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*बीना दास और राजगुरु की अमर कहानी, जो आज भी जलाती है आजादी की लौ*

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24 अगस्त का दिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में खास महत्व रखता है. यह दिन उन दो महान क्रांतिकारियों को याद करने का है, जिन्होंने अपने प्राण मातृभूमि को समर्पित कर दिए. वीरांगना बीना दास और शहीद शिवराम हरि राजगुरु. इन दोनों की गाथा आज भी युवाओं के खून को गर्माती है और राष्ट्रभक्ति का संचार करती है.

बीना दास: निडर बंगाल की क्रांतिकारी बेटी

बीना दास का जन्म 24 अगस्त 1911 को बंगाल में हुआ. समाजसेवी परिवार में पली-बढ़ीं बीना पर बचपन से ही स्वदेशी आंदोलन और क्रांतिकारी साहित्य का असर था. सुभाष चंद्र बोस उनके पिता के शिष्य रह चुके थे और अक्सर घर पर आते थे. उनके विचारों ने बीना को गहराई से प्रेरित किया.

बीना की साहसिकता का अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है. जब वायसरॉय की पत्नी के स्वागत में छात्रों को फूल बिछाने को कहा गया, तो बीना ने इसे अपमानजनक मानकर बहिष्कार कर दिया. उसी क्षण उन्होंने संकल्प लिया कि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए प्राण न्यौछावर करेंगी.

बाद में, बेथ्यून कॉलेज और ‘छात्री संघ’ से जुड़कर उन्होंने आत्मरक्षा और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया. 6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्होंने बंगाल के गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन पर गोलियां चलाईं. हालांकि वे विफल रहीं, लेकिन उनके साहस ने पूरे देश को हिला दिया.

बीना को 9 साल के कठोर कारावास की सजा हुई. जेल में अमानवीय यातनाओं के बावजूद उन्होंने अपने साथियों का नाम नहीं बताया. जेल से बाहर आने के बाद भी वे आंदोलन में सक्रिय रहीं और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी गिरफ्तार हुईं. उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 1960 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. 1986 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी गाथा आज भी जीवित है.

राजगुरु: हंसते-हंसते फांसी पर झूलने वाला क्रांतिकारी

राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के खेड़ में हुआ. बचपन से ही वे मेधावी और राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत थे. संस्कृत में निपुण और पहलवानी में माहिर राजगुरु ने 16 साल की उम्र में घर छोड़कर आजादी की लड़ाई को अपना जीवन समर्पित कर दिया.

उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह से हुई और वे उनके सबसे करीबी साथियों में शामिल हो गए. भगत सिंह ने कहा था, ‘राजगुरु मेरा सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन यह आत्म-बलिदान की होड़ है, जिसमें ईर्ष्या या स्वार्थ नहीं, मासूमियत है. वह यारों का भी यार है.’

राजगुरु ने भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सांडर्स की हत्या की. असेंबली बमकांड हो या क्रांतिकारी गतिविधियां, वे हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहे. 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ उन्हें भी फांसी दी गई.

अमर बलिदान, अमर प्रेरणा

बीना दास और राजगुरु की कहानियां बताती हैं कि आजादी केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं थी, बल्कि करोड़ों लोगों के बलिदान और त्याग का परिणाम थी. बीना का ‘करेंगे या मरेंगे’ और राजगुरु का ‘मेरी मौत से हजारों राजगुरु उठ खड़े होंगे’ जैसे शब्द आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं.

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