:साहब,मर्जर ,अमलगमेशन, टेक ओवर कॉरपोरेट में होता है, राष्ट्रीय स्मारकों में नहीं। ::
रिजवान खान
भारत ने परोक्ष रूप से चार घोषित युद्ध लड़े हैं, इनमें नेहरू जी,शास्त्री जी,इंदिरा जी और अटलजी के समय एक एक युद्ध हुआ। चारों युद्ध हम पर थोपे गए और इन चारों युद्ध में हाज़रो सैनिक शाहीद हुए।
1962, 1965 ,1971 और 1999 वाले चार युद्धों में सबसे ज़्यादा निर्णायक 1971 का रहा जिसने खत्ते का भूगोल बदल दिया।
इस जीत के बाद, इंदिरागांधी विश्व पटल पर मजबूत नेता के तौर पर उभरीं और दुश्मन देश शर्मनाक हार से कई दशकों तक उभर न सका।
50 साल पहले हुए युद्ध ने भारत का लोहा मनवाया और देश की सेना का आत्मविश्वास बढ़ा।अमेरिका की सातवें बेड़े की धमकियां भी विफल हुई और चीनी स्वर भी खामोश रहे।
दिल्ली के दिल, इंडिया गेट पर अमर ज्योत जलाई गई जो कल शाम तक निरंतर जलती आ रही थी। बचपन से आज तक दसियों बार उस ज्योति को हमने देखा । कई माता पिता , छोटे बच्चों को लेकर आते देखा ,जो पोपोकोर्न ,icecream खाते खाते उन्हें गौरव से परिचित करवाते रहे।
मौजूदा सरकार के अन्य तानाशाही और स्वयंभू निर्णयों की भांति अमर ज्योत बुझाने का फैसला भी बगैर किसी चर्चा के ले लिया गया। मैं दावे से कह सकता हूँ,इसपर बेख़ौफ़ चर्चा होती तो मौजूदा सरकार के कई मंत्री,भी इसका विरोध करते।
हमेशा की तरह, इस उटपटांग, 1971 के शहीद सैनिकों के असम्मान को IT सेल के घटिया कुतर्कों से ढंका जा रहा है, जिसे गोदी मीडिया हूबहू वैसा ही बजा रहा है जैसा सरकार साहब चाहते हैं।
सरकार साहब ने यह फैसला इसलिये भी लिया होगा क्योंकि आज से बीस वर्ष पहले जब वे 35 वर्ष तक भिक्षा मांग कर अपना गुजारा कर रहे थे,तब उन्होंने ही बंग्लादेश मुक्ति वाहिनी की अंदरूनी मदद की थी। LOL
तर्क दिया जा रहा है कि,यह मर्जर है।
अरे साहब,मर्जर ,अमलगमेशन, टेक ओवर कॉरपोरेट में होता है, राष्ट्रीय स्मारकों में नहीं।
तर्क ये भी दिया जा रहा है कि, इंडिया गेट, अंग्रेज़ो ने बनवाया था और उसपर लिखे नाम उन फौजियों के हैं जो,फर्स्ट वर्ल्ड वार में ,अंग्रेजों की और से लड़ते हुए मारे गए थे।
तो साहब, आप इंडिया गेट गिरा देते। ज्योति बुझाने से बेहतर विकल्प था।
कुल मिलाकर यह सनक है।
रिजवान खान

