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महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कर्ज, युद्ध आदि देश की जनता पर थोपी गयी मुख्य समस्या

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रजनीश भारती

महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कर्ज, युद्ध…. में से बेरोजगारी की समस्या अत्यधिक भयानक है। कम्पटीशन पास करने के लिये बड़े-बड़े कोचिंग सेंटरों, कान्वेन्ट स्कूलों और महँगी किताबों आदि के जरिये नौजवानों का शोषण हो रहा है। सरकार भी फार्म भरने के नाम पर खरबों रूपये नौजवानों से हर साल वसूल रही है। बेरोजगार नौजवान ’बेचारा’ ही नहीं बल्कि पूँजीपति वर्ग का ’चारा’ बनते जा रहे हैं। बेरोजगारी का आँकड़ा लगातार भयावह होता जा रहा है। 
देश में हर महीने दस लाख लोग नौकरी तलाशते हैं। प्रतिवर्श 23 लाख नये ग्रेजुएट पैदा होते हैं जबकि 2005 से 2010 के बीच 5 वर्षो में केवल 10 लाख नौकरियां पैदा हुई हैं। पिछले 8 साल में विकास तो हुआ मगर नौकरियां नहीं बढ़ी हैं। 2005 से 2010 के दौरान-5 वर्षो में 50 लाख नौकरियां सिर्फ मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र से खत्म हो गयीं। इन्फ्रास्ट्रक्चर, खदान, आटो, आई.टी., पर्यटन एवं बैंकिग आदि क्षेत्रों में लाखों नौकरियां खत्म हुई हैं।
एन.एस.एस.ओ. की 68 वीं रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल कार्यरत आबादी का 51 प्रतिशत लोग स्वरोजगार करते हैं। तथा 33.6 प्रतिशत लोग अनौपचारिक श्रमिक हैं। नियमित कर्मचारी सिर्फ 15.5 प्रतिशत हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सिर्फ 17 प्रतिशत मजदूर ही नियमित वेतन वाले हैं। शेष 83 प्रतिशत मजदूर अनौपचारिक तौर पर काम करते हैं।
वास्तविक स्थिति उपरोक्त आकड़ों से ज्यादा भयावह दिख रही है। कुछ अपवादों को छोड़कर हर घर में एक दो बेरोजगार मौजूद हैं। रोजगारशुदा लोगों में भी 90 प्रतिशत ऐसे हैं जिन्हें सम्मानजनक रोजगार नहीं प्राप्त हो सका है। बेरोजगारी की मार सबसे ज्यादा महिलाओं को झेलना पड़ रहा है। अधिकांश महिलाएं अपना जिस्म बेचने के लिए मजबूर होती जा रही हैं। रजिस्टर्ड वेश्यालयो, पबों, थियेटरों, बीयरबारों, होटलों, पार्कों आदि की जगह वेश्यावृति के लिए कम पड़ रही है। 
छात्र-नौजवान नौकरियां पाने के लिए आधी उम्र तक कमरतोड़ परिश्रम कर रहे हैं। इन बेरोजगारों का खर्च उठाने में परिवार के जिम्मेदार लोगों की हालत खराब होती जा रही है। एक-एक बूँद आरक्षण के लिए नौजवान आपस में कटने-मरने को तैयार हो जाते हैं। मगर यह व्यवस्था पूरी आबादी में से केवल एक प्रतिशत लोगों को सम्मानजनक रोजगार दे पाने में ही सक्षम दिख रही है। बाकी लोगों में कुछ अर्धबेरोजगार हैं, तो अधिकांश बेरोजगार हैं। बाप अपने पूरे जीवन की कमाई अपने बेटों को नौकरी दिलाने में खर्च करने को तत्पर है, फिर भी नौकरी नहीं मिल पा रही है। शिक्षितों में 33 प्रतिशत बेरोजगार हैं। अशिक्षित बेरोजगारों की स्थिति और अधिक भयावह है। आज 2022 के आंकड़ों पर ध्यान दें तो 90 करोड़ लोग रोजगार पाने के योग्य हैं मगर उनमें 45 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्होंने हताश होकर काम की तलाश ही छोड़ दिया है। बीते पांच वर्षों में 2.1 करोड़ रोजगार घटे हैं।
*रजनीश भारती*

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