने से नहीं रोक पाए थे। जो हो। 

मेरी फेसबुक वॉल पर मैं जो भी मनचीता और ऊलजुलूल लिखता हूँ, उसमें से कोई पोस्ट उन्हें पसंद आती थी तो वो अकेले थे, जो उन पर ‘अत्युत्तम’ या ‘अप्रतिम’ जैसे शब्द लिखकर कमेंट करते थे। इसमें क्या शक कि मां सरस्वती की उन पर विशेष मेहरबानी थी और वो उम्दा वक्ता थे, जिसके चलते दूसरे बेशुमार लोगों की तरह अपन भी उनके बड़े प्रशंसक थे। मैं उन्हें उमेश भैया बुलाता था। शहर में ऐसे कम ही नेता हैं, जो अपन को वाकई प्रिय हैं। उमेश भैया उनमें से एक थे और उनके यूं चले जाने से दिल वाकई गमजदा और आहत है। उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि और नमन। उमेश भैया, आप हमेशा दिल में रहेंगे।

गयी पांच अगस्त को खेल प्रशाल में इंदौर के महापौर और पार्षदों का शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। अगले दिन छह अगस्त को कानोकान शीर्षक से मैंने पोस्ट लिखी। लिखा कि महापौर भार्गव जब भाषण देने आए तो उमेश शर्मा उनके बगल में ही खड़े थे और उनके चेहरे के भाव खास पढ़ने लायक थे !

कल एक व्हाट्सएप ग्रुप से खबर मिली कि उमेश शर्मा का हृदयाघात से निधन हो गया। यह खबर मेरे लिए क्या, बल्कि हरेक के लिए स्तब्धकारी थी ! सच कहूं तो पढ़कर मुझे खुद अपने हृदय पर आघात सा महसूस हुआ। वो व्हाट्सएप ग्रुप पत्रकारों और नेताओं का है। खुद उमेश शर्मा उससे जुड़े थे और तकरीबन रोज उसमें अपनी हाजरी लगाते थे। फिर भी खबर पर सहसा यकीन न हुआ। अलबत्ता पत्रकारिता में लम्बा समय बिताने के कारण जानता हूँ कि ऐसी खबरें भी तमाम अन्य खबरों की तरह एक खास तरह के ‘श्रेय और जल्दबाजी’ के चलते जैसी यानी जिस अवस्था में मिलती हैं, उसी अवस्था में परोस दी जाती हैं कि हमसे पहले कोई दूसरा उसे ‘ब्रेक’ न कर दे या परोस न दे ! यानी बिलकुल बेलिहाज, नंगी और निर्मम ! यह भी वैसी ही थी कि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता उमेश शर्मा का निधन ! सच भी अकसर ऐसे ही विकृत रूप में और अकस्मात सामने आता है। बिलकुल बेलिहाज। भले किसी के दिल पर उससे कैसा भी आघात पहुंचे। यह खबर भी उसी सच की तरह थी। 

बहरहाल एक मसले को लेकर कल सुबह ही मेरा उनसे फोन पर बात करने का मन हुआ था। इसके पहले उनसे रूबरू कई बार बात हुई थी, लेकिन फोन पर केवल एक बार संवाद हुआ था और वो टेलीफोनिक संवाद मेरे लिए बहुत ही बुरा अनुभव साबित हुआ था। यों किसी के जाने के बाद उसके बारे में अन्यथा जिक्र नहीं किया जाता, लेकिन सच का प्रकट करने का भी अपना एक दबाव होता है। सो सच यह है कि उस टेलीफोनिक संवाद के पहले तक मेरे मन में उनके लिए जितना आदर-सम्मान था वो सब छिन्न-भिन्न हो गया था। 

बात यह है कि वो कोरोनाकाल का समय था और अस्पताल में नाजुक हालत में भर्ती मेरे एक कजिन को रेमडेसिविर का एक इंजेक्शन उपलब्ध करवाने के लिए उसके बड़े भाई ने मुझसे निवेदन किया था। तब जाने क्यों मुझे उमेश शर्मा को ही फोन लगाना सूझा। हालांकि उसके पहले मैंने जीवन में कभी उनसे फोन पर बात नहीं की थी और रूबरू भी किसी काम के लिए कहने का तो सवाल ही नहीं। दरअसल बदनसीबी से अपन ने तबीयत ही ऐसी पायी है कि किसी के सामने याचक बनने का बिलकुल मन नहीं होता। खासकर अपने निजी या अपने परिजन के किसी भी काम को लेकर। उलटे उसके बजाय जो नसीब में लिखा हो, हमेशा उसे भुगतना मंजूर रहा। फिर भी कुछेक बार न चाहते हुए भी मुझे याचक बनना पड़ा है। 

उस दिन भी यही स्थिति थी। मैंने यह सोचकर उमेश शर्मा को फोन लगाया कि उनसे बिना परिचय के भी कई बार अखबारों में उनकी प्रतिभा और लायकी को लेकर इतना लिखा है कि इंदौर में किसी और ने न लिखा और यदि लिखा होगा तो वो छपा नहीं होगा अथवा अपन ने तो कहीं नहीं पढ़ा। हालांकि उसके बाद ही उमेश शर्मा इस नाचीज से बात करने लगे थे और आदर भी देते थे। बहरहाल मैंने तब जीवन में पहली बार उनको फोन लगाया और इंजेक्शन की जरूरत बताई। उन्होंने सुना और छूटते ही बोले, ‘काका, इसके लिए तो कलेक्टर (मनीष सिंह) से बात करना पड़ेगी !’ यह सुनकर एक पल तो सूझ ही नहीं पड़ा कि वो कहना क्या चाह रहे हैं ? क्या यह कि उन्हें कलेक्टर से बात करना पड़ेगी या यह कि मुझे कलेक्टर से बात करना पड़ेगी ? अलबत्ता लगा यही कि वो मेरे निवेदन को बला समझ रहे थे और उससे पल्ला झटक रहे थे। मैंने उन्हें कहा, ‘कोई बात नहीं भैया।’ और फोन रख दिया। 

उसके बाद मुझे खुद पर ही बहुत गुस्सा आया कि मैंने किस मूर्ति के सामने किस भावना या मुगालते से अर्जी लगा दी कि उसने तो अर्जी देखते ही चोला छोड़ दिया था और अपने विकृत स्वरूप में उजागर हो गयी ? वो भी तब, जबकि यह बात मैं अपने दीर्घ अनुभव से जानता था और जानता हूँ कि ज्यादातर भाजपा नेताओं और कांग्रेस नेताओं में यह फर्क है कि भाजपा नेताओं के पास कोई काम लेकर जाओ तो वो सबसे पहले यह देखते हैं कि उसमें काम लाने वाले का क्या लाभ है और खुद उनको क्या मिलेगा, जबकि कांग्रेस नेता न केवल लोगों के काम में दिलचस्पी लेते हैं बल्कि नफा-नुकसान को दूसरे नम्बर पर रख कामों को करवाने की अपने तई पूरी कोशिश भी करते हैं। यों भी अपना स्पष्ट मानना है कि राजनीति का उद्देश्य ही यही है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को ओबिलाइज करना। जाहिर है जो ओबिलाइज होते हैं वो जीवनभर के लिए आपके ऋणी या अहसानमंद हो जाते हैं और यूं आपके चाहने वालों का दायरा बढ़ता है और आपका कद भी ! फिर जिसका काम होता है वो उसकी माउथ पब्लिसिटी भी करता ही है। दीगर बात यह कि ऐसे ही यह बात नहीं कही गयी है कि ‘लोगों को फायदा पहुंचाते रहो और एक दिन आप बड़े आदमी बन जाओगे !’

अपने उस फोन और उसके जवाब के बाद तो उलटा हुआ था। जिसे अपन बड़ी मूर्ति समझ रहे थे, वो तो झटके में भरभराकर बिखरी पड़ी थी ! खैर। ऐसी बात नहीं है कि उस काम के लिए मैं मनीष सिंह जी से बात नहीं कर सकता था। जब वो औद्योगिक विकास निगम के एमडी थे तब उनसे भी बिना परिचय के उनके बारे में मैंने अखबार में एक पीस लिखा था और उसे लेकर उनसे फोन पर बात हुई थी तो उन्होंने भी बहुत अपनत्व और आदर से बात की थी। इसके बाद जब वो नगर निगम कमिश्नर बने तब अपन नगर निगम के न्यूज़ लैटर ‘नागरिक’ के संपादक थे और अकसर उनसे आमना-सामना और दुआ-सलाम हुई, लेकिन भगवान की कृपा और बदनसीबी वाले अपने मिजाज की वजह से कभी उनको किसी काम के लिए कहने की नौबत नहीं आयी। 

बहरहाल बाद में उसी इंजेक्शन के लिए मैंने भाभी और विधायक श्रीमती मालिनी लक्ष्मणसिंह गौड़ के निजी सहायक प्रणय चित्तौड़ा को फोन लगाया तो प्रणय ने मरीज की पूरी जानकारी ली और कहा, ‘काका, कल किसी को घर भेज देना, व्यवस्था हो जाएगी !’ खास बात यह कि प्रणय ने अगले ही दिन इंजेक्शन उपलब्ध करा भी दिया ! यहां बता दूं कि उस वक्त पूरे शहर में इंजेक्शन के लिए भयंकर मारामारी थी। 

सो उस दिन, जब खेल प्रशाल में वो शपथ ग्रहण चल रहा था तब मेरी नजर उमेश शर्मा के चेहरे पर गयी तो जैसे वहीं चिपक गयी ! उनकी बगल में ही माइक पर उनके मुकाबले काफी जूनियर, कच्चा डिबेटर और गोया कल का छोरा एक महापौर के तौर पर हजारों की तादाद में जमा भाजपाइयों, शहर के लोगों और अनेक बड़े नेताओं के सामने भाषण दे रहा था। सब जानते हैं कि महापौर उम्मीदवार बतौर भार्गव और डॉक्टर निशांत खरे सहित अन्य कई लोगों से उमेश शर्मा ज्यादा योग्य और ज्यादा हकदार दावेदार थे। फिर भी अनजाने से भार्गव को टिकट मिला, वो जीते और उनके सामने ही महापौर पद की शपथ ले रहे थे तो उनकी बगल में मौजूद उमेश शर्मा के मनोभावों को समझना मुश्किल न था। वहां तो वो सारे मनोभाव मुझे उनके उदास चेहरे पर साफ नजर आ रहे थे। गोया उनके दिल ने उस दिन भी एक आघात झेला था। उसकी पीड़ा मुझे भी महसूस हुई थी और यही कारण है कि अगले दिन अपनी पोस्ट में ढंके-छुपे तौर पर उसका जिक्र करने से मैं खुद को रोक नहीं पाया था। इसका एक कारण यह था कि तमाम लोगों की तरह एक बार मैंने भी उन्हें कहा था कि पार्टी को आपका उपयोग करना नहीं आया और आप कहीं बहुत ज्यादा के हकदार हैं। इसके जवाब में उन्होंने चिर-परिचित हंसी के साथ कहा था कि ‘काका, यही बात मैं आपके बारे में भी कह सकता हूँ !’ इसके बाद फिर हम दोनों खुद को ठहाका लगाने से नहीं रोक पाए थे। जो हो। 

मेरी फेसबुक वॉल पर मैं जो भी मनचीता और ऊलजुलूल लिखता हूँ, उसमें से कोई पोस्ट उन्हें पसंद आती थी तो वो अकेले थे, जो उन पर ‘अत्युत्तम’ या ‘अप्रतिम’ जैसे शब्द लिखकर कमेंट करते थे। इसमें क्या शक कि मां सरस्वती की उन पर विशेष मेहरबानी थी और वो उम्दा वक्ता थे, जिसके चलते दूसरे बेशुमार लोगों की तरह अपन भी उनके बड़े प्रशंसक थे। मैं उन्हें उमेश भैया बुलाता था। शहर में ऐसे कम ही नेता हैं, जो अपन को वाकई प्रिय हैं। उमेश भैया उनमें से एक थे और उनके यूं चले जाने से दिल वाकई गमजदा और आहत है। उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि और नमन। उमेश भैया, आप हमेशा दिल में रहेंगे।

● चंद्रशेखर शर्मा

गयी पांच अगस्त को खेल प्रशाल में इंदौर के महापौर और पार्षदों का शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। अगले दिन छह अगस्त को कानोकान शीर्षक से मैंने पोस्ट लिखी। लिखा कि महापौर भार्गव जब भाषण देने आए तो उमेश शर्मा उनके बगल में ही खड़े थे और उनके चेहरे के भाव खास पढ़ने लायक थे !

कल एक व्हाट्सएप ग्रुप से खबर मिली कि उमेश शर्मा का हृदयाघात से निधन हो गया। यह खबर मेरे लिए क्या, बल्कि हरेक के लिए स्तब्धकारी थी ! सच कहूं तो पढ़कर मुझे खुद अपने हृदय पर आघात सा महसूस हुआ। वो व्हाट्सएप ग्रुप पत्रकारों और नेताओं का है। खुद उमेश शर्मा उससे जुड़े थे और तकरीबन रोज उसमें अपनी हाजरी लगाते थे। फिर भी खबर पर सहसा यकीन न हुआ। अलबत्ता पत्रकारिता में लम्बा समय बिताने के कारण जानता हूँ कि ऐसी खबरें भी तमाम अन्य खबरों की तरह एक खास तरह के ‘श्रेय और जल्दबाजी’ के चलते जैसी यानी जिस अवस्था में मिलती हैं, उसी अवस्था में परोस दी जाती हैं कि हमसे पहले कोई दूसरा उसे ‘ब्रेक’ न कर दे या परोस न दे ! यानी बिलकुल बेलिहाज, नंगी और निर्मम ! यह भी वैसी ही थी कि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता उमेश शर्मा का निधन ! सच भी अकसर ऐसे ही विकृत रूप में और अकस्मात सामने आता है। बिलकुल बेलिहाज। भले किसी के दिल पर उससे कैसा भी आघात पहुंचे। यह खबर भी उसी सच की तरह थी। 

बहरहाल एक मसले को लेकर कल सुबह ही मेरा उनसे फोन पर बात करने का मन हुआ था। इसके पहले उनसे रूबरू कई बार बात हुई थी, लेकिन फोन पर केवल एक बार संवाद हुआ था और वो टेलीफोनिक संवाद मेरे लिए बहुत ही बुरा अनुभव साबित हुआ था। यों किसी के जाने के बाद उसके बारे में अन्यथा जिक्र नहीं किया जाता, लेकिन सच का प्रकट करने का भी अपना एक दबाव होता है। सो सच यह है कि उस टेलीफोनिक संवाद के पहले तक मेरे मन में उनके लिए जितना आदर-सम्मान था वो सब छिन्न-भिन्न हो गया था। 

बात यह है कि वो कोरोनाकाल का समय था और अस्पताल में नाजुक हालत में भर्ती मेरे एक कजिन को रेमडेसिविर का एक इंजेक्शन उपलब्ध करवाने के लिए उसके बड़े भाई ने मुझसे निवेदन किया था। तब जाने क्यों मुझे उमेश शर्मा को ही फोन लगाना सूझा। हालांकि उसके पहले मैंने जीवन में कभी उनसे फोन पर बात नहीं की थी और रूबरू भी किसी काम के लिए कहने का तो सवाल ही नहीं। दरअसल बदनसीबी से अपन ने तबीयत ही ऐसी पायी है कि किसी के सामने याचक बनने का बिलकुल मन नहीं होता। खासकर अपने निजी या अपने परिजन के किसी भी काम को लेकर। उलटे उसके बजाय जो नसीब में लिखा हो, हमेशा उसे भुगतना मंजूर रहा। फिर भी कुछेक बार न चाहते हुए भी मुझे याचक बनना पड़ा है। 

उस दिन भी यही स्थिति थी। मैंने यह सोचकर उमेश शर्मा को फोन लगाया कि उनसे बिना परिचय के भी कई बार अखबारों में उनकी प्रतिभा और लायकी को लेकर इतना लिखा है कि इंदौर में किसी और ने न लिखा और यदि लिखा होगा तो वो छपा नहीं होगा अथवा अपन ने तो कहीं नहीं पढ़ा। हालांकि उसके बाद ही उमेश शर्मा इस नाचीज से बात करने लगे थे और आदर भी देते थे। बहरहाल मैंने तब जीवन में पहली बार उनको फोन लगाया और इंजेक्शन की जरूरत बताई। उन्होंने सुना और छूटते ही बोले, ‘काका, इसके लिए तो कलेक्टर (मनीष सिंह) से बात करना पड़ेगी !’ यह सुनकर एक पल तो सूझ ही नहीं पड़ा कि वो कहना क्या चाह रहे हैं ? क्या यह कि उन्हें कलेक्टर से बात करना पड़ेगी या यह कि मुझे कलेक्टर से बात करना पड़ेगी ? अलबत्ता लगा यही कि वो मेरे निवेदन को बला समझ रहे थे और उससे पल्ला झटक रहे थे। मैंने उन्हें कहा, ‘कोई बात नहीं भैया।’ और फोन रख दिया। 

उसके बाद मुझे खुद पर ही बहुत गुस्सा आया कि मैंने किस मूर्ति के सामने किस भावना या मुगालते से अर्जी लगा दी कि उसने तो अर्जी देखते ही चोला छोड़ दिया था और अपने विकृत स्वरूप में उजागर हो गयी ? वो भी तब, जबकि यह बात मैं अपने दीर्घ अनुभव से जानता था और जानता हूँ कि ज्यादातर भाजपा नेताओं और कांग्रेस नेताओं में यह फर्क है कि भाजपा नेताओं के पास कोई काम लेकर जाओ तो वो सबसे पहले यह देखते हैं कि उसमें काम लाने वाले का क्या लाभ है और खुद उनको क्या मिलेगा, जबकि कांग्रेस नेता न केवल लोगों के काम में दिलचस्पी लेते हैं बल्कि नफा-नुकसान को दूसरे नम्बर पर रख कामों को करवाने की अपने तई पूरी कोशिश भी करते हैं। यों भी अपना स्पष्ट मानना है कि राजनीति का उद्देश्य ही यही है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को ओबिलाइज करना। जाहिर है जो ओबिलाइज होते हैं वो जीवनभर के लिए आपके ऋणी या अहसानमंद हो जाते हैं और यूं आपके चाहने वालों का दायरा बढ़ता है और आपका कद भी ! फिर जिसका काम होता है वो उसकी माउथ पब्लिसिटी भी करता ही है। दीगर बात यह कि ऐसे ही यह बात नहीं कही गयी है कि ‘लोगों को फायदा पहुंचाते रहो और एक दिन आप बड़े आदमी बन जाओगे !’

अपने उस फोन और उसके जवाब के बाद तो उलटा हुआ था। जिसे अपन बड़ी मूर्ति समझ रहे थे, वो तो झटके में भरभराकर बिखरी पड़ी थी ! खैर। ऐसी बात नहीं है कि उस काम के लिए मैं मनीष सिंह जी से बात नहीं कर सकता था। जब वो औद्योगिक विकास निगम के एमडी थे तब उनसे भी बिना परिचय के उनके बारे में मैंने अखबार में एक पीस लिखा था और उसे लेकर उनसे फोन पर बात हुई थी तो उन्होंने भी बहुत अपनत्व और आदर से बात की थी। इसके बाद जब वो नगर निगम कमिश्नर बने तब अपन नगर निगम के न्यूज़ लैटर ‘नागरिक’ के संपादक थे और अकसर उनसे आमना-सामना और दुआ-सलाम हुई, लेकिन भगवान की कृपा और बदनसीबी वाले अपने मिजाज की वजह से कभी उनको किसी काम के लिए कहने की नौबत नहीं आयी। 

बहरहाल बाद में उसी इंजेक्शन के लिए मैंने भाभी और विधायक श्रीमती मालिनी लक्ष्मणसिंह गौड़ के निजी सहायक प्रणय चित्तौड़ा को फोन लगाया तो प्रणय ने मरीज की पूरी जानकारी ली और कहा, ‘काका, कल किसी को घर भेज देना, व्यवस्था हो जाएगी !’ खास बात यह कि प्रणय ने अगले ही दिन इंजेक्शन उपलब्ध करा भी दिया ! यहां बता दूं कि उस वक्त पूरे शहर में इंजेक्शन के लिए भयंकर मारामारी थी। 

सो उस दिन, जब खेल प्रशाल में वो शपथ ग्रहण चल रहा था तब मेरी नजर उमेश शर्मा के चेहरे पर गयी तो जैसे वहीं चिपक गयी ! उनकी बगल में ही माइक पर उनके मुकाबले काफी जूनियर, कच्चा डिबेटर और गोया कल का छोरा एक महापौर के तौर पर हजारों की तादाद में जमा भाजपाइयों, शहर के लोगों और अनेक बड़े नेताओं के सामने भाषण दे रहा था। सब जानते हैं कि महापौर उम्मीदवार बतौर भार्गव और डॉक्टर निशांत खरे सहित अन्य कई लोगों से उमेश शर्मा ज्यादा योग्य और ज्यादा हकदार दावेदार थे। फिर भी अनजाने से भार्गव को टिकट मिला, वो जीते और उनके सामने ही महापौर पद की शपथ ले रहे थे तो उनकी बगल में मौजूद उमेश शर्मा के मनोभावों को समझना मुश्किल न था। वहां तो वो सारे मनोभाव मुझे उनके उदास चेहरे पर साफ नजर आ रहे थे। गोया उनके दिल ने उस दिन भी एक आघात झेला था। उसकी पीड़ा मुझे भी महसूस हुई थी और यही कारण है कि अगले दिन अपनी पोस्ट में ढंके-छुपे तौर पर उसका जिक्र करने से मैं खुद को रोक नहीं पाया था। इसका एक कारण यह था कि तमाम लोगों की तरह एक बार मैंने भी उन्हें कहा था कि पार्टी को आपका उपयोग करना नहीं आया और आप कहीं बहुत ज्यादा के हकदार हैं। इसके जवाब में उन्होंने चिर-परिचित हंसी के साथ कहा था कि ‘काका, यही बात मैं आपके बारे में भी कह सकता हूँ !’ इसके बाद फिर हम दोनों खुद को ठहाका लगाने से नहीं रोक पाए थे। जो हो। 

मेरी फेसबुक वॉल पर मैं जो भी मनचीता और ऊलजुलूल लिखता हूँ, उसमें से कोई पोस्ट उन्हें पसंद आती थी तो वो अकेले थे, जो उन पर ‘अत्युत्तम’ या ‘अप्रतिम’ जैसे शब्द लिखकर कमेंट करते थे। इसमें क्या शक कि मां सरस्वती की उन पर विशेष मेहरबानी थी और वो उम्दा वक्ता थे, जिसके चलते दूसरे बेशुमार लोगों की तरह अपन भी उनके बड़े प्रशंसक थे। मैं उन्हें उमेश भैया बुलाता था। शहर में ऐसे कम ही नेता हैं, जो अपन को वाकई प्रिय हैं। उमेश भैया उनमें से एक थे और उनके यूं चले जाने से दिल वाकई गमजदा और आहत है। उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि और नमन। उमेश भैया, आप हमेशा दिल में रहेंगे।

गयी पांच अगस्त को खेल प्रशाल में इंदौर के महापौर और पार्षदों का शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। अगले दिन छह अगस्त को कानोकान शीर्षक से मैंने पोस्ट लिखी। लिखा कि महापौर भार्गव जब भाषण देने आए तो उमेश शर्मा उनके बगल में ही खड़े थे और उनके चेहरे के भाव खास पढ़ने लायक थे !

कल एक व्हाट्सएप ग्रुप से खबर मिली कि उमेश शर्मा का हृदयाघात से निधन हो गया। यह खबर मेरे लिए क्या, बल्कि हरेक के लिए स्तब्धकारी थी ! सच कहूं तो पढ़कर मुझे खुद अपने हृदय पर आघात सा महसूस हुआ। वो व्हाट्सएप ग्रुप पत्रकारों और नेताओं का है। खुद उमेश शर्मा उससे जुड़े थे और तकरीबन रोज उसमें अपनी हाजरी लगाते थे। फिर भी खबर पर सहसा यकीन न हुआ। अलबत्ता पत्रकारिता में लम्बा समय बिताने के कारण जानता हूँ कि ऐसी खबरें भी तमाम अन्य खबरों की तरह एक खास तरह के ‘श्रेय और जल्दबाजी’ के चलते जैसी यानी जिस अवस्था में मिलती हैं, उसी अवस्था में परोस दी जाती हैं कि हमसे पहले कोई दूसरा उसे ‘ब्रेक’ न कर दे या परोस न दे ! यानी बिलकुल बेलिहाज, नंगी और निर्मम ! यह भी वैसी ही थी कि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता उमेश शर्मा का निधन ! सच भी अकसर ऐसे ही विकृत रूप में और अकस्मात सामने आता है। बिलकुल बेलिहाज। भले किसी के दिल पर उससे कैसा भी आघात पहुंचे। यह खबर भी उसी सच की तरह थी। 

बहरहाल एक मसले को लेकर कल सुबह ही मेरा उनसे फोन पर बात करने का मन हुआ था। इसके पहले उनसे रूबरू कई बार बात हुई थी, लेकिन फोन पर केवल एक बार संवाद हुआ था और वो टेलीफोनिक संवाद मेरे लिए बहुत ही बुरा अनुभव साबित हुआ था। यों किसी के जाने के बाद उसके बारे में अन्यथा जिक्र नहीं किया जाता, लेकिन सच का प्रकट करने का भी अपना एक दबाव होता है। सो सच यह है कि उस टेलीफोनिक संवाद के पहले तक मेरे मन में उनके लिए जितना आदर-सम्मान था वो सब छिन्न-भिन्न हो गया था। 

बात यह है कि वो कोरोनाकाल का समय था और अस्पताल में नाजुक हालत में भर्ती मेरे एक कजिन को रेमडेसिविर का एक इंजेक्शन उपलब्ध करवाने के लिए उसके बड़े भाई ने मुझसे निवेदन किया था। तब जाने क्यों मुझे उमेश शर्मा को ही फोन लगाना सूझा। हालांकि उसके पहले मैंने जीवन में कभी उनसे फोन पर बात नहीं की थी और रूबरू भी किसी काम के लिए कहने का तो सवाल ही नहीं। दरअसल बदनसीबी से अपन ने तबीयत ही ऐसी पायी है कि किसी के सामने याचक बनने का बिलकुल मन नहीं होता। खासकर अपने निजी या अपने परिजन के किसी भी काम को लेकर। उलटे उसके बजाय जो नसीब में लिखा हो, हमेशा उसे भुगतना मंजूर रहा। फिर भी कुछेक बार न चाहते हुए भी मुझे याचक बनना पड़ा है। 

उस दिन भी यही स्थिति थी। मैंने यह सोचकर उमेश शर्मा को फोन लगाया कि उनसे बिना परिचय के भी कई बार अखबारों में उनकी प्रतिभा और लायकी को लेकर इतना लिखा है कि इंदौर में किसी और ने न लिखा और यदि लिखा होगा तो वो छपा नहीं होगा अथवा अपन ने तो कहीं नहीं पढ़ा। हालांकि उसके बाद ही उमेश शर्मा इस नाचीज से बात करने लगे थे और आदर भी देते थे। बहरहाल मैंने तब जीवन में पहली बार उनको फोन लगाया और इंजेक्शन की जरूरत बताई। उन्होंने सुना और छूटते ही बोले, ‘काका, इसके लिए तो कलेक्टर (मनीष सिंह) से बात करना पड़ेगी !’ यह सुनकर एक पल तो सूझ ही नहीं पड़ा कि वो कहना क्या चाह रहे हैं ? क्या यह कि उन्हें कलेक्टर से बात करना पड़ेगी या यह कि मुझे कलेक्टर से बात करना पड़ेगी ? अलबत्ता लगा यही कि वो मेरे निवेदन को बला समझ रहे थे और उससे पल्ला झटक रहे थे। मैंने उन्हें कहा, ‘कोई बात नहीं भैया।’ और फोन रख दिया। 

उसके बाद मुझे खुद पर ही बहुत गुस्सा आया कि मैंने किस मूर्ति के सामने किस भावना या मुगालते से अर्जी लगा दी कि उसने तो अर्जी देखते ही चोला छोड़ दिया था और अपने विकृत स्वरूप में उजागर हो गयी ? वो भी तब, जबकि यह बात मैं अपने दीर्घ अनुभव से जानता था और जानता हूँ कि ज्यादातर भाजपा नेताओं और कांग्रेस नेताओं में यह फर्क है कि भाजपा नेताओं के पास कोई काम लेकर जाओ तो वो सबसे पहले यह देखते हैं कि उसमें काम लाने वाले का क्या लाभ है और खुद उनको क्या मिलेगा, जबकि कांग्रेस नेता न केवल लोगों के काम में दिलचस्पी लेते हैं बल्कि नफा-नुकसान को दूसरे नम्बर पर रख कामों को करवाने की अपने तई पूरी कोशिश भी करते हैं। यों भी अपना स्पष्ट मानना है कि राजनीति का उद्देश्य ही यही है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को ओबिलाइज करना। जाहिर है जो ओबिलाइज होते हैं वो जीवनभर के लिए आपके ऋणी या अहसानमंद हो जाते हैं और यूं आपके चाहने वालों का दायरा बढ़ता है और आपका कद भी ! फिर जिसका काम होता है वो उसकी माउथ पब्लिसिटी भी करता ही है। दीगर बात यह कि ऐसे ही यह बात नहीं कही गयी है कि ‘लोगों को फायदा पहुंचाते रहो और एक दिन आप बड़े आदमी बन जाओगे !’

अपने उस फोन और उसके जवाब के बाद तो उलटा हुआ था। जिसे अपन बड़ी मूर्ति समझ रहे थे, वो तो झटके में भरभराकर बिखरी पड़ी थी ! खैर। ऐसी बात नहीं है कि उस काम के लिए मैं मनीष सिंह जी से बात नहीं कर सकता था। जब वो औद्योगिक विकास निगम के एमडी थे तब उनसे भी बिना परिचय के उनके बारे में मैंने अखबार में एक पीस लिखा था और उसे लेकर उनसे फोन पर बात हुई थी तो उन्होंने भी बहुत अपनत्व और आदर से बात की थी। इसके बाद जब वो नगर निगम कमिश्नर बने तब अपन नगर निगम के न्यूज़ लैटर ‘नागरिक’ के संपादक थे और अकसर उनसे आमना-सामना और दुआ-सलाम हुई, लेकिन भगवान की कृपा और बदनसीबी वाले अपने मिजाज की वजह से कभी उनको किसी काम के लिए कहने की नौबत नहीं आयी। 

बहरहाल बाद में उसी इंजेक्शन के लिए मैंने भाभी और विधायक श्रीमती मालिनी लक्ष्मणसिंह गौड़ के निजी सहायक प्रणय चित्तौड़ा को फोन लगाया तो प्रणय ने मरीज की पूरी जानकारी ली और कहा, ‘काका, कल किसी को घर भेज देना, व्यवस्था हो जाएगी !’ खास बात यह कि प्रणय ने अगले ही दिन इंजेक्शन उपलब्ध करा भी दिया ! यहां बता दूं कि उस वक्त पूरे शहर में इंजेक्शन के लिए भयंकर मारामारी थी। 

सो उस दिन, जब खेल प्रशाल में वो शपथ ग्रहण चल रहा था तब मेरी नजर उमेश शर्मा के चेहरे पर गयी तो जैसे वहीं चिपक गयी ! उनकी बगल में ही माइक पर उनके मुकाबले काफी जूनियर, कच्चा डिबेटर और गोया कल का छोरा एक महापौर के तौर पर हजारों की तादाद में जमा भाजपाइयों, शहर के लोगों और अनेक बड़े नेताओं के सामने भाषण दे रहा था। सब जानते हैं कि महापौर उम्मीदवार बतौर भार्गव और डॉक्टर निशांत खरे सहित अन्य कई लोगों से उमेश शर्मा ज्यादा योग्य और ज्यादा हकदार दावेदार थे। फिर भी अनजाने से भार्गव को टिकट मिला, वो जीते और उनके सामने ही महापौर पद की शपथ ले रहे थे तो उनकी बगल में मौजूद उमेश शर्मा के मनोभावों को समझना मुश्किल न था। वहां तो वो सारे मनोभाव मुझे उनके उदास चेहरे पर साफ नजर आ रहे थे। गोया उनके दिल ने उस दिन भी एक आघात झेला था। उसकी पीड़ा मुझे भी महसूस हुई थी और यही कारण है कि अगले दिन अपनी पोस्ट में ढंके-छुपे तौर पर उसका जिक्र करने से मैं खुद को रोक नहीं पाया था। इसका एक कारण यह था कि तमाम लोगों की तरह एक बार मैंने भी उन्हें कहा था कि पार्टी को आपका उपयोग करना नहीं आया और आप कहीं बहुत ज्यादा के हकदार हैं। इसके जवाब में उन्होंने चिर-परिचित हंसी के साथ कहा था कि ‘काका, यही बात मैं आपके बारे में भी कह सकता हूँ !’ इसके बाद फिर हम दोनों खुद को ठहाका लगाने से नहीं रोक पाए थे। जो हो। 

मेरी फेसबुक वॉल पर मैं जो भी मनचीता और ऊलजुलूल लिखता हूँ, उसमें से कोई पोस्ट उन्हें पसंद आती थी तो वो अकेले थे, जो उन पर ‘अत्युत्तम’ या ‘अप्रतिम’ जैसे शब्द लिखकर कमेंट करते थे। इसमें क्या शक कि मां सरस्वती की उन पर विशेष मेहरबानी थी और वो उम्दा वक्ता थे, जिसके चलते दूसरे बेशुमार लोगों की तरह अपन भी उनके बड़े प्रशंसक थे। मैं उन्हें उमेश भैया बुलाता था। शहर में ऐसे कम ही नेता हैं, जो अपन को वाकई प्रिय हैं। उमेश भैया उनमें से एक थे और उनके यूं चले जाने से दिल वाकई गमजदा और आहत है। उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि और नमन। उमेश भैया, आप हमेशा दिल में रहेंगे।

चंद्रशेखर शर्मा

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