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*सिस्टम की महिला~जॉब के लिए बेताबी के पीछे की मंशा*

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    पुष्पा गुप्ता

   महिलाओ को घर से बाहर निकाल कर बाजार की सब्जेक्ट बनाना और जमकर भोगना स्थूल और आम मक़सद है. शूक्ष्म और खास मक़सद बहुत गहरा है.

     सिस्टम क्यों चाहता है, महिलाएं जॉब करें,मान लो 10 लाख पुरुष जॉब कर रहे है, उनमें से 9 लाख 99 हजार ऐसे पुरुष होंगे जो बेरोजगार महिला से शादी कर लेंगे,अब आते है असली खेल पर 10 लाख महिलाओ को जॉब दो, उनमें से एक भी महिला बेरोजगार लड़के से शादी नही करेगी।

    इसमें एक और फैक्ट है, वो महिलाएं अपने से अधिक सैलरी वाले से शादी करना पसंद करेगी , हो गया न बेड़ा गर्क,अब उन महिलाओं को शादी के लिए लड़के नही मिलेंगे जल्दी,क्युकी महिलाओ को जॉब देकर लडको में बेरोजगारी बढ़ा दी,दूसरी बात अधिकतर पुरुष ज्यादा दबकर दरकार जॉब नही करता,वो विरोध कर देता है.

    हर फील्ड में महिलाओ को जॉब देने से मजदूरों की मांगे उठना बंद हो गई क्युकी पुरुष प्यार घर परिवार के लिए कमाता था,तो हर एक अधिकार के लिए आवाज उठाता था,.

   जैसे सैलरी बढ़ाने के लिए,अब महिलाए सोचती है,हम क्यों लफड़ा पाले मेरे हसबैंड कमा ही रहे है,मैं कम में भी काम कर लूंगी मुझे क्या फर्क पड़ता है,और कुंवारी है तो पापा या भाई कमा ही रहे है।मुझे क्या फर्क कौनसा लाइफ टाइम कमाना है,अब इसके और साइड इफेक्ट पर जाते है.

      तो जब महिला कमाएगी तो वो अपने लिए कमाएगी गहने कपड़े इत्यादि,अगर संयुक्त परिवार है तो महिला का पैसा नही लिया जाएगा न वो देगी,क्युकी उसका मानना है,मैं कमा रही हूं बाकियों की पत्नियां थोड़ी कमा रही है.

     हसबैंड के भाई बाप का फर्ज है घर परिवार में सहयोग करना, वो संयुक्त घर बनाने में अपना आर्थिक योगदान नही देगी.

     हा अलग हो गए तो जरूर सहयोग करेगी,फिर घर टूटेंगे ,अब अगला साइड इफेक्ट बच्चे को मां बाप का समय न मिलने से वे किसी गलत संगत में पड़ेंगे.

     ध्यान न देने पर,कई बार बच्चे हादसे का सीकर भी हो जाते है मां बाप दोनो कमाने गए है,बच्चे को कुछ हो गया, घर परिवार में रोज कलह क्युकी दोनो थके हारे अब घर का काम कौन करें। 

     खान पान सही टाइम पर सही से न मिले तो बाकी सदस्य बीमार पड़े या होटलों का व्यापार ऐसे बहुत से एजेंडे है।

     सबसे महत्वपूर्ण बात आप आधी आबादी को टैक्स के दायरे में लाना है.

जब हमारी मां बहन बेटी घर से बाहर नौकरी करने जायेगी तो वो टैक्स के दायरे में आयेगी.

    मेक‌अप, सूटस और अन्य बाजारी खर्चों में बढ़ोतरी होगी यानी करेंसी कार्पोरेट और कॉमर्स का मायाजाल मजबूत होगा लेकिन परिवार अस्त व्यस्त होगा।

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