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विचार की तपिश आज भी जारी है

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राजकुमार जैन

विचार की तपिश आज भी जारी है।हिंदुस्तानी सियासत के बारे में एक आम नजरिया बन गया है कि बिना किसी अपनी खूबी के, दौलत और शोहरत पाने के लिए सबसे आसान रास्ता राजनीति है। कुछ हद तक यह सही भी है, परंतु सभी एक एक जैसे हैं, यह मान लेना, साहू और चोर को एक पलड़े में तौलना, नासमझदारी और परले दर्ज की बेवकूफी है। आज भी उसूलों, सिद्धान्तों, विचारधारा से बंधे लोगों की भी एक जमात है, जो अपना सब कुछ दांव पर लगाकर विचारों के नशे में मशगूल है।ताज़ा मिसाल समाजवादी समागम के साथ जूटे साथियों की है। सोशलिस्ट तवारीख उसके सिद्धांतों, नीतियों, कार्यक्रमों के प्रचार प्रसार साहित्य निर्माण में बिना किसी पद प्रतिष्ठा की अंधी चाहत के, गांधी लोहिया जयप्रकाश के विचारों का परचम लहराने में ही अपने जीवन की सार्थकता मान रही है।

1977 में सोशलिस्ट पार्टी के जनता पार्टी में विलय के बाद 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से शुरू हुई सोशलिस्ट पार्टी का अस्तित्व समाप्त हो गया। हालांकि क्षेत्रीय रूप में सोशलिस्ट विचारधारा पर आधारित दावा करने वाली कुछ पार्टी कार्यरत रही है। परंतु विचारधारा के प्रचार-प्रसार प्रसार, फैलाव, साहित्य निर्माण, नए कैडर को वैचारिक दीक्षित करने के स्थान पर उनका जोर तात्कालिक नेताओं के कसीदे पढ़ने पर रहा।

समाजवादी समागम ने बिना किसी धन, जनबल संगठन, की मदद के वैचारिक रूप में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। क्या कोई कल्पना कर सकता है की सोशलिस्ट चिंतकों आचार्य नरेंद्र, जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, मधुलिमए इत्यादि के द्वारा लिखी गई लगभग 25 से अधिक किताबों को प्रकाशित कियाl 1977 के बाद पहली बार सोशलिस्ट मेनिफेस्टो जिसमें आज के संदर्भ में सोशलिस्टों की नीति क्या हो,, गहन विचार विमर्श, छानबीन करके प्रकाशित किया गयाl अपनी मूल पार्टी ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ के स्थापना दिवस पर दिल्ली में एक भव्य आयोजन कियाl इसी के साथ-साथ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी विशेषांक समता मार्ग पोर्टल, मधुलिमए कर्पूरी.ठाकुर जनशताब्दी समारोह आयोजित करना तथा उस अवसर पर विशेषांक भी प्रकाशित किए गए।उम्रदराज सोशलिस्‍ट होने के नाते मेरा यह फर्ज है कि मैं अपने इन वैचारिक प्रतिबद्ध साथियों, जिन्होंने गत सात -आठ सालों से अपना सब कुछ त्याग कर इस मुहिम में खफा दिया, उनके बारे में अपने नए साथियों को वाकिफ करवांउ।

प्रोफेसर आनंद कुमार वैचारिक पक्ष पर पूरी शिद्दत और अपनी काबिलियत से पूर्णकालिक अवैतनिक रूप से जुटे रहते हैं। डॉक्टर सुनीलम बहुजन संवाद पोर्टल नियमित रूप से संचालित करने के साथ-साथ किसान आंदोलन की अगुवाई तो करते ही है। प्रोफेसर आनंद कुमार और डॉक्टर सुनीलम पूरे साल पूरे मुल्क के दूर दराज इलाकों में जाकर सोशलिस्ट तहरीक के प्रचार प्रसार में लगे रहते हैं। हमें फख्र है साथी हरभजन सिंह सिद्धू पर जो हिंदुस्तान के सबसे बड़े मजदूर कामगारों के संगठन ‘हिन्द मजदूर सभा’ जिसके अंतर्गत लाखों मजदूर शामिल है, उसके वे महासचिव हैं। उनकी लड़ाई लड़ने के साथ-साथ समाजवादी समागम की गतिविधियों में पूरे उत्साह से भाग लेते हैं।एक साथी रमाशंकर सिंह पर तो समाजवाद का ऐसा रंग चढ़ा है, जिसकी आज के दौर में बहुत ही कम मिसाल मिलेंगी। अकेले अपने दम पर इन्होंने नियमित रूप से डॉ राममनोहर लोहिया व्याख्यान माला आयोजित करने के साथ लगभग 20- उच्च स्तरीय पुस्तके प्रकाशित कर दी।

मधुलिमए जन्मशताब्दी समारोह तथा कर्पूरी.ठाकुर जन्मशताब्दी समारोह का भव्य आयोजन उनकी पहल और आयोजन के कारण संभव हुआ। कर्पूरी ठाकुर समारोह का समापन 23 जनवरी को पटना में होगा। उससे पूर्व बहुत ही कम समय मे कर्पूरी.ठाकुर की शख्सियत, विचार- कर्म पर दो पुस्तके जिसमें से एक का संपादन इन्होंने खुद किया, ‘जननायक कर्पूरी.ठाकुर जन्मशती स्मरण- ग्रंथ (1924- 2024) तथा पंकज कुमार द्वारा लिखित ‘जननायक कर्पूरी.ठाकुर एक समाजशास्त्रीय अध्ययन की प्रस्तावना’ बहुत ही आकर्षित रूप से भाग दौड़कर प्रकाशित कर दी। समाजवादी समागम की सबसे बड़ी खूबी इस बात में है की भव्य आयोजनों तथा प्रकाशन में खुद साथियों ने अपनी जेब से खर्च कर इन कार्यों को संपन्न किया है। किसी प्रकार की बाहरी आर्थिक सहायता की एक कौड़ी भी इसमें इस्तेमाल नहीं हुई। हमारे कई साथी इस मिशन में बड़ी शिद्दत के साथ लगे हैं।साथी महेंद्र शर्मा, विजय प्रताप, श्याम गंभीर, विनय भारद्वाज, नानक चंद, डॉक्टर हरीश खन्ना, अजीत झा, एस,एस नेहरा, शशि शेखर सिंह, केदारनाथ, आकृति भाटिया, राकेश कुमार, संजय कनौजिया,राजवीर पवार पुरुषोत्तम हितेषी तो पूर्ण कालिक सक्रियता के साथ लगे रहते हैं।

डॉ अनिल ठाकुर महामंत्री के रूप में संगठन की जिम्मेदार निभा रहे हैं।यही नहीं दिल्ली से बाहर के भी कई साथी इस कार्य में जुटे हुए हैं। हैदराबाद के हमारे साथी पूर्व न्यायाधीश गोपाल सिंह और उनके साथी मरहूम बद्री विशाल पित्ती की परंपरा का निर्वाह करते हुए दक्षिण भारत में प्रचार प्रसार में संलग्न है। बिहार के हमारे वरिष्ठ साथी राजनीति प्रसाद तो अपनें आप मे एक उदाहरण है। गत 27 वर्षों से वह पटना में मधुलिमए की पुण्यतिथि पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करतेआ रहे हैं। उदयपुर के वरिष्ठ सोशलिस्ट हिम्मत सेठ जी सोशल मीडिया पर प्रचार के अतिरिक्त वैचारिक आंदोलन का आयोजन भी करते आ रहे हैं। लखनऊ के वरिष्ठ समाजवादी विनय कुमार सिन्हा, शाहनवाज कादरी, इंदौर के रामबाबू अग्रवाल, रामस्वरूप मंत्री, लखनऊ के वरिष्ठ सोशलिस्ट रामकिशोर आचार्य, बनारस के वरिष्ठ समाजवादी विजय नारायण जी, इलाहाबाद के विनय कुमार सिन्हा, अजय खरे, कानपुर के कुलदीप सक्सेना, मुंबई से गुड्डी।,

आज का जमाना सोशल मीडिया से मुतासिर है, इस फ्रंट पर भी वैचारिक पक्ष की कमान हमारे कई साथी संभाले हुए है। बिहार के वरिष्ठ समाजवादी नेता साथी शिवानंद तिवारी, अरविंद मोहन, अरुण कुमार त्रिपाठी, चंचल, अनिल सिन्हा, विनोद कोचर, विनोदअग्निहोत्री, आर्चीज मोहन, अनिल नोरिया इत्यादि सोशलिस्ट विचारधारा पर हो रहे हमलो का माकूल जवाब देते रहते हैं।हालांकि मैंने अपनी याददाश्त के आधार पर चन्द साथियों का जिक्र किया है। काफी बड़ी तादाद साथी राजनाथ शर्मा, रघु ठाकुर, रवि किरण जैन, प्रेम सिंह संदीप पांडे जैसे साथियों की है, जो सोशलिस्ट विचारधारा को अपने तरीके से प्रचार प्रसार करने में लगे हुए हैं। कहने का मकसद है की वैचारिक अंधकार और सत्ता की आपाधापी के दौर में भी एक बड़ी तादाद में साथी बिना किसी लालच और डर के इसमें जूटे हुए है।

राजकुमार जैन

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