डा.अमिता नीरव
अखबार में काम करने के दिन थे। शुरुआत में तो सब ठीक रहा क्योंकि ट्रेनी होने के नाते काम को देखने वाले जिम्मेदार लोग थे। इसलिए न तो गलतियाँ होती थी औऱ न ही हड़बड़ी, लेकिन आखिर ऐसा कितने दिनों तक चलता। फुल फ्लैश एडिशन की जिम्मेदारी आ गई।
कभी इवेंट देर तक चलना है, कभी लाइट नहीं है तो फर्स्ट लीड नहीं आ पाई है। कभी फर्स्ट लीड का फोटो नहीं आया है तो कभी स्कैनिंग से फोटो लौट आया है क्योंकि फोटो की क्वालिटी अच्छी नहीं है। कभी पेज मेकर लेट है तो कभी पेज मेकर है ही नहीं, दूसरा पेज मेकर अपने रूटीन के काम के साथ आपका भी काम कर रहा है।
कभी प्रूफ रीडर सिर पर आकर खड़े होते हैं कि यह शब्द हमें नहीं मिल रहा है। कभी सर्वर डाउन हो जाता है तो कभी ब्यूरो में लाइट नहीं रहती है। कभी पेज पूरा तैयार होता है औऱ विज्ञापन से फोन आता है कि आपके पेज में विज्ञापन आया है और कभी दूसरी डेस्क का साथी अचानक छुट्टी पर चला जाता है तो उसका काम भी समय पर करना होता था।
कभी आपके पेज की लीड खबर फ्रंट पेज के एडिटर को पसंद आ गई है और वे खबर अपने पेज पर ले लेते हैं। ऐसे में डेडलाइन को मीट करते हुए तुरंत ही किसी खबर को लीड खबर का रूप दिया जाना होता है। कह सकते हैं कि हर दिन एक नई समस्या से सामना करना होता है। उस सबसे ऊपर समय पर अपना एडिशन छोड़ने का दबाव हर दिन रहता था।
ऐसे में हर दिन कोई-न-कोई छोटी-बड़ी गलती हो ही जाती थी। कई बार ऐसा भी होता था कि नया पेज मेकर होता था तो तारीख बदलना भूल जाता था औऱ पेज पर पिछली तारीख के साथ ताजी खबरें चली जाया करती थीं। ऐसी ही गलती ने कुछ पुराना याद दिलाया था।
जिन दिनों अखबार में काम नहीं करती थी, उन दिनों एक बार ऐसा ही हुआ था कि पेज पर तारीख नहीं बदली गई थी औऱ खबरें ताजा थी। उस पर सब लोगों ने बहुत हँसी उड़ाई थी। पेज पर तारीख तक नहीं बदली गई है। जब खुद काम करना शुरू किया तो समझ आया कि डेस्क के इस तरफ का दबाव एकदम दूसरा होता है।
पिछले अकाउंट में एक सज्जन थे। खूब पढ़ते थे और खुद को न्यूट्रल कहते थे। मैं उनके झाँसे में थी। वे नेहरू के घनघोर आलोचक थे। मुझे इस पर भी कोई आपत्ति नहीं थी। नेहरू से गलतियाँ हुई थीं औऱ इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
एक बार सावरकर पर बहस हुई तो उन्होंने तर्क दिया आपको क्या पता कि उनके माफी माँगने के पीछे की परिस्थितियाँ क्या थीं? बात ठीक लगी थी। लेकिन जब मैंने देखा कि वे सावरकर के माफी माँगने तक को जस्टिफाय कर रहे हैं और नेहरू की गलतियों के प्रति असहिष्णु है तब लगा कि दरअसल निष्पक्ष होने की खोल में वे अपना छद्म छुपा रहे हैं।
यह मैं पहले भी लिख चुकी हूँ कि नेहरू से गलतियाँ हुई थी, क्योंकि उनके पास कोई परंपरा नहीं थी। मैं अक्सर यह सोचकर चकित होती हूँ कि वह व्यक्ति जिसने पहली बार यह कहा कि आम या अमरूद या कुछ और खाए जाने के लिए है उसने कितना साहस किया होगा?
आज जो हम तमाम रेसिपी बनाते हैं, उस व्यक्ति के साहस, निर्णय लेने औऱ उसे करने की क्षमता पर हम जरा भी विचार नहीं करते हैं। जो नींव रखता है उससे गलतियाँ भी होती है, लेकिन यदि आप गलतियों औऱ गुनाहों में फर्क नहीं कर रहे हैं तो आप भी उन षडयंत्रकारियों की पंक्ति में खड़े हैं जो सत्ता के साथ हैं। सिर्फ नीयत सारे अर्थ बदल देती है।
बिहार औऱ उत्तर प्रदेश में स्टूडेंट्स का दमन किया जा रहा है। मैं चकित हूँ कि कथित पढ़ा लिखा, हर बात में अपनी राय रखने वाला तबका कितना जनोन्मुखी है कि इस पूरे प्रकरण में चुप लगाकर बैठा हुआ है। कहेगा भी तो यही कि हिंसा नहीं की जानी चाहिए।
कोई पूछे कि अपने घर परिवार से दूर, कम से कम में गुजारा करके अपने बेहतर भविष्य के लिए अपने सबसे खूबसूरत दिनों को उन परीक्षा की तैयारियों में लगाए रखने वाले बच्चों को हिंसा की तरफ लेकर गया कौन है? मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि हर लड़ाई में लड़ाई के तरीके औऱ हथियारों का निर्णय हमेशा ताकतवर करता है।
यदि सत्ता न चाहे तो न तो हिंसा हो, न उपद्रव औऱ यदि सत्ता ने यह चाह लिया है तो फिर यदि भगवान है और वह भी उसे रोकना चाहे तो नहीं रोका जा सकता है। क्योंकि यह सत्ता ने चाह लिया है।
जिनको चीजों को काले औऱ सफेद में देखने का रोग है वे बहुत आसानी से ताकत की तरफ लुढ़क सकते हैं। क्या पता यही उनका लक्ष्य भी हो। लेकिन तहों के भीतर झाँकने से निर्णय आसान नहीं रहता है। जो तुरंत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं उन्हें यह बायनरी बड़ी भाती है।
सही-गलत, नैतिक-अनैतिक औऱ जायज-नाजायज की बायनरी को पेश करता भारतीय मध्यमवर्ग बौद्धिक रूप से दिवालिया, छद्म औऱ बेहद सुविधाजीवी है। उनके स्वार्थ पूरे होते रहे… दुनिया को भाड़ में झोंक आए ये लोग। इन्हें अवसरवादी कह दें तो भावनाएँ आहत हो जाती हैं इनकी।
ये पिछले साल की पोस्ट है। साल बदल गया, मगर सरकार के तौर-तरीकों में बदलाव नहीं आया है। यह सरकार की बड़ी अच्छी बात है कि इसकी समस्याओंं को हल करने के तरीकों की कंसिस्टेंसी बनी हुई है।
भारतीय मध्यमवर्ग बौद्धिक रूप से दिवालिया, छद्म औऱ बेहद सुविधाजीवी है

